हाई-स्पीड इंटरनेट के ‘भीष्म’ को ‘टेक्नोलॉजी नोबेल’

  • 24 जनवरी 2014
आरोग्यास्वामी जोसेफ़ पॉलराज इमेज कॉपीरइट STANFORD.EDU

अमरीका के स्टैनफ़र्ड यूनिवर्सिटी में काम कर रहे भारतीय मूल के प्रोफ़ेसर वैज्ञानिक आरोग्यास्वामी जोसेफ़ पॉलराज को वायरलेस तकनीक में उनके सहयोग के लिए साल 2014 का मारकोनी पुरस्कार दिया गया है.

इस पुरस्कार को आम बोलचाल की भाषा में टेकनोलॉजी नोबेल भी कहा जाता है.

आरोग्यास्वामी जोसेफ़ पॉलराज का जन्म तमिलनाडु के कोयंबतूर में हुआ था.

पुरस्कार देने वाली मारोकनी सोसाइटी का कहना है कि सिगनल रिसीव और ट्रांस्मिट करने के लिए एक से ज़्यादा एंटीना का प्रयोग करने की प्रोफ़ेसर पॉलराज की थ्योरी आज की आधुनिक हाई स्पीड वाई-फ़ाई और 4जी तकनीक की जान है.

संस्था के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर सर डेविड पेन ने कहा, “वायरलेस तकनीक के क्षेत्र में पॉल (प्रोफ़ेसर पॉलराज) का अभूतपूर्व योगदान है और इससे इंटरनेट यूज़र्स को जो फायदा पहुंचा है उस पर किसी को शक नहीं है. हर वाई-फाई राउटर और 4जी फोन में पॉल की मीमो (MIMO) टेक्नोलॉजी का प्रयोग होता है.”

4जी और वाई-फ़ाई तकनीक

सर डेविड पेन का कहना है कि प्रोफ़ेसर पॉलराज के काम ने हज़ारों नए रिसर्चरों को शोध की एक नई दिशा दी है.

प्रोफ़ेसर पॉलराज कहते हैं, “मीमो तकनीक का प्रयोग 4जी मोबाइल और वाई-फ़ाई में हो रहा है. इस तकनीक को पाने के लिए दुनियाभर के हज़ारों रिसर्चर और इंजिनियरों ने मदद की. उनके सहयोग के मुकाबले इस तकनीक को मेरा सहयोग काफ़ी छोटा है.”

प्रोफ़ेसर पॉलराज की जीवन कहानी भी कम रोचक नहीं है. भारत में जन्में प्रोफ़ेसर पॉलराज शुरू से ही एक अच्छे विद्यार्थी थे और सिर्फ 15 साल की आयु में ही उन्होंने स्कूल की पढ़ाई पूरी कर ली थी.

मारकोनी सोसाइटी के अनुसार पढ़ाई के बाद पॉलराज कुछ समय के लिए भारतीय नौसेना में भी शामिल हुए. उन्होंने नौसेना की इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग ब्रांच में जाने का निश्चय किया.

उन्हें नौसेना में हथियारों के नियंत्रण का काम मिला, लेकिन उनका मन कुछ नया करने का था. उन्होंने नियंत्रण तकनीक, संचार और सिगनल सिस्टम के बारे में आगे की पढ़ाई शुरू की.

नौसेना से आईआईटी

पॉलराज के काम से नौसेना में उनके वरिष्ठ इतने खुश हुए कि साल 1969 में नौसेना ने उन्हें आगे की पढ़ाई (एमएस) के लिए आईआईटी दिल्ली भेज दिया.

आईआईटी में भी उनका काम बेहतरीन रहा और वहां के प्रोफ़ेसर पीवी इंदिरेसन ने उन्हें पीएचडी के लिए भर्ती कर लिया. इसके लिए प्रोफ़ेसर पीवी इंदिरेसन ने नौसेना को खुद मनाया. आईआईटी में आगे की पढ़ाई के इस मौके ने पॉलराज की ज़िंदगी बदल दी.

उन्हें पढ़ने देने का फल भारतीय नौसेना को भी मिला. मारकोनी सोसाइटी के अनुसार 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध में भारतीय नौसेना की ‘सोनार’ तकनीक में भी खामियां पता चली. पॉलराज ने इस तकनीक पर काम किया और सिगनल प्रोसेसिंग की कई नई थ्योरी की खोज की. तीन साल बाद ही ये तकनीक भारतीय नौसेना के बेड़ों में इस्तेमाल किया गया.

मारकोनी सोसाइटी के मुताबिक, भारतीय नौसेना से सेवानिवृत एडमिरल आरएच ताहिलियानी ने कहा, “भारतीय नौसेना पॉलराज की उपलब्धियों पर गौरवांवित महसूस करती है और एपीएसओएच सोनार के क्षेत्र में उनके किए कार्य के लिए हमेशा उनकी शुक्रगुज़ार रहेगी.”

रेडियो की खोज करने वाले गुगलिएल्मो मारकोनी के नाम पर ये पुरस्कार हर साल दिया ऐसे लोगों को दिया जाता है जिन्होंने संचार और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कोई बड़ा काम किया हो, जिससे सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्र का उद्धार हुआ हो.

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