ओआरएस वाले डॉक्टर साहब

डॉक्टर रॉबर्ट हर्शहॉर्न

चीनी, नमक और पानी का घोल. किचन से वास्ता रखने वालों को ये नुस्खा तो शायद कई सौ साल पहले से ही पता होगा, लेकिन इस घोल में किस अनुपात में क्या हो, यह बताने में डॉक्टर नॉर्बर्ट हिर्सहॉर्न की अहम भूमिका रही. डॉक्टर नॉर्बर्ट के इस नुस्खे ने लगभग पाँच करोड़ ज़िंदगियाँ बचाई हैं.

मिस्र में एक तीन महीने का बच्चा दो दिन से डायरिया का शिकार है इस कदर कमज़ोर हो गया है कि वह दूध पीने के लिए मां के स्तन पर अपना सिर तक नहीं टिका पाता. अलेक्सांद्र के उपचार केंद्र में जब इस बच्चे को लाया गया तो एकबारगी डॉक्टर भी घबरा गए थे.

लेकिन उपचार के चार घंटे बाद ही वह मां का दूध पीने लगा और यह सब संभव हुआ चीनी, नमक और पानी के घोल से.

डॉक्टर नॉर्बर्ट का कहना है कि ओरल रिहाइड्रेशन थेरेपी के परिणाम अविश्वसनीय रहे हैं.

संतुलन की प्यास

डॉक्टर नॉर्बर्ट 1964 से ओरल रिहाइड्रेशन थेरेपी से जुड़े. वह अमरीका की सैन्य स्वास्थ्य सेवा में थे.

बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) में हैजा गंभीर रूप ले चुका था. ऐसे वक़्त डॉक्टर नॉर्बर्ट को वहाँ भेजा गया. हैजा होने से मरीज के शरीर में पानी की भारी कमी हो जाती है और वह कुछ ही घंटों में दम तोड़ सकता है.

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Image caption मिस्र में महिलाएं अपने बच्चों को नमक-चीनी का घोल पिलाते हुए

पूर्वी पाकिस्तान के लगभग 40 प्रतिशत गांवों में लोग हैज़े का इलाज न होने से मर रहे थे.

तब रिहाइड्रेशन का उपचार अस्पताल में नस के माध्यम से होता था. यह महंगा था और उनको नहीं मिल पाता था जिन्हें इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती थी.

असाधारण नतीजे

इसलिए मुंह के रास्ते दिए जाने वाले उपचार पाने की कोशिशें की गई ताकि अधिक से अधिक लोगों की मदद की जा सके.

नमक, चीनी और पानी के सही अनुपात पर कई प्रयोग पहले भी हो चुके थे, लेकिन ये नाकामयाब रहे थे और कई मरीजों की मौत हुई थी.

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Image caption डायरिया से पीड़ित इस व्यक्ति को एक हफ्ते में 100 से अधिक ग्लूगोज की बोतलें चढ़ानीं पड़ीं

डॉक्टर नॉर्बर्ट कहते हैं, "ताइवान और फिलीपींस में नौसेना के साथ तैनाती के दौरान भी मैंने सही नुस्खा बनाने की कोशिश की, लेकिन यह कुछ ज़्यादा ही गाढ़ा बन गया और चीज़ें और ख़राब हो गईं."

डॉक्टर नॉर्बर्ट ने बताया, "इस नुस्खे का आसान होना की इसका दुश्मन था. शिशुरोग विशेषज्ञों को यह समझाने में लंबा समय लग गया कि यह सुरक्षित है."

ब्रिटेन की स्वास्थ्य पत्रिका लांसेट और यूनिसेफ़ ने इसे स्वास्थ्य क्षेत्र में बीसवीं सदी की सबसे उम्दा खोज बताया है, जिसने बेहद सस्ती होने के बावजूद हर साल लाखों जीवन बचाई है.

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