पोलियो के बाद अब कैंसर को दीजिए मात

  • 4 फरवरी 2014
फेफड़े का कैंसर Image copyright spl

विश्व कैंसर दिवस के मौक़े पर मंगलवार को पूरी दुनिया कैंसर के ख़ात्मे का संकल्प ले रही है, लेकिन ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि पूरी दुनिया में कैंसर की बीमारी और इससे होने वाली मौतों में इज़ाफ़ा हो रहा है. एक अनुमान के मुताबिक़ सिर्फ़ 2012 में ही कैंसर के 1.4 करोड़ नए मामले सामने आए.

विश्व स्वास्थ्य संगठहन यानी डब्ल्यूएचओ की एक ताज़ा रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि अगले दो दशक को दौरान हर साल कैंसर के नए मामलों की संख्या बढ़कर 2.2 करोड़ हो सकती है.

इस रिपोर्ट के मुताबिक़ इस दौरान कैंसर से होने वाली मौतों की संख्या हर साल 82 लाख से बढ़कर 1.3 करोड़ हो जाएगी.

तरीक़ों में बदलाव

इस रिपोर्ट के सह-लेखक और इंटरनेशनल एजेंसी फ़ॉर रिसर्च ऑन कैंसर (आईएआरसी) के निदेशक डॉक्टर क्रिस्टोफर वाइल्ड ने बताया, "रिपोर्ट बताती है कि हम अपने पुराने तौर-तरीक़ों से कैंसर का मुक़ाबला नहीं कर सकते हैं."

उन्होंने कहा, "इसके लिए अधिक प्रतिबद्धता और समय रहते बीमारी का पता लगाने की ज़रूरत है."

दुनिया भर में सबसे ज़्यादा कैंसर के मामले फेफड़े से संबंधित हैं जबकि दूसरा स्थान स्तन कैंसर का है.

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हर साल सबसे अधिक मौतें भी फेफड़े के कैंसर से होती है.

जानकारी का अभाव

विकासशील देशों में भी कैंसर तेज़ी से फैल रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनियाभर में कुल कैंसर के मामलों में 60 प्रतिशत से अधिक मामले अफ्रीका, एशिया और मध्य और दक्षिण अमरीका से हैं.

इस इलाक़ों की कैंसर से होने वाली कुल मौतों में 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी है.

रिपोर्ट के मुताबिक़ विकासशील देशों में कैंसर से जुड़ी जानकारी और शुरुआती उपचार का अभाव है.

ज़्यादातर मौतें समय रहते इलाज शुरू नहीं हो पाने के चलते होती हैं.

टल सकता है ख़तरा

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विकासशील देशों में अगर वाजिब क़ीमत पर बेहतर इलाज की सुविधा मुहैया कराई जाए तो कैंसर से होने वाली ज़्यादातर मौतों को टाला जा सकता है.

ख़ासतौर से बचपन में होने वाले कैंसर का इलाज काफ़ी हद किया जा सकता है और इससे मृत्यु दर में काफ़ी कमी आएगी.

रिपोर्ट के मुताबिक़ अगर कैंसर के बारे में उपलब्ध जानकारी पर समय रहते पूरी तरह से अमल किया जाए तो कैंसर से होने वाली मौत के आंकड़े को घटाकर आधा किया जा सकता है.

सख़्ती की ज़रूरत

भारत जैसे देशों में कल-कारख़ानों में सुरक्षा मानकों की कमी के चलते बड़ी संख्या में कैंसर फैलता है.

रिपोर्ट में कैंसर के रोकथाम के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति पर जोर दिया गया है, क्योंकि इसके लिए काफ़ी बजट की ज़रूरत है.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सिर्फ़ जागरुकता कार्यक्रम चलाने की जगह कैंसर की रोकथाम के लिए सख़्त से सख़्त क़ानून बनाने होंगे.

जैसा कि तंबाकू की रोकथाम के लिए टैक्स में बढ़ोतरी, विज्ञापन पर पाबंदी और अन्य उपाए के ज़रिए किया जा रहा है.

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