ब्रह्मपुत्र बांधने के नतीजे कौन भुगतेगा?

  • 24 मार्च 2014
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असम में ब्रह्मपुत्र के किनारे खड़े होकर इसका अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता कि नदी कहां से शुरू हो रही है और कहां ख़त्म.

असम में इसका विस्तार इतना ज़्यादा है कि आंखें इसका ओर-छोर नहीं ढूंढ पातीं और यह क्षितिज से मिलती नज़र आती है.

ब्रह्मपुत्र नदी सुदूर तिब्बत में पहाड़ी झरनों से पैदा होती है जहां से यह उत्तर-पूर्वी भारत की ओर बहती है और बांग्लादेश में जाकर गंगा से मिल जाती है. सदियों से ब्रह्मपुत्र ने अपनी धरती को संवारा है और अपने किनारे रहने वाले लोगों को खाना-पानी दिया है.

मगर आज भारत और चीन की विकासशील अर्थव्यवस्थाएं इस नदी को ऊर्जा के स्रोत के रूप में देख रही हैं. दोनों देश इस नदी के लंबे रास्ते पर कई बड़े बांध बनाने की योजनाएं बना रहे हैं.

ब्रह्मपुत्र पर चीन और भारत में बने बांध नक्शे पर देखने के लिए क्लिक करें

मछुआरे सैकड़ों सालों से नदी के किनारे रहते आए हैं. लेकिन अब नदी पर बनने वाले बड़े बाँधों की ख़बर से वह चिंतित हैं.

'बेबुनियाद डर'

स्थानीय मछुआरे हेमकांत दास कहते हैं, "नदी में पहले ही कम पानी है और मछलियां भी कम हैं. हमें डर है कि ऊपर बन रहे बांध हमारी ज़िंदगी को और दुश्वार बना देंगे. हमारे लिए दो वक़्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो जाएगा."

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हिमालय क्षेत्र में निर्माण कार्य की मनाही है, लेकिन यहाँ बाँध बन रहे हैं. अरुणाचल प्रदेश में 100 से ज़्यादा बाँध बनाने की योजना है. वहीं चीन अपने हिस्से में बहने वाली इसी नदी पर बाँध बना रहा है.

असम में पर्यावरणविदों का मानना है कि ब्रह्मपुत्र नदी पर इसका बुरा असर हुआ है. उनका कहना है कि ये मुद्दे गोपनीय रखे जाते हैं, जिससे समस्या और भी बढ़ गई है.

पर्यावरणविद मुबीना अख़्तर कहती हैं, ''मैं यहाँ 18 साल से हूँ और हर साल देखती हूँ कि सर्दियों में यह नदी सँकरी हो जाती है. आप आसानी से कह सकते हैं कि सब ठीक नहीं है.''

ब्रह्मपुत्र के बहाव में बदलाव का असम के विश्व प्रसिद्ध चाय बागानों पर असर पड़ने की भी चिंता जताई जा रही है. मगर भारत सरकार ऐसा नहीं मानती.

केंद्रीय पूर्वोत्तर विकास मंत्री पबन सिंह घाटोवार का कहना है, "कुछ लोग बेबुनियाद डर फैला रहे हैं. हमें बताया गया है कि ब्रह्मपुत्र नदी का बहाव प्रभावित नहीं होगा. कोई सरकार नहीं चाहेगी कि आम जनजीवन पर असर पड़े."

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लेकिन नदियों से जुड़े मामलों के विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे मनुष्य और क़ुदरत के बीच का नाज़ुक तालमेल बिगड़ सकता है.

गुवाहाटी विश्वविद्यालय में पर्यावरण विभाग के दुलाल गोस्वामी पिछले चालीस साल से नदी का अध्ययन कर रहे हैं.

वह कहते हैं, "बड़े बांध इंसान और नदी के बीच क़ायम सदियों पुराने संबंध को गड़बड़ा सकते हैं."

ढलती सांझ में ब्रह्मपुत्र बहुत स्थिर नज़र आती है लेकिन भारत और चीन के बीच का जल विवाद इसकी धारा और रूप को लंबे समय के लिए अस्थिर कर सकता है.

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