दर्द सहने का भी एक 'बटन' होता है

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Image caption पांच में से एक व्यक्ति तेज या स्थायी दर्द से परेशान रहता है.

इंसान के शरीर में 'डिमर स्विच' यानि एक आनुवांशिक बटन मौजूद होता है जो दर्द के एहसास को नियंत्रित करता है. ब्रिटेन के वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बटन को बदला जा सकता है.

लंदन के किंग्स कॉलेज के शोधकर्ताओं ने यह बात अपने नए शोध के आधार पर कही है.

ब्रितानी शोधकर्ताओं के अनुसार जिन जुड़वा बच्चों के जीन आपस में सौ फीसदी मिलते हैं उनके दर्द सहने की क्षमता भी अलग अलग होती है. शोध में यह पता चला है कि दर्द सहने की उनकी क्षमता को नई जीवन शैली या दवाइयों से बदला जा सकता है.

विज्ञान की पत्रिका 'नेचर कम्यूनिकेशन' में लिखी गई रिपोर्ट के अनुसार इस शोध से नई दर्द निवारक गोलियों का ईजाद होगा या जीवनशैली के नए अंदाज सामने आएंगे.

माना गया है कि पांच में एक व्यक्ति तेज या स्थायी दर्द से पीड़ित होता है.

प्रमुख शोधकर्ता डॉ. जार्डन बेल का कहना है कि दर्द की संवेदनशीलता के लिए जिम्मेदार जीन को नियंत्रित करने की क्षमता के बारे में जानना काफी रोमांचक होगा. इससे स्थायी दर्द से पीड़ित मरीजों के लिए ज्यादा असरकारक इलाज निकालना संभव हो सकता है.

दर्द की सीमाएं

Image caption अध्ययन में जुड़वां बच्चों को शामिल किया गया था.

दर्द की संवेदनशीलता के स्तर को मापने के लिए वैज्ञानिकों ने एक समान दिखने वाले 25 जुड़वा जोड़ों को चुना. उनकी बांह पर गर्म वस्तु रख कर उनके दर्द सहने की सीमा जानने की कोशिश की गई.

एक समान जुड़वा के जीन आपस में सौ फीसदी समान होते हैं. यदि उनके दर्द सहने की क्षमता में फर्क है तो ऐसा उनके आस-पास के माहौल के कारण हो सकता है या उनकी जीन को प्रभावित करने वाले कारकों के कारण हो सकता है.

शोध में शामिल प्रतिभागियों को कहा गया कि जब गर्मी उनके लिए असहनीय हो जाए तो वे अपने बांह पर बंधी पट्टी का बटन दबा दें. इससे शोधकर्ताओं को प्रतिभागियों के दर्द सहने की सीमा का अंदाजा लगाने में मदद मिली.

डीएनए अनुक्रमण की मदद से शोधकर्ताओं ने जुड़वां बच्चों के संपूर्ण आनुवांशिक कोड या जीनोम की जांच की. फिर इसकी तुलना उन 50 लोगों से की गई जो आपस कहीं से समान नहीं थे.

शोधकर्ताओं की टीम ने पाया कि जुड़वा बच्चियों में से एक बच्ची के दर्द सहने की क्षमता को प्रभावित करने वाले नौ जीनों में दूसरी बच्ची की तुलना में कुछ रसायनिक बदलाव आ चुके थे.

यह जानकारी दर्द की संवेदनशीलता निर्धारित करने वाले जीन के संदर्भ में काफी महत्वपूर्ण है. दर्दनाशक गोलियों को विकसित करने के पीछे भी यही कारण रहा.

जीन को निष्प्रभावी और प्रभावी बनाने वाला यह शोध 'एपिजेनेटिक रेगुलेशन' प्रक्रिया के नाम से जाना जाता है. यह प्रक्रिया नई दवाओं की खोज में काफी सहायक साबित हो रही है.

ऐतिहासिक शोध

लंदन के किंग्स कॉलेज में जेनेटिक एपिडेमियोलोजी के प्रोफेसर, टिम स्पेक्टर का कहना है कि 'ऐपिजेनेटिक स्विचिंग' उस 'डिमर स्विच' की तरह है जिसे जीन खुद को अभिव्यक्त करने के लिए इस्तेमाल करता है.

Image caption दर्द सहने की क्षमता को जीवनशैली में बदलाव लाकर बढ़ाया जा सकता है.

उन्होंने बताया, "यह एक ऐतिहासिक अध्ययन है. यह अध्ययन हमें बताता है कि लाखों एपिजेनेटिक सिग्नल का पता लगाने के लिए किस तरह एक समान जुड़वा बच्चों को आधुनिकतम तकनीक के जरिए आपस मे जोड़ा जाता है, तो उनमें आए परिवर्तन से हमारे जीन में मौजूद नन्हें रसायनिक बटनों का पता चलता है. ये बटन हमें खास बनाते हैं."

प्रो. स्पेक्टर ने आगे जोड़ा, "किसी व्यक्ति की दर्द सहने की सीमा क्या हो सकती है यह हमें ये रसायनिक बदलाव से पता चलता है. ये रसायनिक बदलाव थर्मोस्टैट या 'डिमर स्विच' की तरह काम करते हैं."

उन्होंने बीबीसी को बताया, "दवा लेने या जीवनशैली में बदलाव करने से हम इन थर्मोस्टैट को अपने अनुसार सेट कर सकते हैं. इससे भविष्य में हमें दर्द का अनुभव पहले से कम होगा."

"जबकि इस बात की पूरी संभावना है कि एपिजेनेटिक बदलाव इसके उलट हो."

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