एक जीवनसाथी फ़ितरत का हिस्सा नहीं है

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बहुत से लोगों के लिए शादी एक पवित्र, बेहद ख़ास बंधन है. अपनी पसंद के किसी ख़ास इंसान के साथ, ज़िंदगी गुज़ारने का ये समझौता, दो लोगों के रिश्ते को क़ानूनी और सामाजिक मान्यता दिलाता है. दुनिया के हर इलाक़े में शादी का बंधन पवित्र और अहम माना जाता है.

अगर आपको ये पता चले कि सिर्फ़ इंसान ही नहीं, कई दूसरे जानवर भी ज़िंदगी भर अपने साथी के साथ रहने की क़समें खाते हैं, तो आपके मुंह से बेसाख़्ता आह निकल जाएगी.

लेकिन, रूमानी उपन्यासों, प्रेम गीतों और इमोशनल संदेशों से इतर, हक़ीक़त ये है कि एक साथी के साथ ज़िंदगी बिताने का इरादा, असल में महज़ एक आदर्श है. सचाई ये है कि क़ुदरत में बेवफ़ाई आम है.

यहां तक कि एकल रिश्तों या मोनोगैमी में यक़ीन रखने वाले जानवर भी अक्सर, कई साथियों के साथ रिश्ते बनाते देखे गए हैं. हां, कुछ जानवर ज़रूर ऐसे हैं, जो पूरी ज़िंदगी एक ही साथी के साथ रहते हैं. मगर इसकी वजह रूमानियत या प्यार तो क़तई नहीं.

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वैसे, जानवरों में एकल रिश्तों की कामयाबी या नाकामी को समझकर, हम इंसानी रिश्तों में वफ़ादारी या बेवफ़ाई की वजहों को समझ सकते हैं.

तो आइए आपको ले चलते हैं रसिक मिज़ाज कीड़ों, बेवफ़ा परिंदों और बिगड़ैल बंदरों की दुनिया की सैर पर.

क़ुदरत में अपनी नस्ल को आगे बढ़ाना, बच्चे पैदा करना ही बुनियादी नियम है. हर जानवर अपने जीन्स को बच्चों के ज़रिए आगे बढ़ाने की जुगत में रहता है. इसके लिए वो तमाम ढब करता है, नए नए तरीक़े आज़माता है. सिर्फ़ एक साथी के साथ रहकर, ऐसा कर पाना मुश्किल होता है. यानी क़ुदरत का बुनियादी सिद्धांत ही मोनोगैमी, या एकल रिश्ते के ख़िलाफ़ है.

वजह साफ़ है. एक मादा अगर कई नर साथियों से संबंध बनाती है, तो उसके बच्चों में कई लोगों के गुण आएंगे, क़ुदरती तौर पर उनके बचने और ज़िंदगी में कामयाब होने की संभावना भी बढ़ जाएगी.

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Image caption शिंग्लेबैक छिपकली एकल जोड़े की तरह हर साल मिलती हैं.

वैज्ञानिक कहते हैं कि इस मामले में एक बात और ग़ौर करने लायक है. किसी भी प्रजाति को लें. मादाओं में अंडाणु पैदा करने की क्षमता सीमित होती है. उनके मुक़ाबले, नर साथी ज़्यादा तादाद में शुक्राणु बना सकते हैं. यानी वो ज़्यादा मादाओं के साथ रिश्ते बनाने के लिए क़ुदरती तौर पर बेहतर स्थिति में होते हैं.

ऐसे में नर हो या मादा, जानवरों के लिए बेहतर विकल्प होता है, कई साथियों से संबंध बनाना. मादा के लिए इसलिए ताकि उसकी औलादों में अलग अलग तरह के गुण आएं. वहीं नर के लिए अपनी ताक़त की नुमाइश और मेल इगो की संतुष्टि का मौक़ा होता है.

अगर एक नस्ल के नर और मादा एक दूसरे से काफ़ी दूर पाए जाते हैं, तो उनके बीच मोनोगैमी की उम्मीद ज़्यादा होती है. क्योंकि साथी ढूंढना मुश्किल होता है. ऐसे में होता ये है कि जैसे ही पहला कोई साथी मिला, नर हो या मादा, उसके साथ रिश्ते बनाने की कोशिश करते हैं. ज़िंदगी भर उसका साथ निभाते हैं.

हमारे पेट में पाया जाने वाला एक जीव सिस्टोसोमा मैनसोनी, ज़िंदगी भर अपने साथी के बेहद क़रीब रहता है. बच्चे पैदा करने की उम्र में इसकी मादा, नर के पेट में रहती है, उसकी आंतों में अंडे देती है. क्योंकि, इंसान के पेट के भीतर रहते हुए, दूसरा साथी खोज पाना दोनों के लिए मुश्किल होता है.

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Image caption ये कृमि अपना पूरा वयस्क जीवन एक-दूसरे से लिपटे हुए गुज़ार देते हैं.

जानवरों के लिए सबसे ज़रूरी है कि अपनी आने वाली नस्लों की अच्छी परवरिश हो. क़ुदरती चुनौतियों को पछाड़कर वो लंबे समय तक जिएं, ताकि उनकी प्रजाति ज़िंदा रहे, फलती फूलती रहे.

इस काम में सबसे बड़ा रोल परवरिश का है. जब इस राह में चुनौती आती है, तभी जानवर एक साथी के साथ ज़िंदगी बिताने को राज़ी होते हैं.

इसका सबसे अच्छा उदाहरण है, अमेरिका में पाया जाने वाला एक ज़हरीला मेंढक, जिसे मिमिक पॉयज़न मेंढक कहते हैं.

बेहद मुश्किल चुनौतियों में जीना वाले ये मेंढक, जिसे भी अपना जीवनसाथी चुनते हैं, उसी के साथ ज़िंदगी बिताते हैं. वजह साफ है कि बच्चों को पालने के लिए मां-बाप दोनों के सहयोग की ज़रूरत होती है. ताकि उन्हें वक़्त पर खाना-पीना मिलता रहे, किसी चुनौती के वक़्त उनकी सलामती की गारंटी हो.

हालांकि क़ुदरत में ऐसे उदाहरण बेहद कम हैं. ज़्यादातर जीव ज़्यादा से ज़्यादा बच्चे पैदा करना चाहते हैं. इसके लिए सिर्फ़ एक साथी होने से तो काम नहीं कर सकता.

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अगर इंसान को एक जीवनसाथी के साथ ज़िंदगी बिताने का हुनर सीखना है तो उसे परिंदों से सीखना चाहिए.

माना जाता है कि पक्षियों की नब्बे फ़ीसदी प्रजातियों में एक जीवनसाथी के साथ ज़िंदगी बिताने का चलन है. हालांकि ये अंदाज़ा पूरी तरह से सही नहीं.

परिंदों के इश्क़िया क़िस्से बेहद दिलचस्प हैं, जिसमे किसी टीवी सीरियल जैसा ही मसाला है. बेवफ़ा सनम हैं, हरजाई आशिक़ हैं, शक्की शौहर हैं और नाजायज़ औलादें हैं.

परिंदों में दो क़िस्म की मोनोगैमी देखी जाती है. एक तो होती है सोशल मोनोगैमी. यानी दुनिया को दिखाने के लिए दो जोड़े साथ रहते हैं, अपने बच्चों की परवरिश करते हैं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि वो इस रिश्ते से बाहर संबंध नहीं बनाते.

हां वो अस्थाई होता है, पर्दे में होता है. ऐसे सोशल मोनोगैमी वाले परिंदों के भी अपने साथियों से इतर, दूसरे परिंदों से जिस्मानी रिश्ते होते हैं.

कई लोग कहेंगे कि इंसानों में भी तो ऐसा होता है. लोग समाज को दिखाने के लिए बीवी या शौहर के साथ रहते हैं और शादी से बाहर भी शारीरिक संबंध बनाते हैं. इस मामले में इंसान और परिंदे एक ही तराज़ू में तोले जा सकते हैं.

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पहले वैज्ञानिक यही मानते थे कि पक्षियों के बीच प्रजनन के सीज़न में जो रिश्ते बनते हैं वो स्थायी होते हैं. मगर जब इसे क़रीब से देखा गया तो परिंदों की दुनिया से कई स्कैंडल निकले.

जहां, शौहर, बीवी से छुपकर माशूक़ा के साथ वक़्त गुज़ार रहा था. और बीवियां, पति के पीठ पीछे, बेवफ़ाई कर रही थीं. वैज्ञानिकों का अंदाज़ा है कि परिंदों की पचहत्तर फ़ीसदी औलादें ऐसे नाजायज़ रिश्तों से पैदा होती हैं.

अब जैसे समंदर के एक परिंदे, वांडरिंग अल्बाट्रॉस को ही लें. समुद्र में महीनों बिताने के बाद ये परिंदे जब घर लौटते हैं तो अपने पुराने साथी को तलाशते हैं. मगर ऐसा नहीं है कि जब के घर से दूर रहते हैं तो अकेले वक़्त बिताते हैं. इस नस्ल के पक्षियों में क़रीब एक चौथाई आबादी, ऐसे अवैध संबंधों से पैदा हुए परिंदों की होती है.

अब सवाल ये खड़ा होता है कि इस क़दर बेवफ़ाई के बावजूद परिंदे अपने जीवनसाथी के साथ ही कैसे रहते हैं. इसका जवाब है, अपने बच्चों की परवरिश के लिए. क्योंकि पक्षियों के कमज़ोर बच्चों को ज़िंदा रहने के लिए मां-बाप दोनों के साथ की ज़रूरत होती है. तो रिश्तों में बेवफ़ाई के बावजूद ये, मां-बाप का फ़र्ज़ मिलकर, पूरी ज़िम्मेदारी से निभाते हैं.

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लेकिन, हम स्तनपायी जानवरों के मुक़ाबले, परिंदे वफ़ादारी की मिसाल हैं. वजह साफ़ है. परिंदों में जहां नर और मादा मिलकर बच्चे पालते हैं. वहीं इंसानों में ये ज़िम्मेदारी, मां के कंधे पर ज़्यादा रहती है. ऐसे में शौहर को आशिक़ मिज़ाज होने का मौक़ा मिल जाता है.

फिर, भी वैज्ञानिक कहते हैं कि स्तनधारी जीवों में तीन से पांच फ़ीसदी ऐसे होते हैं, जो एक साथी के प्रति वफ़ादार होते हैं.

इनमें चमगादड़ से लेकर भेड़िए तक शामिल हैं. इसकी कई वजहें होती हैं. जैस ऊदबिलाव को ले लीजिए. उन्हें अपनी रिहाइश के इर्द-गिर्द बांध बनाकर उसकी रखवाली करनी होती है, ताकि दुश्मन न आ जाएं और खाने-पीने का भी पूरा इंतज़ाम रहे. इसके साथ-साथ बच्चों को भी पालना होता है. अब ये काम अकेले साथी के बूते का नहीं. लिहाज़ा वो ज़िंदगी भर साथ निभाने वाला रिश्ता जोड़कर रखते हैं अपने जीवनसाथी से.

हालांकि, ये तर्क, डिक-डिक नाम के हिरनों की प्रजाति पर लागू नहीं होता. ये स्तनधारी भी एक बीवी या शौहर के साथ ज़िंदगी गुज़ारते हैं. मगर, इसकी वजह परवरिश की ज़िम्मेदारी नहीं.

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2013 में, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों टीम क्लटन ब्रॉक और डीटर लुकास ने एक रिसर्च किया था. इसमें उन्होंने क़रीब ढाई हज़ार स्तनधारी जानवरों के आपसी रिश्तों की पड़ताल की थी.

इस रिसर्च का एक ही नतीजा सामने आया. स्तनधारी जीवों में नर उसी सूरत में एक साथी के साथ ज़िंदगी बिताते हैं, जब वो मादा को दबाकर रख नहीं पाते. वरना हर नस्ल, हर प्रजाति के मर्द रसिक मिज़ाज, प्लेबॉय होते हैं. जो नहीं हो पाते वो मन में ख़्वाहिश पाले रखते हैं.

बस उसी सूरत में वो समझौता करते हैं, जब उनके सामने एक से ज़्यादा साथी हासिल करने का विकल्प न हो. अब अगर विकल्प ही कम हों, तो एक तो चाहिए ही, अपनी पीढ़ी आगे बढ़ाने के लिए, ज़िंदगी गुज़ारने के लिए.

स्तनधारी जानवरों में प्राइमेट्स यानी बंदर, गोरिल्ला, चिंपैंजी और लंगूर का समूह ऐसा है, जहां 27 फ़ीसदी जानवर एक ही साथी के साथ जीवन बसर करते हैं. इसकी वजह जानने के लिए लंदन के यूनिवर्सटी कॉलेज के किट ओपी ने प्राइमेट्स पर लंबी चौड़ी रिसर्च की. उन्होंने लैमूर से लेकर चिंपैंजी तक के बर्ताव को क़रीब से देखा.

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इसमें कई बातें पता चलीं. मगर जो सबसे चौंकाने वाली बात थी वो थी, अपने बच्चों के मारे जाने का डर. ये सबसे बड़ी वजह थी, जब प्राइमेट्स ने एक साथी के साथ पूरी ज़िंदगी गुज़ारने का फ़ैसला किया.

प्राइमेट्स या नरवानरों की कई जातियों में नर अपनी मादा साथी के दूसरे नर के साथ हुए बच्चों को मार डालते हैं. ताकि मादा उन्हीं की होकर रहे, दूसरे नर की तरफ़ उसका झुकाव न हो.

ओपी कहते हैं कि इंसानों में भी एक जीवनसाथी के साथ ज़िंदगी गुज़ारने के फ़ैसले के पीछे, ये बड़ी वजह हो सकती है. सबको अपनी औलाद की फ़िक्र होती है, उसकी अच्छी परवरिश की चिंता होती है.

मतलब साफ़ है. क़ुदरती तौर पर एकल साथी का चलन नहीं है. मगर सामाजिक सरोकार हमें इस परंपरा की ओर धकेलते हैं.

बंदर, इंसान के सबसे क़रीबी रिश्तेदार हैं. इनकी कम ही प्रजातियां हैं. लेकिन सबके बर्ताव में बड़ा फ़र्क़ है.

जैसे गिबन्स को लीजिए. ये मोनोगैमी में यक़ीन रखते हैं. एक साथी के साथ ज़िंदगी बसर करते हैं. वहीं चिंपैंजी बड़े आशिक़ मिज़ाज होते हैं. प्लेबॉय जैसे अपने समाज में घूमते हैं. कई संबंध बनाते हैं. वहीं गोरिल्ला में एक नर, कई मादाओं को अपनी रखैल बनाकर रखता है.

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वैज्ञानिक मानते हैं कि इसकी बड़ी वजह नर और मादा के शरीर की बनावट का फ़र्क़ है. नर और मादा के शरीर में जितना फ़र्क़ होगा, उस नस्ल के जीव उतने ही बेवफ़ा होंगे. मतलब उतने ही साथी बनाएंगे.

अब जिस प्रजाति के नर को मादा को अपनी ओर खींचने के लिए तगड़ा मुक़ाबला झेलना होगा, कड़ी मशक़्क़त करनी होगी, उसके शरीर में उसी हिसाब से बदलाव आते जाएंगे.

जैसे हिरनों में बड़े सींग निकल आते हैं तो नर गोरिल्ला का आकार बहुत बढ़ जाता है. वहीं गिबन्स में नर-मादा कमोबेश एक जैसे दिखते हैं, तो उनके बीच एक ही साथी के साथ ज़िंदगी बिताने का चलन ज़्यादा है.

इंसान, इस मामले में बीच में आता है. औरत और मर्द के शरीर में कई अंतर होते हैं.

एक और बात जो तमाम रिसर्च से सामने आई है, वो है नर के अंडकोश का टेस्टिकल का आकार. जिस प्रजाति में कई कई साथी के साथ संबंध बनाने का चलन है. उनमें नर के अंडकोश का आकार काफ़ी बड़ा होता है.

वजह क़ुदरती है. इन्हें ज़्यादा मात्रा में शुक्राणु बनाना होता है. ताकि वो अपनी मादा साथी के दूसरे नर सहयोगी पर भारी पड़ सकें. चिंपैंजी इसकी सबसे अच्छी मिसाल हैं. वहीं गोरिल्ला और गिबन्स का मामला इसके ठीक उलट है.

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इस आधार पर वैज्ञानिक ये कहते हैं कि इंसान में भी शुरू में चिंपैंजी जैसा ही झुकाव था, मर्द के कई औरतों से संबंध रखने का.

लेकिन जैसे जैसे इंसान ने तरक़्क़ी की सीढ़ियां चढीं, सामाजिक दबाव के चलते उसकी ये क़ुदरती ख़्वाहिश दबती गई.

जानवरों में एक साथी के साथ ज़िंदगी बिताने का चलन बहुत कम है. जहां है भी वहां चुनौतियों का सामना करने की नीयत से है. हालांकि ऐसे जानवर क्या महसूस करते हैं एक साथी, या कई साथी रखने के बारे में ये पता कर पाना बेहद मुश्किल है.

सिर्फ़ एक क़ुदरती वजह नज़र आती है, जिसे जानवर एक साथी रखने या कई पार्टनर्स के साथ ज़िंदगी बिताने का फ़ैसला करते हैं. वो है अपनी आने वाली नस्लों, अपनी औलाद की सुरक्षा की फ़िक्र. हालांकि वो ऐसा सोच समझ और महसूस कर पाते हैं, इस बारे में कुछ भी पता नहीं.

यही वजह है कि इंसान भी क़ुदरती तौर पर मोनोगैमस या एक साथी के साथ ज़िंदगी बिताने वाला जीव नहीं. मगर, हमारा दिमाग इतना विकसित हो गया है कि हम क़ुदरती नियमों के ख़िलाफ़ जाकर सोच समझकर बर्ताव कर सकते हैं.

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अब, ये सब जान-समझकर आपको ये लगता होगा कि एक जीवनसाथी के साथ ज़िदंगी बिताने का आइडिया छोड़ ही देना ठीक होगा. आख़िर क़ुदरत भी तो इसके ख़िलाफ़ है.

मगर, सोच लीजिए, क्या सिर्फ़ क़ुदरती नियम का हवाला देकर आप उसका साथ छोड़ सकते हैं. जिसके बारे में आप शिद्दत से महसूस करते हैं, प्यार करते हैं, ज़िंदगी भर साथ रहना चाहते हैं.

हमें तो ऐसा नहीं लगता... तो क़ुदरत के नियम पर मत जाइए... अपने दिल की सुनिए... वो क्या कह रहा है...

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