क्या परमाणु ऊर्जा का वक़्त ख़त्म हो गया?

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पश्चिमी यूरोप में रहने वाले लोग यह सोच सकते हैं कि परमाणु ऊर्जा का वक्त ख़त्म हो चुका है और उन्हें ऐसा सोचने के लिए माफ़ कर दिया जाना चाहिए.

इटली में लोगों का विरोध बढ़ने के बाद सरकार को अपने परमाणु उद्योग में नई जान फूंकने के इरादे को छोड़ना पड़ा, तो जर्मनी 2022 तक अपने सभी परमाणु सयंत्रों को बंद कर देने की योजना पर काम कर रहा है.

बेल्जियम भी अपने पड़ोसी की राह पर है तो स्पेन की अपने सात सयंत्रों के बेड़े को बढ़ाने की कोई योजना नहीं है. परमाणऊ ऊर्जा का चेहरा माने जाने वाले फ़्रांस ने भी परमाणु ऊर्जा पर अपनी निर्भरता को बेहद कम करने का ऐलान किया है.

और तथ्य यह है कि फ़ुकुशिमा परमाणु हादसे के चार साल बाद भी जापान के 48 सयंत्र वापस चालू नहीं हुए हैं. इसके साथ ही दुनिया के ऊर्जा उत्पादन में परमाणु ऊर्जा का हिस्सा पिछले 20 साल में गिरकर 17 फ़ीसदी से 11 फ़ीसदी रह गया है.

आप ऐसा सोच सकते हैं कि परमाणु ऊर्जा अब ख़त्म होने की राह पर है. लेकिन आप ग़लत हो सकते हैं. पूरी तरह ग़लत.

बढ़ती मांग

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वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन (डब्ल्यूएनए) के डॉक्टर जॉनेथन कॉब के अनुसार दरअसल इस वक्त 70 सयंत्र निर्माणाधीन हैं 'जो 25 साल की सबसे बड़ी संख्या है'.

इसके अलावा 500 और सयंत्र प्रस्तावित हैं- और यह संख्या आज की तारीख में चल रहे सयंत्रों से कहीं ज़्यादा है.

हालांकि इनमें से बहुत से प्रस्ताव कभी हकीकत नहीं बन पाएंगे लेकिन यह आंकड़े साफ़ दर्शाते हैं दुनिया भर में कई सरकारें आज के समय की सबसे बड़ी दुविधाओं में से एक से निपटने के लिए परमाणु ऊर्जा की ओर देख रही हैं.

चिंता यह है कि ऊर्जा की बढ़ती मांग को कैसे पूरा किया जाए वह भी सीओ2 उत्सर्जन को कम करते हुए- जो सीधे ग्लोबल वॉर्मिंग से जुड़ा है.

चूंकि यह स्थापित लो-कॉर्बन तकनीक है इसलिए बहुत से देश परमाणु ऊर्जा के एक बड़े हल के रूप में देखते हैं और इनमें भी चीन सबसे आगे है.

डब्ल्यूएनए के अनुसार चीन में 27 नए सयंत्र बन रहे हैं और करीब 200 और बनाने की योजना है. इसकी वजह साफ़ 2050 तक ऊर्जा की मांग तिगुनी होने का अंदाज़ है इसलिए चीन को जैसे भी हो ऊर्जा पैदा करनी होगी.

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चीन और कुछ अन्य विकासशील देशों में परमाणु सयंत्र लगाना तुलनात्मक रूप से आसान है. जैसे कि इन्हें बनाना सस्ता पड़ता है- बस 10 अरब डॉलर (6.16 खरब रुपये से ज़्यादा) से 15 अरब डॉलर (9.24 खरब रुपये से ज़्यादा) के बीच. इसके अलावा सरकार के नियंत्रण वाली अर्थव्यवस्थआ में ज़रूरी नियामक और आर्थिक सहयोग भी मिलता है.

इतने बड़े पूंजीगत निवेश के लिए दीर्घकालिक फंडिंग की ज़रूरत पड़ती है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी की सेसिला टैम कहती हैं, "चीन के बैंक फ़ाइनेंस करने को तैयार हैं."

अधिनायकवादी शासन वाले मध्य पूर्व के कई देश जिनमें सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं, भी परमाणु सयंत्र लगाने की योजना बना रहे हैं.

मध्य और पूर्वी यूरोप में कई देश अपनी परमाणु क्षमता बढ़ाना चाह रहे हैं जिनमें हंगरी, रोमानिया, यूक्रेन शामिल हैं, जबकि पोलैंड और तुर्की पहली बार परमाणु युग में कदम रखने की तैयारी में हैं.

इनमें से कई देश कोयले पर बहुत ज़्यादा निर्भर हैं और सीओ2 उत्सर्जन कम करने के लिए साफ़ ऊर्जा स्रोत की तलाश में हैं.

'कई नई खोजें'

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वुड मैकन्ज़ी में ऊर्जा सलाहकार पीटर ओसबाल्डस्टोन कहते हैं कि परमाणु ऊर्जा को 'ऊर्जा परिवर्तन के बेहद वास्तविक मौके के रूप में देखा जाता है. ख़ासतौर पर इन देशों की रूसी गैस पर निर्भरता के चलते.'

पश्चिमी यूरोप और अमरीका के मुक्त बाज़ारों में तस्वीर काफ़ी अलग है. यहां जहां राजनीतिक इच्छाशक्ति है भी वहां वित्तीय स्थिति बड़ी बाधा खड़ी कर रही है.

परमाणु सयंत्र बनाना हद दर्जे तक महंगा पड़ता है. उदाहरण के लिए ऑपरेटर ईडीएफ़ एनर्जी का अनुमान है कि ब्रिटेन के हिंकले पॉएंट में बनने वाला उसके नए सयंत्र की लागत करीब 24 अरब डॉलर (14.79 खरब रुपये से ज़्यादा) होगी लेकिन यूरोपियन यूनियन के अनुसार यह 36 अरब डॉलर (22.19 खरब रुपये से ज़्यादा) के आसपास पड़ेगी.

कोई भी निजी कंपनी इतनी बड़ी राशि का बोझ खुद नहीं उठा सकती और वह भी तब जबकि करीब 10 साल बाद ही सयंत्र काम करेगा और पैसा वापस मिलना शुरू होगा.

कई ऊर्जा समूहों के साथ बातचीत के बाद ब्रितानी सरकार ईडीएफ़ को निवेश करने के लिए मनाने में कामयाब हो पाई है, लेकिन इसके लिए उसे कंपनी को पैदा होने वाली बिजली की एक निश्चित कीमत अदा करने का वायदा करना पड़ा. चाहे यह उस समय खुले बाज़ार में मिलने वाली ऊर्जा से महंगी की क्यों न हो.

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इसके बावजूद ईडीएफ़ ने वादा तभी किया जब उसे चीनी समर्थन मिल गया. लेकिन अब भी निवेश अंतिम फ़ैसला जमा नहीं किया गया है.

इस मामले में ब्रिटेन अकेला नहीं है. फ़्रांस में 15 साल पहले शुरू हुआ देश का पहला, फ़्लामांविले सयंत्र, को पहले ही तीन साल की देर हो चुकी है और यह बजट से काफ़ी ऊपर जा चुका है. उधऱ फ़िनलैंड के नए सयंत्र का काम भी काफ़ी ढीला है और इसकी लागत कई अरब बढ़ चुकी है.

कॉब कहते हैं कि इन सयंत्रों में पहली बार नई ईपीआर तकनीक का इस्तेमाल होगा जिसमें 'कई नई खोजों' को शामिल किया गया है.

नवीकरणीय ऊर्जा

अमरीका में नए ऊर्जा सयंत्रों को अरबों डॉलर की सरकारी लोन गारंटी की ज़रूरत पड़ेगी जबकि पांचों को पहले ही काफ़ी देर हो चुकी है.

वहां सरकार उद्योग के साथ मिलकर छोटे, मॉड्यूलर रिएक्टर बनाने पर काम कर रही है जो पारंपरिक सयंत्रों के मुकाबले ज़्यादा लोचनीय और किफ़ायती हों.

ओस्बाल्डस्टोन कहते हैं, लेकिन अभी तो 'परमाणु तकनीक के लिए सबसे बड़ी चुनौती सयंत्रों को समय पर और बजट के अंदर तैयार करना है'.

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एक बार एक परमाणु स्टेशन तैयार हो जाए तो इसे चलाना तुलनात्मक रूप से सस्ता पड़ता है. दुनिया भर में काफ़ी यूरेनियम है और प्रति यूनिट लागत के लिहाज से यह जीवाश्म ईंधन के मुकाबले सस्ता पड़ता है.

लेकिन निर्माण लागत को देखते हुए परमाणु ऊर्जा सबसे सस्ती ऊर्जा के दावे में बहुत पीछे है. दरअसल यूरोप में तो यह कोयले और गैस से भी महंगी है. कई देशों में यह तटवर्ती पवन और सौर ऊर्जा से भी महंगी और नवीकरणीय ऊर्जा की लागत तेजी से कम हो रही है.

यकीनन परमाणु ऊर्जा से जुड़ा अकेला ख़तरा वित्तीय ही नहीं है. चेर्नोबिल के 25 साल बाद फ़ुकुशिमा एक सही समय पर मिली चेतावनी है कि परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल के क्या अंतर्निहित ख़तरे हैं.

तकनीकी विकास ने परमाणु विखंडन को सुरक्षित को सुरक्षित बना दिया है लेकिन सयंत्र में रिसाव के ख़तरे को कभी भी पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता.

फुकुशिमा ने परमाणु कचरे की ओर भी ध्यान खींचा है. आज की तारीख तक दुनिया में कहीं भी इस्तेमाल हो चुके रेडियोएक्टिव ईंधन को स्थाई रूप से रखने की कोई सुविधा नहीं है.

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टैम कहते हैं, "अगर उद्योग इसका (कचरे को रखने का) कोई स्थाई समाधान ढूंढ लेता है तो परमाणु ऊर्जा की स्वीकार्यता बढ़ सकती है."

लेकिन जल्द ही ऐसा समाधान नज़र नहीं आता. कॉब कहते हैं कि स्वीडन औ फ़िनलैंड में ऐसी जगहों की पहचान तो कर ली गई है लेकिन यह 'अगले एक या दो दशक' बाद ही इस्तेमाल में आ सकती हैं.

पर्यावरणविद् कहते हैं कि ख़तरे और वित्तीय लागत को देखते हुए नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश ज़्यादा समझदारी का काम है.

उनकी बात में दम हो सकता है.

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