अब कॉन्टैक्ट लेंस में ही होगी दूरबीन

  • 3 जुलाई 2013
Image caption इन लैंस और चश्मे से चीज़ों को ढाई गुना से बड़ा करके देखा जा सकता है.

शोधकर्ताओं ने ऐसे कॉन्टैक्ट लेंस तैयार किए हैं, जिन्हें चश्मों के साथ पहनने पर दूर की चीज़ें देखने के लिए दूरबीन की ज़रूरत नहीं होगी.

चश्मे के साथ मिलकर ये लेंस चीज़ों को 2.8 गुना तक बड़ा देखा जा सकता है.

चश्मे में इस तरह के पोलराइज़्ड फ़िल्टर लगे हैं जो अलग-अलग दिशाओं से आने वाली प्रकाश की किरणों को एक ही दिशा में भेज देते हैं.

यह चश्मा पहनने वाला तय कर सकता है कि कब उसे सामान्य चश्मे वाली दृष्टि से देखना है और कब दूरबीन वाली दृष्टि से. वह कभी भी सामान्य और दूरबीन के बीच आसानी से बदलाव कर सकता है.

दूरबीन वाले यह चश्मे उम्र बढ़ने के चलते आंखों की रोशनी कम होने की दिक्कत से निजात पाने के लिए ईजाद किए गए हैं.

थ्री डी तस्वीर

उम्र के साथ मैक्यूला (रेटीना के बीच का पीला भाग जो चीज़ को स्पष्ट देखने में सहायता करता है) का कमज़ोर होना अंधेपन का सबसे बड़ा कारण है.

जैसे-जैसे मैक्यूला कमज़ोर होता जाता है वैसे-वैसे आदमी की चेहरे पहचानने, पढ़ने और गाड़ी चलाने- यानी की हर वह क्षमता, जिसमें ब्यौरे की ज़रूरत होती है, कमज़ोर पड़ती जाती है.

शोधकर्ताओं द्वारा तैयार कॉन्टैक्ट लेंस में एक मुख्य क्षेत्र है जिससे सामान्य दृष्टि के लिए रोशनी मिलती है. दूर की चीज़ों को नज़दीक दिखाने के लिए मुख्य क्षेत्र के चारों तरफ़ एक छल्ला है. ख़ास तरीक़े के छोटे-छोटे एल्यूमिनियम के शीशे चीज़ों को बढ़ाकर दिखाने के लिए चारों तरफ़ रोशनी को चार गुना कर रेटीना की ओर भेजते हैं.

सामान्य रूप से प्रयोग करने पर बढ़ाई गई तस्वीर नहीं दिखाई देती क्योंकि जोड़ीदार चश्मे में लगे पोलेराइज़िंग फ़िल्टर इसे रोक देते हैं. देखने वाला इन फ़िल्टर्स को बदल सकता है ताकि उसे सिर्फ़ बढ़ाई गई तस्वीर ही देखने को मिले.

कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, सैन डिएगो के जोसेफ़ फ़ोर्ड और स्विट्ज़रलैंड के ईपीएफ़एल के एरिक ट्रेम्बले के नेतृत्व में शोधकर्ताओं के दल ने फ़िल्टर करने के लिए सैमसंग के थ्री डी (त्रिआयामी) टीवी सेट में इस्तेमाल किया जाने वाले लेंस का इस्तेमाल किया.

सामान्यतः प्रयोग किए जाने पर यह लेंस बाएं या दाएं लेंस को वैकल्पिक रूप से बंद कर एक थ्री डी तस्वीर बनाता है.

दल द्वारा तैयार किए गए लेंस के पहले प्रारूप का व्यास 8 मिमी, मोटाई एक मिमी थी और छल्ले वाले क्षेत्र में यह मोटाई 1.17 मिमी थी.

अति दृष्टि

डॉक्टर ट्रेंबले ने बीबीसी को बताया, “सबसे बड़ी मुश्किल लेंस को हवा के आर-पार होने योग्य बनाने की थी. अगर आप 30 मिनट तक यह लेंस पहनना चाहते हैं तो आपको इसे हवादार बनाना ही होगा.”

लेंस में गैस गुज़र जानी चाहिए ताकि कांटेक्ट लेंस से घिरे आंख के हिस्से ख़ासतौर पर रेटिना को ऑक्सीजन की आपूर्ति हो सके.

Image caption अमरीकी सेना ने इस शोध को आर्थिक सहायता दी है.

टीम ने लेंस में बहुत छोटे-छोटे ऐसे रास्ते बनाए जिनसे ऑक्सीजन आ-जा सके.

डॉक्टर ट्रेंबले के अनुसार, "इस जटिलता की वजह से लेंस का निर्माण करना और मुश्किल हो गया.”

बहरहाल यह लेंस तैयार किए जा रहे हैं और नवंबर में इनका क्लीनिकल ट्रायल शुरू हो जाएगा.

वह कहते हैं कि अंततः उम्र बढ़ने की वजह से दृष्टि संबंधी दिक्कतों से जूझ रहे लोगों तक यह लेंस पहुंच सकेंगे.

अब तक नज़र की दिक्कत को दूर करने के लिए या तो सर्जरी करके एक दूरबीन वाला लेंस लगाया जाता था या भारी चश्मे पहनने होते थे, जिसमें दूरबीन वाले लेंस मुख्य लेंस का एक भाग होते थे.

आरएनआईबी में नेत्र स्वास्थ्य प्रचार प्रबंधक क्लारा ईग्लेन कहती हैं कि शोध “रुचिकर” लगता है. वह मैक्यूला के क्षय पर इसके केंद्रित होने के लिए इसकी तारीफ़ करती हैं.

हालांकि इन लेंसों का भविष्य में कोई और इस्तेमाल भी हो सकता है क्योंकि इस शोध को अमरीकी सेना के शोध विभाग, डार्पा, द्वारा आर्थिक सहायता दी जा रही है.

डॉक्टर ट्रेंबले कहते हैं, “उन्हें मैक्यूला के क्षय के बारे में चिंता नहीं है. वह तो अति दृष्टि के बारे में सोच रहे हैं जो कि एक ज़्यादा बड़ी दिक्कत है.”

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