एक अभियान, जिससे बदल गया नीदरलैंड्स

सड़कें लोगों को आपस में जोड़ती हैं, ये लोगों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए सुगम रास्ता उपलब्ध कराती हैं.

लेकिन दुर्भाग्यवश हर वर्ष सड़क दुर्घटनाओं में हज़ारों लोग मारे जाते हैं.

लेकिन नीदरलैंड्स्स में 1970 के दशक में हुए एक सड़क सुरक्षा अभियान ने वहाँ के बुनियादी ढाँचे में क्रांतिकारी बदलाव किए.

1971 में नीदरलैंड्स्स में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में मोटर वाहनों से रिकॉर्ड लगभग 3300 लोगों की मौत हुई. जिनमें 500 बच्चे भी शामिल थे.

बीबीसी की विटनेस सेवा में अपना अनुभवों को साझा किया 1970 के दशक में रोड सेफ्टी अभियान में अहम योगदान देने वाली एक समाजसेवी वैन पुटन ने.

'स्टॉप द किंडरमूर'

वैन पुटन कहती हैं, ''1970 के दशक में नीदरलैंड्स्स में सड़क दुर्घटना बहुत बड़ी संख्या में होती थीं, और इनमें मरने वाले बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा थी. मैं भी अपने एक साल के बेटे को लेकर बहुत ज्यादा चिंतित थी.''

पुटन बताती हैं, ''एक दिन मैंने सड़क पर एक 8-9 साल की बच्ची को हाथ में छाता लिए सड़क पर करते देखा. सामने से आ रही एक कार की टक्कर से एक बूढ़ी महिला को बचाने की कोशिश में उस बच्ची ने अपनी जान गँवा दी. एक छोटी बच्ची की इस कोशिश को देखकर मुझे सड़क दुर्घटनाओं के लिए लोगों को जागरुक करने का विचार मन में आया.''

उस समय के नीदरलैंड्स्स के राष्ट्रीय अखबार के प्रतिष्ठित पत्रकार विक लैंगन हॉफ के बेटे की स्कूल जाते समय सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी.

इसके बाद उन्होंने सड़क दुर्घटनाओं पर आर्टिकल की एक शृंखला लिखी. अपना पहला आर्टिकल उन्होंने 'स्टॉप द किंडरमूर' हेडलाइन से लिखा. जिससे नीदरलैंड्स्स में काफी उथल-पुथल पैदा की.

इस आर्टिकल में उन्होंने लोगों से अपने बच्चों को सड़क दुर्घटनाओं से बचाने के लिए बस से स्कूल भेजने की अपील की. उन्होंने लोगों से अपने बच्चों को सड़क पर मरने से बचाने के लिए सड़क सुरक्षा अभियान में शामिल होने को कहा.

अनूठा विरोध

Image caption नशे में वाहन चलाना सड़क हादसों के सबसे बड़े कारणों में से एक है.

पुटन ने बीबीसी को बताया, ''इसके बाद पूरे नीदरलैंड्स्स में सड़क दुर्घटनाओं के प्रति लोगों को जागरुक करने के लिए बड़े स्तर पर अभियान चलाया गया. देश के पश्चिमी भाग एम्सटर्डम, हेग समेत कई शहरों में सड़क सुरक्षा अभियान को लोगों का भरपूर समर्थन मिला.''

पूरे देश में बैनरों, नारों के साथ बच्चों की सुरक्षा को लेकर प्रदर्शन होने लगे. लोगों ने सरकार से वहाँ की सड़कों की डिजाइन में बुनियादी बदलाव करने की अपील की.

लोगों ने सरकार से सड़कों पर साइकिल और बाइक के लिए अलग लेन बनाने की भी मांग की.

पुटन कहती हैं, ''पूरे नीदरलैंड्स में लोगों में भारी गुस्सा था. हम आफिस और दुकानों में जाकर लोगों से पैसे देने की अपील की ताकि हम इस अभियान को चला सकें. इस अभियान के दौरान लोगों ने अपनी डाइनिंग टेबल सड़कों पर निकाल ली और वहीं खाना खाया ताकि बच्चों के लिए मौत का सबब बनी सड़क दुर्घटनाओं को रोकने का ये अनूठा विरोध उस समय पूरे नीदरलैंड्स में जोर-शोर से जताया गया.''

नीदरलैंड्स में उस समय लगभग तीस लाख मोटरवाहन सड़कों पर थे, औऱ सड़कों पर रविवार के दिन भी यातायात जाम लगा होता था. वहाँ की सड़कों पर कार के अलावा किसी और वाहन के लिए जगह ही नहीं होती थी. लोगों में नीदरलैंड्स की सड़कों और गलियों के बुनियादी ढांचे को लेकर खासा गुस्सा था.

बुनियादी ढांचे का बदलना

वैन पुटन कहती है, ''नीदरलैंड्स के एक मंत्री के बेटे की भी सड़क दुर्घटना में मौत हो गई. हमने बैनरों औऱ स्लोगन लिखकर अपील की उन्हें हमारे साथ हमारे अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए, क्योंकि उनका अपना बेटा भी इन सड़क हादसों का शिकार हुआ है.''

इन रोड सेफ्टी अभियान में कई रोड डिजाइनर भी शामिल थे. लोगों ने सरकार से सड़क के बुनियादी ढांचों को बदलने और उन्हें सीधे न बनाकर कई मोड़ देकर बनाने की मांग की. ताकि मोटर वाहनों की गति पर नियंत्रित किया जा सके औऱ सड़क हादसों के आंकड़ों को कम किया जा सके.

नीदरलैंड्स में उस समय इस अभियान से जुड़े कार्यकर्ताओं ने बच्चों को बचाने के लिए एक गाना भी तैयार किया, जिससे लोगों को सड़क हादसों के प्रति जागरुक किया जा सके.

इसके बाद नीदरलैंड्स में सड़कों औऱ गलियों के बुनियादी ढांचों में बदलाव कर उन्हें लोगों की सहूलियत के हिसाब से सुरक्षात्मक बनाया गया. यहाँ तक कि उनके रंग, टेक्सचर और डिजाइन भी पूरी तरह से बदल गए.

नीदरलैंड्स में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाले आंकड़ो में तेजी से कमी आई और आज विश्व भर में सड़क दुर्घटना में होने वाली मौत का आंकड़ा नीदरलैंड्स में सबसे कम है.

नीदरलैंड्स आज विश्व के सबसे साइकिल फ्रेंडली देशों में शामिल है.

'सड़क हादसों में अव्वल' भारत

2012 में भारत में कुल 4,40,042 सड़क दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें 1,39,091 लोगों ने अपनी जान गवां दी.

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक मरने वालों में 11,571 पैदल यात्री थे.

आईआरएफ के आंकड़ों की मानें तो ये आंकड़ा पिछले 10 सालों में लगभग दोगुना हो गया है.

अंतरराष्ट्रीय सड़क महासंघ के अनुसार भारत में सड़क दुर्घटनाओं से सरकार को हर साल एक लाख करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है.

'सड़क हादसों से एक लाख करोड़ रूपए का नुकसान'

Image caption विशेषज्ञ मानते हैं कि पूरी दुनिया के 20 फीसदी सड़क हादसे भारत में ही होते है.

अंतरराष्ट्रीय सड़क महासंघ (आईआरएफ) एक गैरलाभकारी संस्था है जो सड़क व्यवस्था संबंधी मामलों की देख-रेख करती है.

योजना आयोग की ओर से साल 2001-2003 में कराए गए एक शोध में पता चला था कि वर्ष 1999-2000 में हुई सड़क दुर्घटनाओं में 55 हज़ार करोड़ रूपए का नुक़सान हुआ था.

भारत में यातायात नियमों के लिए चलने वाले अभियान 'सड़क सुरक्षा सप्ताह' और सम्मेलनों तक ही सिमट कर रह जाते हैं.

सड़क सुरक्षा पर एक सम्मेलन के दौरान दिल्ली के संयु्क्त पुलिस आयुक्त (यातायात) सत्येंद्र गर्ग ने माना था कि साल 1988 के मोटर गाड़ी कानून के तहत जुर्माने के प्रावधान काफी अप्रभावशाली है.

'सरकार का रवैया उदासीन'

'अराईव सेफ़' नाम की एक गैरसरकारी संस्था का भी कहना है कि यातायात नियमों की अनदेखी पर मामूली जुर्माना लगाना उसे बढ़ावा देने जैसा है.

आइएनएस के अनुसार इसी गैरसरकारी संस्था के सदस्य हरमन सिंह सिद्धू ने कहा, "संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2011-2012 को 'सड़क सुरक्षा के लिए कदम उठाने का साल' घोषित किया था इसके बावजूद भारत में इसपर कोई ध्यान नहीं दिया गया. ये इस मुद्दे पर हमारी गंभीरता को दर्शाता है."

हरमन सिंह सिद्धू का कहना है कि पूरी दुनिया में होने वाले सड़क हादसों के मामलों का भारत 10 फीसदी हिस्सेदार है. ये हाल तब है जब दुनियाभर के कुल गाड़ियों का सिर्फ एक फीसदी हिस्सा भारत में है.

सिद्धू के अनुसार वियतनाम, कंबोडिया और युगांडा जैसे देशों ने भी वैश्विक हेल्मेट टीका अभियान को अपनाया है लेकिन भारत की राजनीतिक इच्छाशक्ति के कारण भारत अब तक इससे दूर है.

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