एचआईवी के इलाज में एक नया कदम

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वैज्ञानिकों ने एचआईवी संक्रमण के इलाज में एक ''रोमांचक'' कदम बढ़ाने की बात कही है.

एचआईवी वायरस, संक्रमित व्यक्ति के डीएनए का हिस्सा बनकर दशकों तक निष्क्रिय रह सकता है जिससे बीमारी का इलाज नामुमकिन हो जाता है.

लेकिन अब वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि वायरस को फिर से सक्रिय किया जा सकता है.

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ये अध्ययन एड्स 2014 कॉन्फ़्रेंस में पेश किया गया.

छह संक्रमित व्यक्तियों पर किए गए शुरुआती अध्ययन में पाया गया है कि कीमोथेरेपी में दवा की कम मात्रा इस्तेमाल करने से वायरस को सक्रिय किया जा सकता है.

विशेषज्ञों का कहना है कि ये एक आशाजनक शुरुआत है लेकिन सिर्फ़ दवा से ही एचआईवी का इलाज मुमकिन नहीं होगा.

एंटी-वायरल दवाओं से एचआईवी वायरस, रक्त प्रवाह में उस स्तर तक पहुंच सकता है जहां इसकी जांच नहीं हो पाती. इसका मतलब ये है कि एचआईवी पॉज़िटिव लोग लगभग सामान्य जीवनकाल जी सकते हैं.

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लेकिन इसमें एक मुश्किल होती है. एचआईवी वायरस अपना डीएनए हमारे डीएनए में मिला सकता है जहां ये प्रतिरक्षी तंत्र और दवाओं की पहुंच से बाहर हो जाता है. इस प्रक्रिया को एचआईवी रिज़र्वायर कहते हैं.

इसलिए जब एचआईवी का इलाज बंद हो जाता है, ये वायरस रिज़र्वायर से बाहर आकर फिर से काम करना शुरु कर देता है.

एचआईवी के इलाज पर हो रहे अंतरराष्ट्रीय अध्ययन का मक़सद इसके वायरस को इन छिपी हुई जगहों से बाहर निकालना है.

डेनमार्क के आरहाउस विश्वविद्यालय की एक टीम ने कीमोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाली रोमिडेपसिन नाम की दवा का इस्तेमाल किया. ये अध्ययन छह ऐसे लोगों पर किया गया जिनमें एचआईवी वायरस उस स्तर पर पहुंच गया था, जहां उसकी पहचान या जांच नहीं हो सकती थी.

इन सभी को तीन हफ़्तों तक सप्ताह में एक बार रोमिडेपसिन की कम मात्रा दी गई.

छह में से पांच मरीज़ों के ख़ून में वायरस के स्तर में काफ़ी उछाल देखा गया.

अध्ययन में शामिल एक वैज्ञानिक, डॉक्टर ओले सोगार्ड ने बीबीसी को बताया, "(एचआईवी के इलाज) की दिशा में लिया गया हर नया कदम हमेशा ही रोमांचक होता है और ये एक बहुत अहम कदम है."

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डॉक्टर सोगार्ड ने कहा कि इस बारे में काफ़ी संशय है कि ये दवा कितनी कारगर होगी. उन्होंने कहा, "हमने ये दिखा दिया है कि वायरस को कोशिका से बाहर निकाला जा सकता है. अब अगला कदम इन कोशिकाओं को मारना होगा.''

उन्होंने कहा, "इस दवा का परीक्षण अब अगले चरण में जा रहा है जिसमें रोमिडेपसिन को किसी ऐसी चीज़ या दवा के साथ दिया जाएगा जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मज़बूत बनाएगा और हमारे मामले में ये एचआईवी का टीका है."

चुनौतियां

हालांकि इस अध्ययन में अभी कई चुनौतियां हैं.

अध्ययन टीम ये नहीं बता सकी कि रोमिडेपसिन के इस्तेमाल से किस अनुपात में एचआईवी छिपाने वाली कोशिकाएं सक्रिय होती हैं.

एक और मुश्किल ये भी है कि ये नहीं बताया जा सकता कि इस दवा से एचआईवी के किस रिज़र्वायर पर असर पड़ रहा है. एचआईवी वायरस ख़ून में प्रतिरक्षी तंत्र की कोशिकाओं में छिप सकता है लेकिन उसके इससे भी बड़े रिज़र्वायर पेट और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में होते हैं. अभी ये साफ़ नहीं है कि ख़ून पर आधारित इस कीमोथेरेपी से इनमें मौजूद वायरस सक्रिय होते हैं या नहीं.

रोमिडेपसिन दवा के इस्तेमाल से डीएनए के कसे हुए गुच्छे ''ढीले'' पड़ जाते हैं. इससे छिपे हुए एचआईवी का जेनेटिक कोड सामने आ जाता है और नए वायरस बनते हैं.

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