नकली पैर में कंकड़ चुभने का भी होता एहसास

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ऑस्ट्रिया में वैज्ञानिकों ने ऐसा कृत्रिम पैर बनाया है जो उसे पहनने वाले व्यक्ति को असली पैर जैसे अहसास दिलाता है.

वोल्फैंग रैन्जर, जिन्हें यह पैर लगाया है, उनकी टांग 2007 में कट गई थी.

उन्होंने कहा, "ऐसा लग रहा है कि मेरा पैर वापस आ गया है. यह ज़िंदगी का दूसरा दौर लगता है."

लिंज विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर हुबर्ट एग्गर कहते हैं कि इस कृत्रिम पैर के तले में सेंसर लगाए गए हैं जो इसके ऊपरी हिस्से से नसों तक संवेदनाएं पहुंचाते हैं.

उन्होंने कहा कि ऐसा पहली बार हुआ है कि पैर से विक्लांग एक व्यक्ति को सेंसर युक्त कृत्रिम पैर लगाया गया है.

'कैसे करता है काम'

डॉक्टरों ने पहले मरीज़ के कटे हुए पैर के बाहरी हिस्से में नसों को पुनर्जीवित किया और उन्हें त्वचा के नज़दीक रखा.

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कृत्रिम पैर के तले में छह सेंसर लगाए गए थे एड़ी, उंगलियों और पैर के दवाब और हरकत का पता चल सके.

इन सिग्नल को माइक्रो-कंट्रोलर तक पहुंचाया गया जिसने उन्हें पैर के ऊपर की तरह पहुंचाया जहां यह पैर के निचले हिस्से को छूता था.

इसने कंपायमान होकर त्वचा के अंदर तक पहुंची नसों को संवेदित किया जिन्होंने वह सिग्नल दिमाग तक पहुंचाए.

प्रोफ़ेसर एगर कहते हैं, "सेंसर पैर को बताते हैं कि वहां एक पैर मौजूद है और इसे पहनने वाला जब चलता है तो उसे लगता है कि ज़मीन पर पैर रख रहा है."

पूर्व शिक्षक वोल्फ़गैंग रैंगर को चोट लगने के बाद बने खून के थक्के के कारण अपना पैर खोना पड़ा था. वह इस उपकरण का लैब और घर दोनों जगह पिछले छह महीने से इस्तेमाल कर रहे थे.

वह कहते हैं, "अब मैं बर्फ़ पर फ़िसलता नहीं हूं. अब मैं बता सकता हूं कि मैं बजरी पर चल रहा हूं कंक्रीट पर, घास पर या रेत पर. मैं तो छोटे-छोटे कंकड़ भी महसूस कर सकता हूं."

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अब 54 वर्षीय रैंगर साइकिल चलाते, दौड़ते और तो और पर्वतारोहण भी करते हैं.

'अभूतपूर्व नहीं'

रैंगर को एक और बड़ा फ़ायदा यह हुआ कि पैर खोने के सालों बाद भी 'फ़ैंटम लिंब' (कोई अंग कटने के बावजूद उसके होने का भ्रम होना) के तकलीफ़देह अहसास से उन्हें राहत मिली है.

प्रोफ़ेसर एगर कहते हैं कि दिमाग को अब असली आंकड़े मिल रहे हैं और वह कट चुके अंग से सूचनाएं खोज नहीं रहा.

इस ऑस्ट्रियाई शोध दल ने वीयना में एक प्रेस कॉंफ्रेंस में इस प्रयोग के नतीजों के बारे में बताया.

हालांकि अभी उन्होंने इसका ब्यौरा अभी किसी मेडिकल जनरल में छपवाया नहीं है.

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पिछले साल एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने एक ऐसा बायोनिक हाथ बनाया था जिससे विकलांग व्यक्ति को उंगलियों में स्पर्श का अहसास हो रहा था.

उनका शोध साइंस ट्रांस्लेशनल मेडिसिन जनरल में प्रकाशित हुआ था.

नॉटिंन्घम विश्वविद्यालय में बायोमेटिरियल्स और बायोइंजीनियरिंग के लेक्चरर डॉक्टर अलैस्टर रिची कहते हैं कि ऑस्ट्रियन शोध की घोषणा उत्साहजनक है लेकिन ऐसा अभूतपूर्व काम नहीं है जैसी कि पहले ही बांह और हाथ के मामले में हो चुका है.

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