ब्रिटेन में चोरी के हिमालयी बीज, पौधे

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बीबीसी को पता चला है कि हिमालय में ग़ैरक़ानूनी ढंग से इकट्ठे किए गए विशिष्ट पौधों के बीजों को ब्रिटेन में बेचा जा रहा है.

नेशनल हिमालयन अथॉरिटी का कहना है कि इन पौधों के सामान को एकत्र करने और इनके निर्यात के लिए कोई इजाज़त नहीं ली गई है.

अधिकारियों ने ये भी कहा कि ऐसी गतिविधियों से पर्यावरण को नुक़सान पहुंचता है और इन पौधों के व्यापार से स्थानीय लोगों को मिलने वाला फ़ायदा भी नहीं मिलता है.

कुछ आपूर्तिकर्ताओं ने बीबीसी को बताया कि दरअसल स्थानीय लोगों ने फूलों को इकट्ठा करने में उनकी मदद की थी; दूसरों ने कहा कि उन्हें पता नहीं था कि ये काम ग़ैरक़ानूनी है.

विशेषज्ञों का कहना है कि ब्रिटेन भर में बागवानी की सोसायटीज़ और क्लब इस चलन पर लंबे समय से सवाल उठाते रहे हैं.

रॉयल बॉटैनिकल गार्डन एडिनबरा के मार्क वाटसन कहते हैं, "जब लोग नियमों की अवहेलना करते हैं तो उससे हम भी प्रभावित होते हैं क्योंकि मूल वनस्पति वाले देश को इससे नुकसान होता है जबकि हम उन्हें पौधों की सामग्री और अन्य फ़ायदों को नैतिकता के आधार पर साझा करने की प्रणाली (प्रोटोकॉल) विकसित करने में मदद कर रहे हैं."

रॉयल हॉर्टिकल्चरल सोसायटी से जुड़े यूके गार्डनिंग ऑर्गेनाइज़ेशन रोडोडेन्ड्रॉन, कैमिलिया और मंगोलिया समूह (आरसीएमजी) ने स्वीकार किया है कि इसके एक संग्रहकर्ता के पास अनुमति नहीं थी.

Image caption हिमालय से पौधों के संग्रहण और निर्यात के लिए अनुमति की आवश्यकता होती है

ग्रुप के चेयरमैन, डेविड मैलाइस, ने भारत के सिक्किम राज्य में अधिकारियों को लिखा, "हमें खुद टिमोथी एटकिन्सन (समूह के लिए बीज इकट्ठा करने वाले) ने बताया है कि 2012 और 2013 में उनके पास सिक्किम में बीज के संग्रहण की अनुमति नहीं थी. यह बहुत अफ़सोसजनक बात है."

उन्होंने ये भी लिखा- "हालांकि वह यह भी कहते हैं कि उन्होंने भूलवश यह किया, उन्हें पता नहीं था कि वह किसी स्थानीय नियम का उल्लंघन कर रहे हैं और ऐसा लगता है कि उन्हें सचमुच इसका दुख हो रहा है."

मैलाइस ने सिक्किम के अधिकारियों को यह ख़त तब लिखा जब हमारी तहकीकात के बाद उन्हें इस मामले की पड़ताल के आदेश देने पड़े.

एटकिन्सन का नाम आरसीएमजी की सूची में भारत के सिक्किम और पश्चिम बंगाल राज्यों में करीब 250 नमूनों के संग्रह के लिए आया था. इनमें से कुछ नमूने तो सरंक्षित वनक्षेत्रों और सैंचुरी में लिए गए थे.

सिक्किम के वन विभाग के प्रमुख सचिव थॉमस चांडी ने एक लिखित जवाब में कहा, "सरंक्षित वन्यजीवन वाले क्षेत्रों से पौधों के नमूने लेना वन्यजीवन सरंक्षण नियम 1972 के तहत प्रतिबंधित है और अन्य सरंक्षित वन क्षेत्रों से भी."

एटकिन्सन ने हमारी इंटरव्यू के आग्रह को ठुकरा दिया.

Image caption पौधों के नमूने लेने के लिए हिमालय में विशेष अभियान चलाए जाते हैं.

आरसीएमजी की 2015 की प्रस्ताव सूची में 850 पौधों के बीज हैं जिनमें से आधे से ज़्यादा का स्रोत हिमालय है. ये भारत, चीन और म्यांमार में पाए जाते हैं.

बाद में ग्रुप ने अपने सदस्यों को लिखकर ये सूचना दी कि जंगलों से एकत्र किए गए सभी बीज वेबसाइट से हटाए जा रहे हैं.

रे ब्राउन एक और ऐसे आपूर्तिकर्ता, प्लांट वर्ल्ड सीड्स के मालिक हैं जिसने अपनी वेबसाइट पर कुछ हिमालयन बीज की सूची दे रखी है. ब्राउन ने इस सवाल का जवाब देने से इनकार कर दिया कि क्या उन्होंने बीजों के संग्रह के लिए अनुमति हासिल की थी.

वह 2014 में नेपाल जाने वाले उस दल का हिस्सा थे जिसने एक ही दौरे में करीब 60 पौधों के बीज इकट्ठे किए थे.

उन सभी बीजों की सूची देते हुए, एक टिप्पणी करते हुए ब्राउन ने लिखा है: "आपमें से हर किसी को अपने ख़ज़ाने में कुछ बीज मिलेंगे और जैसे कि ऊपर बताया गया है मेकोनोप्सिस और रियुम भी."

ब्राउन की टीम ने नेपाल में इकट्ठे किए गए बीजों के जो आईडी नंबर दिए हैं वह उनकी प्लांट वर्ल्ड सीड्स वेबसाइट में प्रस्तावित बीजों से मिल गए. बाद में इन नंबरों को साइट से हटा लिया गया.

Image caption प्लांट वर्ल्ड सीड्स का अक्टूबर में लिया गया एक स्क्रीन शॉट

नेपाल में अधिकारियों ने बताया कि ब्राउन की टीम को संग्रहण की कोई अनुमति नहीं थी.

नेपाल के वन विभाग के प्रमुख रेशम डांगी ने बीबीसी न्यूज़ को बताया, "हमने उन ज़िलों के ज़िला वन अधिकारियों से पूछा, जहां ऊंची चोटियों पर ये पौधे पाए जाते हैं. किसी भी वन अधिकारी ने यह नहीं बताया कि इन नामों के लोगों के पास किसी तरह की अनुमति थी. यह हमारे रिकॉर्ड्स में नहीं है."

बीजों के कुछ आपूर्तिकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने ये स्थानीय संग्रहकर्ताओं से लिए हैं इसलिए उन्हें मूल देश से किसी तरह की अनुमति की आवश्कता नहीं है.

ऐसे ही एक आपूर्तिकर्ता हैं हिमालयन पौधों के विशेषज्ञ क्रिस चाडवेल, जिन्होंने ब्रिटेन में निजी और सार्वजनिक उद्यानों को ये बीज उपलब्ध करवाए हैं.

उदाहरण के लिए शेफ़ील्ड बॉटैनिकल गार्डन्स में एक क्यारी है जहां हिमालय से लाए गए पौधे उगाए जा रहे हैं और उद्यान के अधिकारियों का कहना है इनमें से बहुत से बीज चाडवेल ने दिए हैं.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "पी कोहली एंड कंपनी (एक भारतीय कंपनी) के पास लाइसेंस है और उन्हें बीजों का निर्यात करने की इजाज़त भी है. मैं उनसे जुड़ा हुआ हूं, संपर्क में रहता हूं और बीजों के सरंक्षण के लिए दौरे भी करता हूं."

"लेकिन, हां नियम और कानून बढ़ गए हैं और सख़्त हो गए हैं और अब वह अधिकारियों से बात कर यह देख रहे हैं कि क्या 2016 में बीज हासिल करने की अनुमति होगी या नहीं."

Image caption शेफ़ील्ड बॉटैनिकल गार्डन्स में लगाए गए हिमालयी पौधे.

चाडवेल ने हमें उस भारतीय कंपनी या अन्य किसी भी ऐसे व्यक्ति का संपर्क सूत्र देने से इनकार कर दिया जिसने उन्हें पहले कानूनी रूप से बीज मुहैया करवाए थे.

भारतीय अधिकारियों ने बीबीसी को बताया कि अगर बीज स्थानीय लोग भी इकट्ठा करते हैं तो विदेशी इसे बगैर आधिकारिक अनुमति के नहीं ले सकते.

एनबीए के एक अधिकारी केपी रघुराम ने बीबीसी को बताया, "गैर-भारतीय व्यक्ति या इकाइ को भारत में पैदा होने वाले जैवविविधता के संसाधनों या उससे जुड़ी जानकारी के शोध या व्यवसायिक इस्तेमाल या जैव-सर्वे और जैव-प्रयोग के लिए भारतीय राष्ट्रीय जैवविविधता आयोग (एनबीए) से पूर्व अनुमति लेनी होती है."

नेपाल के वन विभाग के डांगी ने भी कुछ इसी तरह की बात कही थी- "अगर वह चाहते हैं कि स्थानीय लोग बीज इकट्ठे करें और उन्हें निर्यात करें तो उन्हें पहले वन विभाग से अनुमति लेनी होगी. हमारी अनुमति के बाद साइटोसैनिट्री ऑफ़िस (पौधों के निर्यात के मामले में उनकी सेहत की जांच करने वाला विभाग) ऐसी सामग्री की जांच करता है और प्रमाण पत्र जारी करता है."

उनका कहना था- "वरना यह पूरी तरह ग़ैरक़ानूनी है."

शेफ़ील्ड बॉटैनिकल गार्डन्स के अधिकारी कहते हैं कि चीज़ें उनके नियंत्रण से बाहर हैं.

उद्यान के कार्यकारी प्रमुख इयान टर्नर ने बीबीसी से कहा, "हम लोग बाहर जाकर नमूने इकट्ठे नहीं कर रहे हैं, इसलिए एक हद तक हमें यह विश्वास करना होगा कि वह अनुमति लेकर यह काम कर रहे हैं."

Image caption क्रिस चाडवेल ने पौधों के नमूने इकट्ठे करने वाली कई यात्राएं आयोजित की हैं.

वो कहते हैं- "यह अनिश्चितता तो हमेशा होती है क्योंकि हम खुद जाकर यह बीज इकट्ठे नहीं करते; हम परमिट नहीं हासिल करते और हमें उनमें से कुछ को विश्वास के आधार पर लेना पड़ता है."

2014 में हुए एक अंतरराष्ट्रीय समझौते- नागोया प्रोटोकॉल के अनुसार वनस्पति के मूल देश की सहमति के बिना के बिना ऐसे पौधों और उनसे मिलने वाली चीज़ों के संग्रहण पर प्रतिबंध लगाता है. इसके मुताबिक ऐसे संसाधन से मिलने वाले फ़ायदे को मूल देश से साझा किया जाना चाहिए.

हिमालयी देशों में कुछ अधिकारियों की इस समझौते की भावना के मुताबिक काम न करने और ऐसे विदेशी बीज-संग्रहकर्ताओं को हतोत्सित करने के लिए आलोचना की जाती है जो कानूनन काम करना चाहते हैं.

लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि दोष इसे हासिल करने वाले देशों का भी है.

मिलेनियम सीड बैंक का संचालन रॉयल बॉटैनिक गार्डन्स, क्यू करता है. उसके वरिष्ठ शोध प्रमुख जॉन डिकी कहते हैं, "यूरोपीय संघ के एक सदस्य के रूप में ब्रिटेन में संघ के नए नियम लागू होने चाहिए जो प्रोटोकॉल को यूरोपीय संघ में लागू करता है."

"ब्रिटेन में आनुवांशिक संसाधनों का इस्तेमाल करने वालों को 'उचित समझदारी' दिखानी होगी कि इस संसाधन को कानूनन हासिल किया गया था."

इमेज कॉपीरइट R.Gogoi y S.Borah WWF
Image caption हिमालय, फ़ाइल फ़ोटो

एडिनबरा गार्डन्स के वाटसन कहते हैं कि घरों में पौधे उगा रहे लोगों को यह जानकारी होनी चाहिए कि यह पौधा कहां का है और उसे वहां से हटाने का उन देशों और स्थानीय लोगों पर क्या असर पड़ेगा.

उनके मुताबिक- "सही उपमा तो यह होगी कि इसे सही व्यापार की तरह का अभियान माना जाए. आजकल लोग इस बात को लकेर ज़्यादा जागरूक हैं कि उनका खाना नैतिक रूप से लाया गया है. अब समय आ गया है कि लोग ऐसे ही उस पौधे के बारे में भी सोचना शुरू कर दें जो वह अपने बगीचे में उगा रहे हैं."

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