सोशल मीडिया का झूठ पकड़ेगा लाई डिटेक्टर !

  • 23 फरवरी 2014
लाई डिटेक्टर

फ़ेसबुक, ट्विटर जैसे सोशल साइटों पर झूठ को पकड़ने के लिए एक अनोखा लाई डिटेक्टर बनाया जा रहा है.

यह सिस्टम इस बात का तत्काल विश्लेषण कर लेगा कि ऑनलाइन पोस्ट सच है कि नहीं.

इससे यह भी पता चल सकेगा कि जिस अकाउंट से पोस्ट किया गया है, कहीं वो ग़लत सूचनाएं फैलाने के लिए ही तो नहीं बनाया गया है.

इसका उद्देश्य, सरकारों समेत अन्य संस्थाओं और इमरजेंसी सेवाओं को प्रभावी जवाबी कार्रवाई के लिए मदद करना है.

2011 में लंदन दंगे के दौरान सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर आधारित शोध के बाद यह प्रोजेक्ट शुरू हुआ.

विश्लेषण किए जाने वाले आंकड़ों में ट्विटर और फ़ेसबुक पर जारी पोस्ट के अलावा हेल्थकेयर फोरमों पर डाली गई टिप्पणियों को भी शामिल किया जाएगा.

स्रोतों की पहचान

इस प्रोजेक्ट की मुख्य शोधकर्ता और शेफील्ड विश्विद्यालय से जुड़ीं डॉक्टर कैलिना बोनशेवा के अनुसार, ''2011 के दंगे के बाद ऐसे सुझाव आए थे कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स को बंद कर देना चाहिए था ताकि दंगाई इकट्ठा न हो सकें.''

वो कहती हैं, ''सोशल साइट्स उपयोगी सूचनाएं भी मुहैया कराती हैं. लेकिन समस्या यह है कि यह सब इतनी तेजी से घटित होता है कि हम झूठ में से सच को उतनी तेज़ी से छांट नहीं सकते.''

यह सिस्टम सूचनाओं के स्रोत को वर्गीकृत कर देगा ताकि उनके सच को जांचा-परखा जा सके.

इन श्रेणियों में समाचार केंद्र, पत्रकार, विशेषज्ञ व प्रत्यक्षदर्शी आदि के खाते शामिल होंगे जिनसे स्वतः पोस्ट जारी होते रहते हैं.

सोशल नेटवर्क पर हुई बातचीत का अध्ययन होगा ताकि पता चल सके कि इनकी शुरुआत कैसे हुई और इस बात की जांच की जाएगी कि सूचना की पुष्टि हो सकती है या नहीं.

बोनशेवा का कहना है कि पोस्ट के केवल लिखित वाक्यों का ही विश्लेषण किया जाएगा.

उनका कहना है, ''हम तस्वीरों का विश्लेषण नहीं करेंगे. इसलिए हम यह नहीं देखने जा रहे हैं कि किसी तस्वीर से छेड़छाड़ हुई है कि नहीं. क्योंकि यह तकनीकी रूप से बहुत जटिल है.''

चुनौती

सिस्टम की खोज के परिणाम एक 'विजुअल डैशबोर्ड' पर दिखाई देंगे ताकि यूज़र जान सकें कि कहीं यह अफ़वाह तो नहीं.

शोधकर्ताओं का दावा है कि परीक्षण के प्राथमिक नतीजे 18 महीने के भीतर आ जाएंगे और पत्रकारोँ और स्वास्थ्य सेवा विशेषज्ञों के समूहों के साथ ही मुख्य रूप से इनका परीक्षण किया जाएगा.

डॉक्टर बोनशेवा ने कहा, ''हमें देखना है कि क्या काम करता है और क्या नहीं. हमें देखना है कि इंसानी विश्लेषण और मशीनीकृत विश्लेषण के बीच हम सुंतलन बिठा पाए कि नहीं.''

इस प्रोजेक्ट का नाम ग्रीस के मिथकीय चरित्र फ़ीम पर रखा गया है जो अफवाहों को फैलाने के लिए विख्यात था.

यह प्रोजेक्ट तीन साल तक चलेगा, जिसमें पांच विश्वविद्यालय, शेफ़ील्ड, वारविक, लंदन का किंग्स कॉलेज, जर्मनी का सारलैंड और वियेना में मॉडल हिस्सा ले रहे हैं.

इसमें चार कंपनियां भी भाग ले रही हैं- एटोस, आईहब, ओंटोटेक्स्ट और स्विसइन्फ़ो.

उम्मीद की जा रही है कि इस परियोजना के आखिर में पत्रकारों के लिए एक टूल बनाया जा सकेगा.

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