जीन डोपिंगः खेलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती?

  • 14 जनवरी 2014
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खेलों से जुड़ी शायद यह सबसे बड़ी चुनौती है. विशेषज्ञ इसके प्रति इतने संजीदा हैं कि पिछले दस साल से भी अधिक समय से इसका हल निकालने की कोशिश की जा रही है. लेकिन अब तक इस चुनौती का हल निकालने का कोई ठोस तरीका सामने नहीं आ पाया है. ये चुनौती है- जीन डोपिंग.

जीन डोपिंग का मक़सद सीधा और सरल है. इसकी मदद से इंसान की आनुवांशिक बुनावट में इस तरह से फ़ेरबदल किया जाता है कि शरीर की मांसपेशियां पहले से अधिक मज़बूत और गतिशील हो उठती हैं.

उदाहरण के लिए, जीन चिकित्सक प्रयोगशाला में तैयार ख़ास कृत्रिम जीन को मरीज के जीनोम (जीन का समूह) से जोड़ते हैं. फिर इस जीन को प्रभावहीन वायरस की मदद से मरीज के अस्थि-मज्जा में पहुंचाया जाता है.

ऐसा करने से शरीर की मांसपेशियों को तैयार करने वाले हार्मोन उत्तेजित हो जाते हैं, लाल रक्त कणों का बनना बढ़ जाता है. मरीज की कोशिकाओं में पहुंचकर यह नया जीन दवा की तरह काम करता है.

दूसरी ओर, इससे एथलीटों को अपने प्रदर्शन के दौरान अधिक से अधिक ऑक्सीजन मिलती है और वे थकते नहीं हैं.

गैर-क़ानूनी

मांसपेशियों की ताक़त और गति बढ़ाने का यह तरीक़ा काफ़ी विशिष्ट और दुर्लभ है. जीन डोपिंग का इस्तेमाल कमज़ोर मांसपेशियों सहित व्यापक स्तर पर रोगों का समाधान निकालने के लिए किए जा रहे अनुसंधानों में हो रहा है.

इससे सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यह तरीक़ा एथलीटों के लिए कितना फ़ायदेमंद है.

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फ़्रांस के नैंट्स स्थित स्वास्थ्य और चिकित्सा अनुसंधान से जुड़े फ्रेंच नेशनल इंस्टीट्यूट में जीन डोपिंग को विकसित करने में जुटे डॉ फ़िलिप मौलियर ने जब कुछ साल पहले इससे जुड़ा शोध-पत्र प्रकाशित किया तो उसका अच्छा स्वागत नहीं हुआ.

मौलियर ने अपने प्रयोग से साबित कर दिया कि एक ख़ास जीन, एरिथ्रोपोएटिन को कृत्रिम रूप से तैयार करना और फिर उसे शरीर में डालना संभव है.

एरिथ्रोपोएटिन हार्मोन या ईपीओ- जो लाल रक्त कोशिकाओं की उत्पत्ति को नियंत्रित करता है, खिलाड़ियों के लिए ग़ैर-क़ानूनी डोप का ज़रिया बना. यही वह जादुई दवा थी जिसका प्रयोग लांस आर्मस्ट्रांग ने 'टूअर डी फ्रांस' की साइकिल दौड़ में किया था.

शॉर्टकट

फ़िलिप मौलियर के दस्तावेज़ प्रकाशित होने के तुरंत बाद नैंट्स स्थित उनकी प्रयोगशाला में कई लोग मिलने पहुंचे. वे पेशेवर साइकिलिस्ट थे और 'टूअर डी फ्रांस' प्रतियोगिता के प्रतिभागी रह चुके थे.

फ़िलिप मौलियर बताते हैं, "वे लोग बड़े उत्साहित थे. उनका मानना था कि भले ही जीन डोपिंग पर अभी अनुसंधान चल रहा है, लेकिन साइकिलिस्टों के लिए यह उपलब्ध हो जाए तो इसका प्रयोग किया जा सकता है. मैं इस बात से बेहद हैरान-परेशान हो उठा."

एक निष्क्रिय वायरस का इस्तेमाल करते हुए जीनोम में स्थायी बदलाव करके कोशिकाओं का आनुवांशिक इलाज एक जटिल प्रक्रिया है. फ़िलिप मौलियर कहते हैं कि इसका ऐसा कोई शॉर्ट-कट नहीं है जिससे अस्थाई लाभ लिया जा सके.

जब ये पूर्व साइकिलिस्ट डॉ. मौलियर से मिले थे, उसके कुछ साल बाद ईपीओ जीन के बारे में सारी जानकारी इंटरनेट पर उपलब्ध हो गई थी और कोई भी उसे पा सकता था.

डॉ. मौलियर कहते हैं, "फ़ौरी लाभ वाले इन तरीक़ों को पकड़ पाना जाँचकर्ताओं के लिए काफ़ी मुश्किल होता है."

गंभीर सवाल

लेकिन वर्ल्ड एंटी-डोपिंग एजेंसी (वाडा) इस बारे में क्या कर रही है ?

साल 2003 में वाडा ने जीन डोपिंग को प्रतिबंधित कर दिया था.

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Image caption जीन अब रसोईघर में भी तैयार किए जा सकते हैं.

एजेंसी का मानना है कि यह तरीक़ा अनुचित होने के साथ ही खिलाड़ियों के लिए घातक भी हो सकता है.

शरीर में ईपीओ-जीन की अतिरिक्त इकाई उत्पन्न होने से ढेरों लाल रक्त कोशिकाओं का निर्माण हो सकता है जिससे खून के ज़्यादा ही गाढ़ा होने का ख़तरा रहता है.

जीन-डोपिंग की जाँच का तरीक़ा है या नहीं, यह पूछने पर वाडा के विज्ञान निदेशक ओलिवियर रॉबिन ने स्पष्ट जवाब नहीं दिया.

उन्होंने कहा, "पिछले 10 साल से ज़्यादा समय से हम जीन डोपिंग का पता लगाने वाली तकनीक विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं और हमें यक़ीन है कि हमने जीन डोपिंग का पता लगाने का तरीक़ा खोज लिया है."

मगर इससे जुड़े कुछ गंभीर सवाल भी हैं. भले जीन डोपिंग का पता लगाने का कोई क़ानूनी या जैविक तरीका मिल जाए, लेकिन सवाल है कि यदि जीन थैरेपी का इस्तेमाल व्यापक स्तर पर होने लगे या इसका इस्तेमाल रोज़मर्रा की बात बन जाए ?

क्या होगा अगर हम दवा की साधारण दुकानों से मांसपेशियों में होने वाली कमजोरी को रोकने वाली जेनेटिक दवाई ख़रीदने में सक्षम हो जाएं? क्या एथलीटों को करियर को लंबा खींचने या खेल के दौरान लगी चोट से ज़ल्दी उबरने में इसका इस्तेमाल करने से रोका जा सकता है?

प्रोफ़ेसर ली स्वीने पिछले दो दशक से जीन थैरेपी के क्षेत्र में कार्य करने वाले प्रमुख अनुसंधानकर्ताओं में एक हैं. पेंसिलवेनिया विश्विद्यालय से जुड़े डॉ. स्वीने वाडा के जीन डोपिंग के बारे में विशेषज्ञ सलाहकारों की टीम का हिस्सा भी हैं.

बहस का मुद्दा

डॉ. मौलियर की तरह ही डॉ. स्वीने ने भी इस विषय पर शोध पत्र प्रकाशित करवाया था और खेल से जुड़े लोगों ने उनसे संपर्क किया था.

1990 के दशक में किया गया स्वीने का शोध आईजीएफ़-1 जीन को चूहों में प्रत्यारोपित करने से संबंधित था.

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स्वीने कहते हैं, "हमसे कई खिलाड़ियों और यहाँ तक कि प्रशिक्षकों तक ने संपर्क किया था. वो ये नहीं समझ रहे थे कि इस प्रयोग का अभी शुरुआती चरण है और मनष्यों के प्रयोग के लिए अभी यह तैयार नहीं है."

लेकिन इस तकनीक के प्रयोग को लेकर डॉ. स्वीने के विचार वाडा के रूढ़िवादी मानकों से अलग हैं.

स्वीने कहते हैं, "मुझे लगता है कि किसी व्यक्ति को ऐसी किसी तकनीक का इस्तेमाल करने से रोक देना अनैतिक होगा जो उसकी मांसपेशियों को वर्तमान और भविष्य में भी अधिक मज़बूत बनाए. जब तक सुरक्षा से जुड़ा कोई ख़तरा न हो, मुझे नहीं लगता कि किसी को केवल इसलिए सज़ा मिलनी चाहिए कि वह एथलीट है. हालाँकि मैं वाडा की टीम में हूँ लेकिन इस मसले पर मेरे विचार उससे थोड़े अलग हैं."

ऐसा लगता है कि जीन डोपिंग की प्रकृति ऐसी है कि इसके सही या ग़लत इस्तेमाल के बीच विभाजन रेखा खींचना कठिन और नैतिक रूप से असहज कर देने वाला होगा.

इसके लिए खेल अधिकारियों, एथलीटों और प्रशंसकों को खेल की एक नई परिभाषा पर एकमत होना होगा.

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