स्पेशल इफ़ेक्ट जिनसे बदल रही है फ़िल्मी दुनिया

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पिछले पिछले कुछ वर्षों के दौरान टेक्नॉलॉजी ने फ़िल्मों की दुनिया को तेज़ी से बदला है. फ़िल्में भी इस बदलाव से अछूती नहीं रही हैं.

बीबीसी के टेक्नॉलॉजी कार्यक्रम बीबीसी क्लिक ने फिल्मों में स्पेशल इफ़ेक्ट्स के लिए इस्तेमाल हो रही ऐसी ही तीन टेक्नॉलॉजी का जायज़ा लिया.

फ़िल्म 'ग्रैविटी' में इस्तेमाल तकनीक

इस साल होने वाले ऑस्कर में अगर आप कुछ ख़ास चीज़ें देखने की उम्मीद कर रहे हैं तो यकीन मानिए विजुअल इफ़ेक्ट कैटगरी में फ़िल्म 'ग्रैविटी' ही जीत दर्ज करेगी.

सैंड्रा बुलॉक और जॉर्ज क्लूनी जैसे दमदार सितारों की मौजूदगी के बावजूद इस फिल्म की ख़ासियत लंदन की स्पेशल इफ़ेक्ट्स कंपनी फ्रेमस्टोर का काम है.

वीएफ़एक्स सुपरवाइज़र टिम वेबर के मार्गदर्शन में कंपनी ने निर्देशक अलफांसो क्यूएरन के साथ मिलकर भटके हुए दो अंतरिक्षयात्रियों की कहानी को पर्दे पर उतारा है.

वेबर मानते हैं कि सबसे मुश्किल काम अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण या इसकी सापेक्षिक कमी को दिखाना था और यह डिजिटल तकनीक के ज़रिए संभव हो सका.

इस फिल्म का 80 फ़ीसदी हिस्सा डिजिटल शॉट से बना है. हर फ्रेम को रूपांतरित करने में करीब 50 घंटे लगे और अगर इस पूरी फ़िल्म को एक कम्प्यूटर से रूपांतरित किया जाता तो इसमें करीब 7,000 साल लग जाते.

फ़ेशियल कैप्चर तकनीक

पिछले एक दशक में जहां गतिविधियों की रिकॉर्डिंग का स्तर सुधरा है वहीं इंसानों जैसे दिखने वाले सीजीआई चेहरे (कम्प्यूटर जनरेटेड इमेजरी) बनाने का सफ़र भी आगे बढ़ा है. .

इस प्रक्रिया में कलाकारों को दूर रखने की बजाय अभिनय के दौरान उनके चेहरे के हाव-भाव को रिकॉर्ड किया जाता है.

इसके बाद ये जानकारी सॉफ्टवेयर में डाली जाती हैं ताकि वास्तविक लगने वाले डिजिटल दृश्य मिल सकें.

इस क्षेत्र में सबसे आधुनिक तकनीक है विकॉन कारा.

इसके निर्माताओं का दावा है कि चेहरे के हाव-भाव की 3डी तस्वीरें लेने वाला यह दुनिया का पहला सिस्टम है.

इसमें एक हल्के हैलमेट में चार एचडी कैमरा लगे होते हैं जो कि भावों को कैद करते हैं और अभिनेता को बिना बाधा अपना काम करने देते हैं.

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हालांकि बिल्कुल इंसान जैसे दिखने वाले सीजीआई चलचित्रों के हक़ीक़त में बदलने में अभी वक़्त है.

लेकिन यह इस स्तर पर पहुंच गया है कि इंसानी भाव-भंगिमाओं को बाद में विज़ुअल इफ़ेक्ट के माध्यम से बदला जा सके, हालांकि यह बहुत सूक्ष्म पैमाने पर ही संभव है.

विकॉन के फ़िल एल्डरफ़ील्ड के अनुसार, ''आप वास्तविक अभिनय से शुरुआत कर सकते हैं लेकिन आप चाहें तो इसमें थोड़ा बहुत बदलाव कर सकते हैं- आप इसे सुंदर बना सकते हैं या आप कुछ चीजों के प्रभाव को बढ़ा सकते हैं या कम कर सकते हैं.''

मोशन कैप्चर तकनीक

साल 2001 में फ़िल्म 'फ़ाइनल फैंटेसीः द स्पिरिट्स विदिन' रिलीज़ हुई. व्यापक पैमाने पर रिलीज़ होने वाली यह पहली फ़िल्म थी जिसमें पूरी तरह मोशन कैप्चर तकनीक का इस्तेमाल किया गया था.

ऑडियोमोशन के स्टूडियो ऑक्सफ़र्ड के ठीक बाहर ही स्थित हैं और पिछले कुछ सालों में उन्होंने कई बड़ी फिल्मों और कम्प्यूटर गेम्स पर काम किया है.

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कंपनी की विशेषज्ञता चलचित्र या अभिनय को कैद करने में है. इसमें अभिनेताओं को ख़ास सूट पहनना पड़ता है जो हाई-रिफ्लेक्शन (उच्च परावर्तन) वाले बिंदुओं से ढका रहता है.

इन बिंदुओं की स्थिति सेट में हर ओर लगे कैमरों से रिकॉर्ड की जाती है और विज़ुअल इफ़ेक्ट्स इंजीनियर अभिनेता की किसी खास गतिविधि की डिजिटल पुनर्रचना करने में सक्षम होते हैं.

इस प्रक्रिया ने दूसरी लॉर्ड ऑफ द रिंग फ़िल्म 'द टू टॉवर्स' की रिलीज़ के बाद व्यापक रूप से ख्याति अर्जित की, जिसमें गोलम का किरदार निभाने वाले अभिनेता एंडी सरकिस की काफ़ी तारीफ़ हुई.

पिछले दशक में तकनीकी विकास तेज़ी से हुआ है. बहुत जटिल क्षणों की बारीकियों को कैमरे में कैद कर पाना संभव हुआ है, जबकि ज़्यादा वास्तविक लगने वाले इंसानों जैसे किरदार अब फ़िल्मों और कम्प्यूटर गेम्स में अब आम हो गए हैं.

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