नाज़ियों ने किया था 'मच्छरों पर शोध'

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जर्मनी के वैज्ञानिकों ने दूसरे विश्व युद्ध में मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों के हथियार के तौर पर इस्तेमाल को लेकर शोध किया था, एक शोधकर्ता ने ये दावा किया है.

टूइबगेन विश्वविद्यालय के डॉक्टर क्लाउज़ राइनहार्ट ने डखौव के कीट अनुसंधान संस्थान में दस्तावेजों का अध्ययन किया है. डखौव में नाज़ियों का यातना शिविर था.

डॉक्टर राइनहार्ट ने पाया कि जीवविज्ञानियों ने इस बात का अध्ययन किया था कि कौन से मच्छर अपने प्राकृतिक आवास से बाहर जीवित रहने में सक्षम होंगे. डॉक्टर राइनहार्ट का मानना है कि ऐसा लगता है कि इन मच्छरों को दुश्मन के इलाके में गिराए जाने की रणनीति रही होगी.

नाज़ियों के अर्धसैनिक संगठन शुट्ज़स्टाफ़ेल के नेता हाइनरिख हिमलर ने डखौव के कीट अनुसंधान संस्थान की स्थापना साल 1942 में की थी.

बीमारी

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Image caption डखौव यातना शिविर में कुछ बंदियों पर जबरन प्रयोग किए गए थे.

माना जाता है कि इस संस्थान का काम कीड़ों से होने वाली बीमारियों पर ध्यान देने का था.

डॉक्टर राइनहार्ट ने विज्ञान जर्नल 'एंडीवर' में लिखा है कि उन्हें इस बात के सबूत मिले हैं कि इस यूनिट के शोधकर्ता एक ख़ास किस्म के मच्छर पर शोध कर रहे थे जो कि पानी और खाने के बगैर चार दिन तक रह सके.

उनका कहना है कि इसका मतलब ये हुआ कि इस मच्छर को मलेरिया से संक्रमित करने के बाद इसे हवा से गिराया जाता, ये लंबे समय तक जीवित रहता और बड़ी तादाद में लोगों को संक्रमित करता.

उनका अनुमान है कि वैज्ञानिक मलेरिया के जैविक हथियार के तौर पर संभावित उपयोग की जांच कर रहे थे.

अभी ये साफ़ नहीं है कि डखौव के कीट अनुसंधान संस्थान के काम और डखौव के यातना शिविर में डॉक्टर क्लाउज़ शिलिंग ने जो प्रयोग किए उनमें कोई संबंध है या नहीं.

डॉक्टर शिलिंग ने मलेरिया को लेकर किए प्रयोगों में बंदियों का इस्तेमाल किया था, उन्हें जानबूझकर संक्रमित किया गया था. डॉक्टर शिलिंग को दूसरे विश्वयुद्ध के बाद फांसी की सज़ा दे दी गई थी.

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