इंसानी डीएनए का पेटेंट नहीं

  • 14 जून 2013
Image caption मनुष्य के डीएनए को प्राकृतिक संरचना मानते हुए कोर्ट ने इसे पेटेंट अयोग्य बताया

अमरीका के सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मेडिकल कंपनियां मनुष्य के प्राकृतिक डीएनए का पेटेंट नहीं करा सकतीं लेकिन प्रयोगशाला में तैयार किया गया डीएनए पेटेंट योग्य माना जाएगा.

कोर्ट का कहना है कि डीएनए प्रकृति की देन है और सिर्फ़ इस आधार पर उसका पेटेंट नहीं किया जा सकता कि किसी शोध के लिए वह शरीर से अलग किया गया है.

कोर्ट ने मिरियड जेनेटिक्स नाम की एक अमरीकी कंपनी द्वारा स्तन और गर्भाशय कैंसर का पता लगाने संबंधी शोध में इस्तेमाल हुए जीन के पेटेंट को अवैध क़रार दिया है.

चिकित्सकीय शोध और जीव विज्ञान तकनीक के लिए कोर्ट के इस फ़ैसले के दूरगामी परिणाम होंगे. अमरीकी जैव वैज्ञानिक समुदाय ने इसका विरोध करते हुए कहा है कि ऐसे पेटेंट पर बंदिशें लगाने से जीन से जुड़े शोध पर नकारात्मक असर पड़ेगा.

Image caption कंपनी का तर्क था कि जिस जीन पर सवाल उठाए जा रहे हैं उसे शरीर से बाहर निकाल कर शोध किया है इसलिए उसका पेटेंट हो सकता है.

रासायनिक भिन्नता और जीन

कोर्ट का ये फ़ैसला मिरियड जेनेटिक्स और अमेरिकन सिविल लिबर्टीज़ यूनियन के बीच चले एक मुक़दमे का नतीजा है. इस संगठन ने 2009 में एक मुक़दमा दायर कर ये सवाल उठाया था कि क्या मेडिकल कंपनियों को मानव जीन का पेटेंट करने की इजाज़त होनी चाहिए.

मामला मुख्य रूप से स्तन और गर्भाशय कैंसर का पता लगाने संबंधी शोध से जुड़ा था.मिरियड जेनेटिक्स एक ऐसे टेस्ट पर काम कर रही थी जिससे कैंसर को जन्म देने के लिए जिम्मेदार जीन में तब्दीली की संभावना को तलाशा जा सके.

अमेरिकन सिविल लिबर्टीज़ यूनियन का तर्क था कि डीएनए प्रकृति की रचना है इसलिए इसका पेटेंट नहीं हो सकता लेकिन कंपनी का कहना था कि जिस जीन पर सवाल उठाए जा रहे हैं उसे कंपनी ने शरीर से बाहर निकाल कर शोध किया है इसलिए उसका पेटेंट हो सकता है.

2010 में एक न्यूयॉर्क फ़ेडरल कोर्ट ने यूनियन का पक्ष लिया लेकिन अपीलीय न्यायालय ने मिरियड जेनेटिक्स की बात स्वीकार करते हुए कहा कि मानव शरीर से निकाले गए डीएनए का रासायनिक स्वरूप बिल्कुल भिन्न होता है.

Image caption शोधकर्ताओं का कहना है कि अमरीका में क़रीब 40 फ़ीसदी मानव जीन का पेटेंट हो चुका है

सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को नहीं माना. न्यायाधीश जस्टिस टॉमस ने फ़ैसले में लिखा कि सिर्फ़ इस आधार पर कि 'जीन को शरीर से बाहर निकाल लिया गया है उससे मिलने वाली जानकारी को पेटेंट योग्य नहीं माना जा सकता'.

इस कथन के समर्थन में ही न्यायाधीश जस्टिस एन्टोनिन स्केलिया ने लिखा कि डीएनए का एक हिस्सा अगर बाहर निकाल भी लिया जाए तब भी वह अपने स्वरूप में उस प्राकृतिक डीएनए का ही हिस्सा है.

अमेरिकन सिविल लिबर्टीज़ यूनियन की वक़ील सैन्ड्रा पार्क इस फ़ैसले का स्वागत करते हुए कहती हैं कि अब वैज्ञानिकों के लिए इन जीन पर शोध करना ज़्यादा आसान होगा क्योंकि किसी तरह की बौद्धिक संपत्ति के उल्लंघन का कोई डर नहीं रहेगा.

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