अतीत की यादों से पैसा खर्च करना होता है आसान

अतीत की यादों का अहसास लोगों की जेब से पैसे निकलवाता है, उन्हें आसानी से पैसे खर्च करने को तैयार करता है.

उपभोक्ताओं के व्यवहार का अध्ययन कर रहे शोधकर्ताओं का यह कहना है.

इसका मतलब है विज्ञापन में नॉस्टेल्जिया और रेट्रो थीम का इस्तेमाल.

इसके चलते लोग दान भी देने को तैयार हो जाते हैं. बीते वक़्त की यादें दान की राह में आने वाले रोड़ों को हटा देती हैं.

शोधकर्ता कहते हैं कि नॉस्टेल्जिया का इस्तेमाल खाद्य पदार्थों से लेकर खिलौने बेचने तक सभी में होता है.

जर्नल ऑफ़ कंज़्यूमर रिसर्च में छपे इस शोध में इस बात की पड़ताल की गई है कि नॉस्टेल्जिया यानी अतीत की यादों का इस्तेमाल आखिर मार्केटिंग अभियानों में इतना क्यों होता है.

'पैसे पर ढीली पकड़'

इससे इस बात का पता चलता है कि बड़े ब्रैंड्स कैसे अपने उत्पादों को बीते वक़्त के, पुराने ज़माने के संस्करणों में लपेटकर लोगों की इन भावनाओं को पकड़ना चाहते हैं.

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भोजन, संगीत, खिलौनों, अल्कोहल और फ़िल्मों के कई विज्ञापन अभियान ‘अतीत की उदासी’ की भावनाएं जगाने पर निर्भर करते हैं.

साउथेम्पटन यूनिवर्सिटी, ग्रेनोबल इकोल द मैनेजमेंट और मिनेसोटा यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का तर्क है कि नॉस्टेल्जिया के माहौल में इतनी ताक़त होती है कि ‘उपभोक्ताओं की उनके पैसे पर पकड़ ढीली’ कर सके.

शोधकर्ताओं के मुताबिक़ पुरानी यादें और गुज़रे ज़माने की बातें लोगों में ‘सामाजिक जुड़ाव’ का अहसास जगाती हैं, जिनमें सामुदायिक मूल्य और दूसरों से संबंधों को ज़्यादा अहम चीज़ की तरह देखा जाता है.

ऐसे माहौल में पैसे को कम अहमियत दी जाती है- और लगता है कि ऐसा ख़्याल खर्च पर काबू पाने की प्रवृत्ति को कमज़ोर करता है.

शोधकर्ता कॉन्स्टेंटाइन सेडिकिडेस, कैथलीन वोस, जेनीन लासालेटा के मुताबिक़, "दूसरे शब्दों में, कोई शख़्स जब नॉस्टेल्जिक हो तो किसी चीज़ को खरीदने के लिए जल्दी तैयार हो जाता है."

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