कब टपकेगी तारकोल की नौंवी बूंद

Image caption वैज्ञानिकों के मुताबिक़ तारकोल पानी की तुलना में 230 अरब गुना अधिक गाढ़ा होता है

आस्ट्रेलिया के ब्रिसवेन की क्वींसलैंड विश्वविद्यालय में 1927 से एक प्रयोग जारी है. इसका मकसद तारकोल के गाढ़ेपन का पता लगाना है.

प्रोफ़ेसर थॉमस परनेल ने 1927 में अपने छात्रों का यह दिखाने के लिए यह प्रयोग शुरू किया था कि कुछ पदार्थ जो हमें ठोस के रूप में दिखाई देते हैं, वास्तव में वे गाढ़े पदार्थ होते हैं. उनमें कुछ असाधारण गुण होते हैं.

इसके लिए उन्होंने एक कीप में गरम तारकोल भरा. तीन साल तक तारकोल को कीप में जमने दिया गया. इसके बाद 1930 में उसकी सील हटा दी गई और तारकोल को बहने के लिए छोड़ दिया गया.

उत्सुकता का आलम

उस समय से लेकर आज तक तारकोल से केवल आठ बूंदें ही टपकी हैं. लेकिन इन बूंदों को टपकते हुए आज तक किसी ने नहीं देखा है. माना जा रहा है कि इसकी नौंवीं बूंद इस साल टपक सकती है.

नौंवीं बूंद को टपकते हुए देखने के लिए आम लोगों और वैज्ञानिकों में काफी उत्सुकुता है. कोई भी इस क्षण को छोड़ना नहीं चाहता है. इसे रिकॉर्ड करने के लिए कैमरे लगाए गए हैं. पिछले आठ दशकों में ऐसा पहली बार होगा जब टपकती बूंद को कोई देख पाएगा.

इस प्रयोग के उपकरण क्वींसलैंड विश्वविद्यालय के गणित और भौतिक विज्ञान विभाग की लॉबी में रखे गए हैं. यह डिब्बे में बंद किसी भी अन्य तरल पदार्थ की तरह बूंद-बूंद टपक रहा है. लेकिन इसे बूंद की जगह थक्का कहना ज्यादा उचित होगा.

इस प्रयोग की देखरेख कर रहे भौतिकविज्ञानी प्रोफ़ेसर जॉन मेनस्टन ने बीबीसी को बताया,''मैंने इसकी कुछ बूंदों को तो देखा है. लेकिन किसी को टपकते नहीं देखा है.''

उन्होंने कहा,''अगर आपने पलक भी झपकाई तो आप इसे देखने से वंचित रह जाएंगे. हर 10-12 साल में इसकी एक बूंद एक सेकेंड से भी कम समय में टपक जाती है.''

इस प्रयोग के इतने साल तक जारी रहने के सवाल पर वैज्ञानिकों की प्रतिक्रिया सामान्य है, वे कहते हैं, "अगर आप कुछ असामान्य देखते हैं, आप उसके बारे में और अधिक जानना चाहते हैं. हालांकि जो संभावित है, वह आठ बार पहले भी हो चुका है. अब कोलतार भी लोगों के लिए अनजान नहीं रह गया है.’’

सजीव प्रसारण

नौंवीं बूंद के टपकने को रिकॉर्ड करने के लिए कैमरे लगाए गए हैं. इसके सजीव प्रसारण की व्यवस्था है. लेकिन कभी-कभी यह पर्याप्त नहीं होता है.

जब इस प्रयोग में आठवीं बूंद टपकी तो प्रोफ़ेसर जॉन मेनस्टन लंदन में थे. इस दौरान उन्हें तीन ई-मेल मिले. पहले में कहा गया था,''लगता है कि यह होगा.'' दूसरे में कहा गया था,''माफ करना, बूंद टपक गई.'' इसके जवाब में मैंने कहा, '' जब आप इसे डीजिटल मेमोरी में देखें तो परेशान न हों.'' तीसरे ईमेल में कहा गया,''ओह..नहीं, आप ऐसा नहीं कर सकते, तंत्र ने हमें विफल कर दिया.'' यह साल 2000 के नवंबर था, जब यह घटना हुई. प्रोफ़ेसर मेनस्टन तबसे इस घड़ी का इंतजार कर रहे हैं.

वे कहते हैं,''मैं 78 साल का हो चुका हूं और दसवीं बूंद दस साल से पहले नहीं टपकेगी. इसलिए यह मेरे लिए बूंद को टपकते देखने का आखिरी मौका हो सकता है.''

बीसवीं सदी के शुरुआत तक तारकोल का उपयोग लकड़ी से बनी नावों को रंगने के लिए किया जाता था.यह इतना कठोर होता है कि इसे हथौड़े से तोड़ा जाता है.

वैज्ञानिकों की गणना के मुताबिक तारकोल पानी की तुलना में 230 अरब अधिक गाढ़ा होता है और ठोस की तरह दिखता है.

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