....और विश्व कप की मेज़बानी मंगल ग्रह को

रोबोकप का फ़ुटबॉल मैच इमेज कॉपीरइट AP

इन दिनों खेल एक विज्ञान है, जिसमें तकनीक बेहद अहम भूमिका निभा रही है. थ्रीडी प्रिटेंड ट्रेनर्स की बात हो या ख़ासतौर पर बनाए गए उपकरणों की बात हो, जो खिलाड़ी की हर गतिविधि के आंकड़ों का विश्लेषण करने में सक्षम हैं.

ओलंपिक में तकनीक मुहैया कराने वाली कंपनी अटॉस के मुख्य तकनीकी अधिकारी जी लिडबेटर मानते हैं कि आगे चलकर फ़ुटबॉल के खेल में आँकड़ों की भूमिका बढ़ जाएगी.

वह कहते हैं, "हम एक ऐसी स्थिति में पहुंच जाएंगे जहां खिलाड़ियों के शर्ट और जूतों पर लगे मॉनीटर हर तरह के आंकड़े टीम कोच तक पहुंचा रहे होंगे."

प्रोफ़ेसर एलेक्जांद्रे डा स्लीवा सिमोंस रोबो कप के प्रमुख हैं, जो रोबोट की सालाना फ़ुटबॉल प्रतिस्पर्धा आयोजित करते हैं.

उनका मानना है कि भविष्य में खेल के मैदान पर रोबोट होंगे, लेकिन ज़रूरी नहीं है कि वे खेल में हिस्सा ले रहे हों.

वह बताते हैं, "साल 2050 में पूरी तरह से स्वचालित इंसानों की शक्ल वाले रोबोट्स की एक टीम फ़ुटबॉल विश्व कप जीतने वाली टीम के ख़िलाफ़ खेलेगी."

मैच को लेकर उनकी भविष्यवाणी क्या होगी? रोबोट जीतेंगे.

जेन वेकफ़ील्ड की ये रोचक रिपोर्ट आगे आप विस्तार से पढ़ सकते हैं:

"...और साल 2050 के फ़ुटबॉल विश्व कप की मेज़बानी...मंगल ग्रह को दी जाती है!"

यह काफ़ी अविश्वसनीय सा लगता है? लेकिन अगर भविष्य में 'अंतर-ग्रहीय प्रतिस्पर्धाओं' के आयोजन के ताज़ा सुझाव की मानें तो ऐसा नहीं लगता.

क़तर को साल 2022 में विश्व कप का आयोजन देने के फ़ैसले पर पिछले दिनों फिर विवाद हुआ है. ऐसे में कुछ लोगों को लगा होगा कि अंतरिक्ष में फ़ुटबॉल का खेल आयोजित करने वाली बात शायद उस ओर से लोगों का ध्यान हटाने की कोशिश है.

बाक़ियों को लग सकता है कि अगर मंगल ग्रह पर खेलों का आयोजन किया जाता है तो यह क़तर से केवल थोड़ा ज़्यादा गर्म होगा.

तकनीक से बदलेगा खेल?

लेकिन फ़ीफ़ा के मौजूदा अध्यक्ष सेप ब्लैटर एक गंभीर सवाल उठाते हैं कि काफ़ी तेज़ी से बदलती तकनीक केंद्रित दुनिया में फ़ुटबॉल और बाकी सारे खेलों का स्वरूप क्या होगा? और 2050 का विश्व कप कैसा होगा?

इसमें संदेह नहीं है कि खेलों में इंसानों का प्रदर्शन बेहतर हो रहा है. अगर 2012 के ओलंपिक मैराथन के विजेता ने 1904 की दौड़ में हिस्सा लिया होता तो वह करीब डेढ़ घंटे के अंतर से विजयी हुए होते.

अगर 1936 में स्वर्ण पदक जीतने वाले जेसी ओवेंस ने 2012 के 100 मीटर की दौड़ में हिस्सा लिया होता तो वो उसैन बोल्ट से 14 मीटर पीछे होते जबकि उसैन बोल्ट अंतिम रेखा पार गए होते.

इन दिनों खेल एक विज्ञान है, जिसमें तकनीक बेहद अहम भूमिका निभा रही है. थ्रीडी प्रिटेंड ट्रेनर्स की बात हो या ख़ासतौर पर बनाए गए उपकरणों की बात हो, जो खिलाड़ी की हर गतिविधि के आंकड़ों का विश्लेषण करने में सक्षम हैं.

खिलाड़ियों को जीपीएस पैक की मदद से एक डेटा नेटवर्क से जोड़ दिया जाता है जो काफ़ी विस्तृत आंकड़े बटोरते हैं कि अपनी हृदय की गति और तापमान के साथ वे कितनी तेज़ दौड़ लगा रहे हैं.

'जीवंत अनुभव और आंकड़े'

रग्बी क्लबों में इस तकनीक का इस्तेमाल 2009 से हो रहा है, हालांकि फ़ुटबॉल के मैदान पर इस तकनीक का इस्तेमाल अब भी प्रतिबंधित है.

हालांकि ओलंपिक में तकनीक मुहैया कराने वाली कंपनी अटॉस के मुख्य तकनीकी अधिकारी जी लिडबेटर मानते हैं कि फ़ुटबॉल के खेल में आँकड़ों की भूमिका बढ़ जाएगी.

वह कहते हैं, "हम एक ऐसी स्थिति में पहुंच जाएंगे जहां खिलाड़ियों के शर्ट और जूतों पर लगे मॉनीटर हर तरह के आंकड़े टीम कोच तक पहुंचा रहे होंगे."

अमरीका की नेशनल फ़ुटबॉल लीग (एनएफ़एल) के पूर्व खिलाड़ी क्रिस क्लूवे ने हाल ही में कहा, "ऑग्मेंटड रिएलिटी सारे आंकड़ों को इकट्ठा करने और रियल टाइम में आप कैसे खेलते हैं उसको बेहतर करने का एक तरीका है."

उनके मुताबिक़ तकनीक का इस्तेमाल खेल प्रशंसकों को ज़्यादा जीवंत अनुभव देने के लिए भी किया जा सकता है.

ब्राज़ील में फ़ुटबॉल विश्व कप के दौरान काफ़ी सारी तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है, गोल लाइन सेंसर, हीट-बांडेड फ़ुटबॉल और फ्री किक के दौरान मैच रेफरी द्वारा इस्तेमाल होते ग़ायब होने वाले स्प्रे.

'2050 का एक फ़ुटबॉल मैच'

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तो क्या भविष्य के विश्व कप रोबोटिक्स जैसे हौंगे?

इसके बारे में लिडबेटर कहते हैं खिलाड़ियों को सुपर ह्यूमन बनाने वाली तकनीक तो उपलब्ध है लेकिन उसे इस्तेमाल करना सांस्कृतिक स्वीकार्यता का सवाल होगा, "क्या फ़ुटबॉल के खेल प्रशंसक इसे फ़ॉर्मूला वन की राह पर चलते देखना चाहते हैं, जहां ड्राइवर से ज़्यादा महत्व कार का होता है."

प्रोफ़ेसर एलेक्जांद्रे डा स्लीवा सिमोंस रोबो कप के प्रमुख हैं, जो रोबोट की सालाना फ़ुटबॉल प्रतिस्पर्धा आयोजित करते हैं.

उनका मानना है कि भविष्य में खेल के मैदान पर रोबोट होंगे, लेकिन जरूरी नहीं है कि वे खेल में हिस्सा ले रहे हों.

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उनके पास फ़ीफ़ा के लिए एक चुनौती है. वह कहते हैं, "मुझे लगता है कि 2050 के खेल में इंसान रेफ़री की भूमिका में नहीं होंगे. ऐसी संभावना है कि इंसान ऑटोमैटिक रेफ़री के सुपरवाइज़र की भूमिका निभा रहे हों, जो एक सॉफ़्टवेयर या रोबोट भी हो सकता है."

वह बताते हैं, "साल 2050 में पूरी तरह से स्वचालित इंसानों की शक्ल वाले रोबोट्स की एक टीम फ़ुटबॉल विश्व कप जीतने वाली टीम के ख़िलाफ़ खेलेगी."

मैच को लेकर उनकी भविष्यवाणी क्या होगी? रोबोट जीतेंगे.

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