क्या कामयाबी के लिए धूर्त होना ज़रूरी है?

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अक्सर आप सुनते होंगे कि ज़माना बेदर्द है.

आपके-इर्द-गिर्द भी ऐसे लोग ही कामयाब नज़र आते होंगे जो संवेदनहीन, निर्दयी और बेदिल हों. फ़िल्मों में भी विलेन के पास ही दौलत और शोहरत का ख़ज़ाना होता है.

ये सब देखकर कहीं ऐसा तो नहीं लगता कि ज़िंदगी में कामयाबी के लिए निर्दयी और अहंकारी होना ज़रूरी है?

चलिए, इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश करते हैं.

पहले तो आपको यह बता दें कि निर्दयी लोग कितने तरह के होते हैं. मनोवैज्ञानिकों ने ढेर सारे शोध के बाद पाया है कि ऐसे लोग तीन तरह के होते हैं.

पहला, अहंकारी जिसे अंग्रेज़ी में 'नार्सिसिस्ट' कहते हैं. ऐसे लोग ख़ुद में खोए रहते हैं. अपने को सबसे बेहतर समझते हैं, किसी और को कुछ नहीं मानते.

दूसरे हैं मनोरोगी. ऐसे लोग, जो दूसरों की भावनाओं का ज़रा भी ख़्याल नहीं करते, अक्सर बिना सोचे समझे, आवेग में फ़ैसले लेते हैं. लोगों से बेरहमी और बेअदबी से पेश आते हैं.

बेदर्द लोगों की सबसे ख़तरनाक क़िस्म होती है, धूर्त. मनोवैज्ञानिक, उसे अंग्रेज़ी में 'मैकियावेलियन' कहते हैं.

यह शब्द, इटली के मशहूर पॉलिटिकल साइंटिस्ट मैकियावेली के नाम पर रखा गया है.

मैकियावेली, राजनीति में धूर्तता और दोगलेपन से काम लेने के समर्थक थे.

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ऐसे ही मैकियावेलियन यानी धूर्त लोग अपनी कामयाबी के लिए कुछ भी करेंगे. आपकी भावनाओं से खेलेंगे, दोगलेपन का सहारा लेंगे.

कुल मिलाकर वे कामयाबी के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं.

वैसे वैज्ञानिकों ने इन तीनों गुणों को 'डार्क ट्राएड' का नाम दिया है.

कई बार ऐसा होता है कि ये तीनों ही ऐब एक इंसान में देखे जाते हैं. ऐसा शख़्स, जो अहंकारी होता है, खोखला होता है, बेदर्द होता है, दोगला होता है.

वह हमेशा साज़िश रचने में मशग़ूल रहता है. दूसरों की उसे कोई फ़िक्र नहीं होती. अब इतने दुर्गुण होंगे तो वो मनोरोगी ही कहा जाएगा.

लेकिन, सवाल है कि इसमें से किस क़िस्म का निर्दयी होना आपके लिए सबसे ज़्यादा फ़ायदेमंद होगा.

पहले के तज़ुर्बे हमें ये बताते हैं कि आम तौर पर बड़ी कंपनियों के सीईओ में मनोरोगी के लक्षण पाए जाते हैं.

अंग्रेज़ी में इन्हें 'स्नेक्स इन सूट्स' यानी सूटेड-बूटेड सांप कहा जाता है. ऐसे लोग बेदर्द होते हैं, उनके बर्ताव में अजब तरह की अस्थिरता भी होती है.

लेकिन कई बार दफ़्तर में इस तरह के लोगों की ज़रूरत होती है, जो सख़्त फ़ैसले लागू कर सकें.

हालांकि पुराने अनुभवों से यह साफ़ नहीं हो सका था कि बेदर्दों की बाक़ी क्वालिटी रखने वाले लोग असल ज़िंदगी में कितने कामयाब होते हैं.

स्विटज़रलैंड की बर्न यूनिवर्सिटी के डेनियल स्पर्क ने इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की.

उन्होंने जर्मनी के क़रीब आठ सौ लोगों की ऑनलाइन सर्वे की, जिसमें हर क्षेत्र में काम करने वाले लोग शामिल थे. इस सर्वे के नतीजे चौंकाने वाले थे.

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सबसे दिलचस्प बात यह रही कि आम तौर पर कामयाब माने जाने वाले सूटेड-बूटेड सांप की कैटेगरी वाले लोग या मनोरोगी, अपने करियर में उतने कामयाब नहीं देखे गए, जितना कामयाब उन्हें पहले समझा जा रहा था.

उनकी कमाई कम थी, तरक़्क़ी की सीढ़ियां चढ़ने में भी वो पिछड़ गए थे. नतीजा यह कि अपने काम से वे पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे.

डेनियल स्पर्क कहते हैं, "मनोरोगियों का अपने बर्ताव पर कोई कंट्रोल नहीं होता. इनकी रिस्क लेने की क़ाबिलियत, कई जगह काम भले आ सकती है."

स्पर्क यह भी कहते हैं कि बिना सोचे समझे कुछ करने की इनकी आदत, आगे चलकर नुक़सानदेह भी साबित होती है.

ये अमूमन अपने मूड के उतार-चढ़ाव के शिकार होते हैं और काम में इनका मन नहीं लगता.

मनोरोगियों पर सर्वे करने वाले डेनियल स्पर्क मानते हैं कि अगर कोई मनोरोगी, बुद्धिमान है, तो वो अपनी इन कमियों को क़ाबू में कर लेता है. वो ज़िंदगी में कामयाब हो जाता है.

निर्दयी लोगों के डार्क ट्राएड में मैकियावेलियन्स...यानी धूर्त और दोगले क़िस्म के लोग ज़्यादा कामयाब होते हैं, तेज़ी से तरक़्क़ी की सीढ़ियां चढ़ते हैं.

अब अगर आप दूसरों के काम का क्रेडिट लेंगे, उन पर अपना नियंत्रण रखेंगे तो ज़ाहिर है, आप उनसे आगे निकल जाएंगे.

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लेकिन, अगर कामयाबी को पैसे से मापा जाए, तो इस पैमाने पर आत्ममुग्ध यानी ख़ुद को सबसे अच्छा मानने वाले, नार्सिसिस्ट, यानी, अपने आप में खोए रहने वाले लोग सब पर बाज़ी मार ले गए.

डेनियल स्पर्क कहते हैं कि आत्ममुग्ध लोग, दूसरों पर अपना अच्छा प्रभाव जमाने में ज़्यादा कामयाब होते हैं.

ऐसे लोग मोल-तोल भी बेहतर कर लेते हैं. इसीलिए ये कमाई के मामले में भी आगे निकल जाते हैं.

लेकिन, अगर आप इन लोगों की कामयाबी को देखकर अपने अंदर बेदर्दी का भाव पैदा करना चाहते हों, तो ठहर जाइए, ज़रा सोच-विचार लीजिए.

क्योंकि डेनियल स्पर्क के सर्वे में एक और बात सामने आई है.

करियर में कामयाबी हासिल करने वाले, पैसे कमाने में आगे निकलने वाले ये मनोरोगी या आत्ममुग्ध लोग, ज़िंदगी के दूसरे पहलुओं में अक्सर पिछड़ जाते हैं.

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इनकी शुरुआत भले ही शानदार होती हो, ये असरदार, चमकदार दिखते हों, मगर आगे चलकर इनके यही गुण, लोगों को ऐब लगने लगते हैं.

ख़ुद में खोए रहने की इनकी आदत से दूसरे लोग इनसे दूर होने लगते हैं. ये अकेले पड़ जाते हैं.

इसी तरह, मैकियावेलियन्स, यानी धूर्त लोगों की चालाकी जब पकड़ी जाती है, तो इनका दोगलापन उजागर हो जाता है.

इतने सबूत काफ़ी न हों तो आपको एक बात और बता दें.

नेकी की आदत से आप करियर में भले बहुत आगे न जा सकें, भले ही आप तरक़्क़ी की सीढ़ियां तेज़ी से न चढ़ सकें.

मगर, इतना तय है कि नेकी करने वाले ज़िंदगी में ज़्यादा ख़ुश रहते हैं, उनकी सेहत भी बेहतर रहती है.

महत्वाकांक्षा से आप तरक़्क़ी की कुछ सीढ़ियां तो चढ़ सकते हैं, मगर असल कामयाबी के लिए आपके अंदर हुनर और बुद्धिमानी होनी ज़्यादा ज़रूरी हैं.

तो सोच क्या रहे हैं? नेक बनिए, निर्दयी नहीं.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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