हम कितना आयात करते हैं?

आयात-निर्यात के हिसाब में गड़बड़ी

आयातित सामान की लागत का पता लगाने की मौजूदा विधियों में बेहद गड़बड़ियां हैं, शोधकर्ताओं ने ये दावा किया है.

एक नए अध्ययन के मुताबिक़ किसी सामान को तैयार और निर्यात करने में उसे बनाने से तीन गुना कच्चे पदार्थ लगते हैं.

ये शोध नेशनल एकेडमी ऑफ़ साइंसेज़ में प्रकाशित हुआ है.

शोध के मुताबिक़ जो अमीर देश ये सोचते हैं कि वे टिकाऊ तरीक़े से विकास करने में कामयाब रहे हैं वे ग़लत हैं.

कई विकसित देशों का मानना है कि वे टिकाऊ विकास की ओर बढ़ रहे हैं, क्योंकि उनकी आर्थिक विकास दर में बढ़ोतरी हुई है लेकिन वे जितना कच्चा पदार्थ इस्तेमाल करते हैं उसमें गिरावट आई है.

लेकिन इस नए अध्ययन से पता चलता है कि ये देश उस कच्चे पदार्थ को नहीं जोड़ रहे जो इस्तेमाल तो होता है लेकिन मूल देश से बाहर जाता ही नहीं.

इन शोधकर्ताओं ने एक नए मॉडल का इस्तेमाल किया जो धातु खनिजों, जीवाश्म ईँधन और निर्माण प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले पदार्थों का भी हिसाब-किताब रखता है.

काफ़ी ज़्यादा पदार्थों का इस्तेमाल

Image caption शोध के मुताबिक आयात के हिसाब में सामान बनाने में इस्तेमाल सभी कच्चे पदार्थों को ध्यान में नहीं रखा जाता.

शोधकर्ताओं का कहना है कि इससे उन्हें 186 देशों का 20 साल का 'मटेरियल फुटप्रिंट' या इस्तेमाल किए गए पदार्थों का ब्योरा मिला.

साल 2008 में दुनिया भर में 70 अरब टन कच्चे पदार्थों को निकाला गया था लेकिन सिर्फ़ 10 अरब टन का कारोबार हुआ.

40 फ़ीसदी से ज़्यादा पदार्थ का इस्तेमाल इन सामान को तैयार करने और निर्यात लायक़ बनाने में हुआ.

न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी के डॉक्टर टॉमी विडमैन का कहना है, "मौजूदा संकेतकों पर भरोसा कर के सरकारें ये नहीं देख पा रही कि कितने संसाधनों का उपभोग किया गया."

खनिजों के निर्यात से चिली और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों का फुटप्रिंट बढ़ा है.

डॉक्टर टॉमी विडमैन कहते हैं, "व्यापार के आंकड़ों से सिर्फ़ ये पता चलता है कि कितने पदार्थ का व्यापार हुआ लेकिन इसमें इन सामान को तैयार करने में इस्तेमाल पदार्थ को ध्यान में नहीं रखा जाता. इसलिए खाद्य जैसी किसी चीज़ के लिए आपको फॉस्फेट चट्टानों के खनन की ज़रूरत होगी, मशीनरी की ज़रूरत होगी और इस तरह अतिरिक्त पदार्थ चाहिए."

इस विश्लेषण में पाया गया कि चीन की अर्थव्यवस्था ने सबसे ज़्यादा चीज़ों का इस्तेमाल किया, अमरीका से दोगुना और जापान और भारत से चार गुना.

इसमें से ज़्यादातर निर्माण सामग्री रही जिससे बीते 20 साल में चीन के तेज़ी से औद्योगिकीकरण और शहरीकरण की झलक मिलती है.

जब इन प्राथमिक संसाधनों को कारोबार में शामिल किया जाता है तो अमरीका सबसे बड़ा आयातक दिखता है.

भविष्य की उम्मीद

प्रति व्यक्ति के आधार पर देखें तो तस्वीर अलग नज़र आती है, तब ऑस्ट्रेलिया और चिली सम्मिलित पदार्थों के सबसे बड़े निर्यातक दिखते हैं.

इस मॉ़डल के अनुसार, दक्षिण अफ़्रीक़ा एकमात्र देश था जिसकी विकास दर बढ़ी और पदार्थों का उपभोग घटा.

डॉक्टर विडमैन कहते हैं, "हम कह रहे हैं कि कुछ ग़ायब है, अगर हम सिर्फ़ एक संकेतक की ओर देखें तो हमें ग़लत जानकारी मिलेगी."

शोधकर्ताओं का मानना है कि उनका विश्लेषण दिखाता है कि संपन्नता बढ़ने के साथ कच्चे पदार्थों से दबाव कम नहीं होता.

उनका तर्क है कि इंसान पहले से कहीं ज़्यादा प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल कर रहा है और इसका पर्यावरण पर दूरगामी असर होगा.

शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि नया मटेरियल फुटप्रिंट मॉडल पानी जैसे संसाधनों के टिकाऊ प्रबंधन की ओर ध्यान खींचेगा.

शोधकर्ता मानते हैं कि इससे ज़्यादा असरदार और निष्पक्ष जलवायु समझौते हो सकेंगे.

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