फ़ेसबुक महिलाओं के आत्मविश्वास का दुश्मन?

  • 12 अप्रैल 2014
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फ़ेसबुक पर महिलाएं अपने यार-दोस्तों की तस्वीरें देखने में ज़्यादा समय बिताती हैं. शोधकर्ताओं ने ऐसी महिलाओं को ख़बरदार किया है.

शोधकर्ताओं का कहना है कि इससे अपने रंग-रूप और बॉडी इमेज के प्रति उनमें हीन भावना पनपती है.

अध्ययन के मुताबिक़ जो महिलाएं सोशल मीडिया पर 'सेल्फ़ी' तथा दूसरे क़िस्म की तस्वीरें ज़्यादा डालती हैं और देखती हैं, वे दूसरों से ख़ुद की नकारात्मक तुलना करने लगती हैं.

ब्रिटेन और अमरीका के विशेषज्ञों का कहना है कि दोस्तों की तस्वीरें कई बार मशहूर हस्तियों से ज़्यादा प्रभाव डालती हैं क्योंकि वे जानी-पहचानी होती हैं.

सोशल मीडिया का बॉडी इमेज पर नकारात्मक असर पड़ सकता है, इस बात का पता पहली बार इस अध्ययन से चला है.

इससे पहले कोई नहीं जानता था कि सोशल मीडिया आपकी अपनी छवि के प्रति नकारात्मक भावनाएं पैदा करता है.

शोध

नवयुवतियां सोशल मीडिया पर पुरुषों की तुलना में सबसे ज़्यादा समय बिताती हैं. वे इंटरनेट पर अपनी तरह-तरह की तस्वीरें शेयर करती रहती हैं.

बॉडी इमेज पर पड़ने वाले असर के बारे में पता लगाने के लिए ओहियो यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ आईवा और स्ट्रैथक्लिडे यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने कॉलेज में पढ़ने वाली 881 छात्राओं को अपने शोध में शामिल किया.

इन छात्राओं से फ़ेसबुक के इस्तेमाल, खान-पान, कसरत और बॉडी इमेज के बारे में सवाल किए गए.

सिएटल की एक कांफ्रेंस में प्रस्तुत किए गए शोधपत्र में फ़ेसबुक और खाने-पीने की अनियमितता के बीच कोई संबंध नहीं पाया गया.

हां, इस शोधपत्र में इस बात का उल्लेख ज़रूर था कि सोशल नेटवर्क पर बिताए गए समय और बॉडी इमेज के बीच नकारात्मक संबंध होता है.

'बचकानी छवि'

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Image caption पुरुषों की तुलना में महिलाएं फ़ेसबुक पर ज़्यादा तस्वीरें डालती हैं.

शोध में पाया गया कि जो महिलाएं फ़ेसबुक पर ज़्यादा समय बिताती हैं, वे अपने दोस्तों के फिगर, लुक और बॉडी इमेज से अपनी ज़्यादा तुलना करने लगती हैं और फिर अपने रंग-रूप के बारे में नकारात्मक सोच मन में बिठा लेती हैं.

ग्लासगो में स्ट्रैथक्लिडे यूनिवर्सिटी की पेत्या इक्लर ने बीबीसी को बताया, "फ़ेसबुक पर ज़्यादा समय बिताने का संबंध खाने-पीने से जुड़ी अनियमितताओं से नहीं बल्कि खराब बॉडी इमेज से ज़रूर है."

उन्होंने आगे कहा, "सोशल मीडिया पर पर्सनेलिटी और फिगर से जुड़ा प्रभाव परंपरागत मीडिया की तुलना में अधिक ख़तरनाक होता है. ऐसा इसलिए क्योंकि सोशल मीडिया पर हमसे वैसे लोग जुड़े होते हैं, जिन्हें हम जानते हैं.

पेत्या इक्लर ने कहा, "सोशल मीडिया पर मौजूद परिचितों से ख़ुद की तुलना अधिक प्रासंगिक हो उठती है और ज़्यादा चोट करती है."

पहचान

खाने-पीने से जुड़ी गड़बड़ियों के बारे में काम करने वाली चैरिटी संस्था 'बीट' के प्रवक्ता कहती हैं कि बॉडी इमेज हमारी पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है.

वह कहती हैं कि वज़न और फिगर की चिंता आजकल आम बात है. दुनिया भर की महिलाओं में आमतौर पर ये चिंता देखी जा सकती है.

उन्होंने कहा, "जब शरीर बढ़ रहा होता है और उसमें बदलाव आ रहे होते हैं तो उसी दौरान हम अपनी पहचान स्थापित करने की कोशिश में लगे होते हैं. ऐसे में किसी मशहूर हस्ती, उसके शरीर, कपड़े और रंगरूप के प्रति आकर्षण से हमारे ऊपर दबाव बढ़ जाता है."

प्रवक्ता ने कहा, "ऐसे में जब युवा जब अपने लुक और बॉडी इमेज की तुलना उनसे करते हैं, तो उन्हें सदमा पहुंचता है."

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