वैज्ञानिकों ने बनाया 'न सड़ने वाला आलू'

  • 18 फरवरी 2014
लाल आलू

ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने ऐसा जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) आलू विकसित किया है जिसमें लेट ब्लाइट (फफूंद के कारण होने वाली सड़न) नहीं होगी.

तीन साल तक किए गए परीक्षण में यह जीएम आलू इस बीमारी के प्रभाव में आने के बावजूद विकसित होने में सफल रहा.

फफूंद के कारण होने वाली सड़न से किसान कई पीढ़ियों से परेशान रहे हैं. आलू में फफूंद से होने वाली सड़न के कारण ही आयरलैंड में साल 1840 के दशक में आलू की खेती का सूखा पड़ा था.

यह शोध फिलोसॉफिकल ट्रांजेक्शन ऑफ दि रॉयल सोसाइटी ब्रिटेन जर्नल में प्रकाशित हुआ है.

यूरोप में प्रभाव

फफूंद के कारण सड़न का सबसे आसान शिकार आलू ही होता है. आलू जैसी सब्ज़ियों को सड़ाने वाली यह फंफूद नमी और उमस वाले मौसम में विशेष रूप से पनपती है. यूरोप में आलू के उत्पादन के मौसम में आमतौर पर नमी और उमस पाई जाती है.

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यह संक्रमण बहुत तेज़ी से फैलता है और इसका असर इतना व्यापक होता है कि ब्रिटेन में पैदा होने वाले कुल आलू में से 60 लाख टन आलू इसकी वजह से सड़ जाता है.

इससे बचने के लिए किसानों को लगातार सावधान रहना पड़ता है. इससे बचाव के लिए उन्हें साल में 15 बार तक कीटनाशकों का छिड़काव करना पड़ता है.

बॉयो-टेक्नॉलॉजी के प्रयोग से फसलों को बचाने की संभावना की जांच के लिए यूरोप-स्तर पर शोध कर रहे जॉन इन्ज़ सेंटर और सेंसबरी प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों ने साल 2010 से ही जेनेटिक मॉडिफिकेशन की सहायता से ऐसी सड़न रोकने के लिए परीक्षण शुरू कर दिए थे.

शोधकर्ताओं ने लाल आलू की एक प्रजाति में दक्षिणी अमरीका के एक जंगली आलू का एक ऐसा जीन डाला जिसकी वजह से इस आलू में फफूंद से होने वाली सड़न के ख़िलाफ़ प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने में मदद मिली.

शोध से जुड़े हुए वैज्ञानिकों ने बताया कि इस आलू में अतिरिक्त जीन डालना आलू के पौधे की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए ज़रूरी है.

इस शोधपत्र के प्रमुख लेखक और सेंसबरी प्रयोगशाला के प्रोफ़ेसर जोनाथन जोंस कहते हैं, "मुझे लगता है कि इस बीमारी पर रासायनिक रूप से नियंत्रण करना बेहतर विकल्प है."

साल 2012 में परीक्षण के तीसरे साल ग़ैर-जीएम आलुओं में अगस्त तक सड़न होने लगी थी जबकि जीएम आलुओं में सड़न नहीं हुई.

दूसरी सबसे ख़ास बात है कि इन जीएम आलुओं की पैदावार की दर भी सामान्य आलुओं से लगभग दोगुनी रही.

स्वाद का सवाल

हालांकि वैज्ञानिकों ने इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं की है कि इस जीएम आलू का स्वाद कैसा है क्योंकि उन्हें जीएम आलू को खाने की मनाही थी. लेकिन वैज्ञानिकों ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि ऐसी कोई वजह है जिससे नए जीन से आलू का स्वाद बदल जाए.

फफूंद के कारण होने वाली सड़न बार-बार सिर उठा लेने वाली बीमारी है इसलिए सेंसबरी प्रयोगशाला के वैज्ञानिक ऐसे जीन की तलाश में हैं जो आलू की प्रतिरोधक क्षमता को और ज़्यादा बढ़ा सके.

बिना खाद वाली फसलें तैयार करने की कोशिश

इस तकनीक से आलुओं में फफूंद के कारण सड़न की मात्रा में काफ़ी कमी आ सकेगी. हालांकि इससे यह जीएम आलू थोड़ा महंगा हो जाएगा.

प्रोफ़ेसर जोंस कहते हैं, "फिर भी इससे किसानों को फायदा ही होगा. उन्हें बीज पर ज़्यादा खर्च करना होगा लेकिन सड़न से बचाव पर होने उनके खर्च में काफ़ी कमी आएगी."

वैज्ञानिकों का मानना है कि असल चुनौती इस जीएम आलू के उत्पादन की अनुमति प्राप्त करना है.

वैज्ञानिकों ने इस जीएम आलू के उत्पादन का लाइसेंस एक अमरीकी कंपनी सिम्पलोट को दिया है.

यह कंपनी इस आलू को अमरीका में पैदा करना चाहती है.

प्रोफ़ेसर जोंस कहते हैं, "यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि यूरोप के करदाताओं के पैसे का लाभ यूरोप के लोगों से पहले अमरीकी किसानों को मिलेगा."

वे कहते हैं, "इस तरह के उत्पाद अमरीकी बाज़ार में अगले कुछ सालों में और यूरोप में अगले आठ से 10 सालों में आएँगे."

कौन पैदा करेगा, खाएगा और बेचेगा ?

जीएम खाद्य पदार्थों के आलोचकों का कहना है कि चाहे जितना भी बड़ा पर्यावरणीय लाभ हो उन्हें विश्वास है कि ग्राहक इसमें रुचि नहीं दिखाएंगे.

इस तरह के खाद्य पदार्थों का विरोध करने वाली संस्था जीएम फ्रीज़ के निदेशक लिज़ ओ-नील कहते हैं, "क्या सचमुच कोई जीएम आलू पैदा करने, बेचने या ख़रीदने जा रहा है? क़ानून कहता है कि ऐसे पदार्थों पर जीएम लिखना अनिवार्य है. हमारे अनुभव बताते हैं कि ब्रितानी लोग ऐसी चीज़ें नहीं खरीदना चाहते और ब्रितानी ऐसी चीज़ें नहीं पैदा करेंगे जिसे वह बेच नहीं सके."

आलू के डीएनए अनुक्रम का पता लगा

दूसरे कई शोधकर्ताओं ने इस नए शोध का स्वागत करने के बावजूद इस नए जीएम आलू के ब्रिटेन में उत्पादन को लेकर नकारात्मक प्रतिक्रिया दी है.

एबेरीस्टविथ विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर क्रिस पोलाक कहते हैं, "आलू में होने वाली सड़न एक मुश्किल बीमारी है. दुर्भाग्यवश यूरोप का मौजूदा क़ानून काफ़ी महंगा और धीमा है. इसका मतलब यह है कि ब्रितानी वैज्ञानिकों की उपलब्धि का लाभ पहले दूसरे देशों को मिलेगा."

इस परीक्षण के लिए वैज्ञानिकों ने आलू के केवल 600 पौधे उगाए थे. हालांकि तीन साल तक चले परीक्षण में आलुओं को बचाए रखने में 40,000 पाउंड (तक़रीबन साढ़े 41 लाख रुपये) खर्च हुए.

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