विकासशील देशों में चौगुनी है मोटापे की रफ़्तार

विकासशील देशों में मोटापा
Image caption विकासशील देशों में मोटापे में बढ़ोत्तरी को आय के साथ जो़ड़कर देखा जा रहा है.

विकासशील में मोटापे के शिकार प्रौढ़ लोगों की संख्या 1980 के मुक़ाबले लगभग चार गुना बढ़कर क़रीब एक अरब हो गई है.

ब्रिटेन के विशेषज्ञों की एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है.

ओवरसीज डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट (ओडीआई) के अनुसार दुनिया में हर तीसरा व्यक्ति मोटापे का शिकार है. संस्थान ने सरकारों से इक पर काबू पाने का आग्रह किया है.

ब्रिटेन में 64 फ़ीसदी प्रौढ़ लोगों का वज़न सामान्य से ज़्यादा है या वे मोटापे से ग्रस्त हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक़ इससे दिल की बीमारियों और मधुमेह का ख़तरा बढ़ सकता है.

वैश्विक स्तर पर मोटापे से ग्रस्त प्रौढ़ों की संख्या 1980 से 2008 के बीच 23 फ़ीसदी से बढ़कर 34 प्रतिशत हो गई. इनका बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) 25 से अधिक था.

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विकासशील देशों की स्थिति

Image caption दुनिया के प्रौढ़ लोगों में मोटापे का आंकड़ा एक अरब तक पहुंच गया है.

इसमें सबसे ज़्यादा बढ़ोत्तरी विकासशील देशों ख़ासकर मिस्र और मेक्सिको में देखी गई जहां लोगों की आय बढ़ रही है.

ओडीआई की फ़्यूचर डाइट्स रिपोर्ट के अनुसार में आहार में होने वाला बदलाव मोटापे की वज़ह बन रहा है. लोग दालों और अनाज के उपभोग की बजाए वसा, शुगर, तेल और पशु उत्पादों को खाने में ज़्यादा तरज़ीह दे रहे हैं.

1980 में 25 करोड़ लोगों का बॉडी मास इंडेक्स 25 के ऊपर था, जिनको ज़्यादा वज़न वाले या मोटे लोगों की श्रेणी में रखा जा सकता था. वर्तमान में यह संख्या 90 करोड़ 40 लाख के क़रीब पहुंच गई है.

उच्च आय वाले देशों में यह संख्या 55 करोड़ 70 लाख के आसपास है. इस दौरान दुनिया की जनसंख्या लगभग दोगुनी हो गई है.

लेकिन विकासशील देशों में करोड़ों लोग कुपोषण का शिकार हैं. विशेष तौर पर बच्चों का कुपोषण बहुत बड़ी समस्या है.

पिछले साल पॉपुलेशन हेल्थ मैट्रिक्स के प्रकाशित आँकड़ों का इस्तेमाल करते हुए शोधकर्ताओं ने पूरी दुनिया में क्षेत्रीय आधार पर और हर देश में बढ़ते वज़न और मोटापे में होने वाले बदलावों को देखा.

मोटे लोगों की संख्या में सबसे ज़्यादा बढ़ोत्तरी दक्षिण पूर्व एशिया में हुई, जहां यह संख्या सात फ़ीसदी से बढ़कर 22 फ़ीसदी हो गई है.

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मोटापे की वज़ह

Image caption शहरीकरण, जीवनशैली और खानपान की आदतों में बदलाव को मोटापे की प्रमुख वज़ह माना जा रहा है.

रिपोर्ट के लेखकों में शामिल स्टीव विगिंस कहते हैं कि मोटापे के अनेक कारण हो सकते हैं.

उन्होंने कहा, "उच्च आय के कारण लोग अपनी पसंद के भोजन का चुनाव कर रहे हैं. जीवन शैली में बदलाव, तैयार खाद्य पदार्थों की उपलब्धता में बढ़ोत्तरी, विज्ञापन और मीडिया के प्रभाव से असर पड़ा है. इन सारी चीज़ों के कारण खानपान में बदलाव आया है."

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़ वसा, नमक और शुगर का बढ़ता उपभोग दिल की बीमारियों, मधुमेह और कैंसर का कारण बन रहा है.

विगिंस का कहना है, "हमारे सामने लोगों को संतुलित आहार लेने और मोटापा बढ़ाने वाले खाद्य पदार्थों से बचने के लिए प्रेरित करने की चुनौती है."

लंदन स्कूल ऑफ़ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिशिन के एलन डांगर कहते हैं कि दुनिया के अधिकांश देशों में शहरीकरण के कारण लोग संतुलित आहार और परंपरागत खानपान से दूर हुए हैं.

स्वास्थ्य विभाग का यह भी कहना है कि उ्दयोग और स्वास्थ्य विशेषज्ञ खानपान और जीवनशैली को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं.

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