मैं मोटा हूं?...कतई नहीं

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ज़्यादा वज़न वाले एक तिहाई किशोर खुद को भारी भरकम नहीं मानते.

वो अपने वज़न को लगभग सामान्य मानते है.

ये जानकारी इंग्लैंड में हुए एक अध्ययन में सामने आई है जो 'इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ ओबेसिटी' में प्रकाशित हुआ है.

ख़तरा

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इस अध्ययन से जुड़े लोग आगाह करते हैं कि ऐसी सोच की वजह से कुछ टीनएजर स्वास्थ्य के माकूल भोजन और कसरत की ज़रुरत को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं.

इस अध्ययन के मुताबिक सामान्य वज़न वाले किशोरों के अंदर अपने वज़न को लेकर संतुष्टि का भाव होता है.

बीते कुछ दशकों में वयस्कों को लेकर हुए अध्ययन से संकेत मिले हैं कि चंद लोगों को ही अंदाज़ा लग पाता है कि उनका वज़न सामान्य से अधिक है यानी वो ओवरवेट हैं.

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ऐसा संभव है कि मोटापे के बढ़ते स्तर ने मोटे होने या फिर वज़न बढ़ने की स्थिति को सोच के 'सामान्य' ढर्रे में शामिल कर दिया हो, जिससे कुछ पाउंड वज़न बढ़ने का अंदाजा ही नहीं लग पाता है.

वहीं, कुछ अन्य लोगों की दलील है कि मीडिया और सामाजिक तंत्र लोगों को लगातार छरहरा रहने के लिए प्रेरित करते हैं, इससे ये हो सकता है कि कुछ लोगों को अपना वज़न ज़्यादा मालूम होता हो.

सर्वे

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इसका किशोरों पर कैसा असर होता है ये जानने के लिए अध्ययन करने वाले लोगों ने 13 से 15 साल की उम्र के 5 हज़ार किशोरों को चुना.

उन्होंने इंग्लैंड में 2005 से 2012 के बीच हुए हेल्थ सर्वे के आंकड़ों का इस्तेमाल किया.

जिसमें सवाल किया गया था, "उम्र और लंबाई के हिसाब से आपका वज़न सामान्य है, बहुत ज़्यादा है या फिर बहुत कम है."

अध्ययन से जुड़े लोगों ने इसके साथ किशोरों का बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) यानी वज़न और ऊंचाई का अनुपात भी दर्ज किया.

इसके बाद उनके उत्तर की बीएमआई से तुलना की गई.

सही अनुमान

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सामान्य वज़न वाले 10 में से आठ किशोरों ने अपने वज़न को सही बताया था.

लेकिन, अगर इसे लड़के और लड़कियों की तुलना में देखा जाए तो जवाब में अंतर था.

सामान्य वज़न वाली लड़कियों में खुद को मोटा मानने की सोच अधिक दिखी.

वहीं, भारी भरकम यानी सामान्य से अधिक वज़न वाले किशोरों में से 39 फ़ीसदी ने कहा कि उनका वज़न सही है.

क्या है निदान?

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शोधकर्ताओं का कहना है कि उनके अध्ययन से मिले नतीजों से चुनौती भरा सवाल उभरता है कि सामान्य से अधिक वज़न वाले किशोरों को फ़िक्र में डाले बिना उनके मोटापे की समस्या से कैसे निपटा जाए?

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के सेंटर रिसर्च हेल्थ बिहेवियर रिसर्च सेंटर के प्रो. जेन वार्डले कहते हैं, " ये अध्ययन खुशी और फ़िक्र दोनों की वजह है. "

वो कहते हैं कि जिन किशोरों का वज़न ज़्यादा नहीं है और वो अपना वज़न ज़्यादा मानते हैं उनमें खान-पान की ख़ासी अनियमितता पैदा हो सकती है, इसलिए ये खुशी की बात है कि सामान्य वज़न वाले ज़्यादातर किशोर अपने शरीर के आकार को लेकर सही समझ रखते हैं.

'तलाशें तरीके'

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वो कहते हैं, " लेकिन हमें बहुत मोटे किशोरों को छरहरा बनाने और स्वास्थ्य के अनुरुप उनका वज़न बरकरार रखने के लिए प्रभावी तरीके तलाशने होंगे और ये बेहद अहम है कि हम पता लगाएं कि क्या उन्हें अपने वज़न के बारे में जानकारी से फ़ायदा होगा."

पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड के यूस्टस डिसूजा कहते हैं कि सही वज़न आगे की ज़िंदगी में बीमारियों से बचा सकता है.

वो कहते हैं कि बच्चे और किशोर दूसरों के मुकाबले ज़्यादा चीनी लेते हैं. चीनी का प्रयोग कम करके और ज़्यादा सक्रिय रहने से सही वज़न रखने में मदद मिलेगी.

इससे आगे की जिंदगी में टाइप 2 डाइबटीज़, दिल की बीमारी और कैंसर से बचाव होगा.

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