क्रिएटिव होने के लिए दिमाग़ी बीमारी ज़रूरी?

इमेज कॉपीरइट iStock

क्या दिमाग़ी ख़लल और क्रिएटिविटी में कोई ताल्लुक़ है? अक्सर लोग सोचते हैं कि ग़ैरमामूली क़ाबिलियत रखने वाले लोग, कई बार दिमाग़ी बीमारी के शिकार होते हैं.

लोग इसके लिए मशहूर डच चित्रकार विंसेंट वान गॉग, ब्रितानी लेखिका वर्जिनिया वूल्फ़ या फिर हॉलीवुड अभिनेता रॉबिन विलियम्स तक के उदाहरण देते हैं. जो दिमाग़ी बीमारी से जूझते रहे थे.

मगर क्या वाक़ई दिमाग़ी बीमारी का क्रिएटिविटी से कोई रिश्ता है?

इस बारे में रिसर्च तो कई हुए हैं. मगर, इनके बुनियाद पर किसी नतीजे पर पहुंचना मुश्किल है. 1998 में 29 लोगों पर इस तरह का रिसर्च हुआ.

इनमें से 15 में दिमाग़ी ख़लल और उनकी क्रिएटिविटी या सृजनशीलता में कोई ताल्लुक़ नहीं पाया गया. नौ में दोनों में संबंध दिखा और पांच मामले बेनतीजा रहे.

अब केवल 29 लोगों पर हुए इस रिसर्च के आधार पर कैसे कह दिया जाए कि दिमाग़ी बीमारियों से इंसान क्रिएटिव हो जाता है. या क्रिएटिव इंसान दिमाग़ी ख़लल के शिकार होते हैं.

सबसे बड़ी दिक़्क़त ये है कि क्रिएटिविटी को कैसे मापा जाए? अब चूंकि इसका कोई पैमाना नहीं, तो लोग अक्सर शोहरत या कामयाबी को पैमाना बना लेते हैं. जैसे 2011 में हुआ एक रिसर्च. जिसमें हर फ़ोटोग्राफ़र, लेखक, डिज़ाइनर या वैज्ञानिक को क्रिएटिव इंसान मान लिया गया.

इमेज कॉपीरइट iStock

इस रिसर्च के आधार पर ये दावा किया गया कि जिन लोगों को 'बाइपोलर डिसऑर्डर' नाम की दिमाग़ी बीमारी थी, उनके इन क्षेत्रों में होने की संभावना बढ़ जाती थी.

मगर, फ़िक्रमंदी, डिप्रेशन या किसी अनजाने भय से परेशान रहने की सूरत तो हर इंसान में पैदा हो सकती है. ऐसे में इसका क्रिएटिविटी से सीधा ताल्लुक़ बताना शायद ठीक नहीं.

क्रिएटिविटी और दिमाग़ी बीमारी में सीधा रिश्ता है. ये बताने के लिए 1987 में अमरीकी मनोवैज्ञानिक नैन्सी एंड्रिएसेन के रिसर्च का हवाला दिया जाता है. इस रिसर्च में उन्होंने 30 लेखकों और 30 सामान्य लोगों का इंटरव्यू किया था.

इसके हवाले से नैन्सी ने दावा किया कि लेखकों के दिमाग़ी रूप से बीमार होने की आशंका ज़्यादा सामने आई. मगर केवल 30 लोगों के इंटरव्यू के आधार पर ये दावा, बाक़ी लोग मानने को तैयार नहीं. इससे ये भी नहीं साफ़ हुआ कि क्रिएटिविटी की वजह से दिमाग़ी बीमारी हुई या फिर दिमाग़ी बीमारी की वजह से उनमें ग़ैरमामूली क़ाबिलियत पैदा हो गई.

इस बारे में दो और रिसर्च का भी हवाला दिया जाता है. अमरीकी डॉक्टर के रेडफ़ील्ड जैमिसन ने दिमाग़ी बीमारी और क्रिएटिविटी के बीच रिश्ता तलाशने के लिए 47 लोगों से बात की. इनमें लेखक थे, कलाकार थे, उपन्यासकार थे. जैमिसन ने देखा कि आधे से ज़्यादा कवियों को कभी न कभी दिमाग़ी ख़लल का इलाज कराना पड़ा था.

इमेज कॉपीरइट iStock

मगर, जैमिसन ने कुल नौ कवियों का इंटरव्यू किया. उनमें से आधे को अगर ये दिक़्क़त रही भी तो ये सैंपल किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा सकता. इसी तरह अमरीकी वैज्ञानिक आर्नॉल्ड लुडविग ने एक हज़ार मशहूर लोगों की जीवनी पढ़ी और उसके आधार पर एक रिसर्च पेपर लिखा. मगर इसमें चर्चिल और कमाल अतातुर्क जैसे नेता भी शामिल थे.

उन्हें क्रिएटिव इंसान तो नहीं माना जा सकता. हां, वो कामयाब ज़रूर थे. ख़ुद लुडविग ने लिखा था कि वो इस रिसर्च के आधार पर ये नहीं कह सकते कि ग़ैरमामूली क़ाबिलियत का दिमाग़ी बीमारी से कोई ताल्लुक़ है.

पिछली एक सदी में अमरीका-यूरोप में ऐसे जो भी रिसर्च हुए हैं, वो इसी नतीजे पर पहुंचे हैं कि क्रिएटिविटी का सीधा ताल्लुक़ दिमाग़ी बीमारी से नहीं है. जबकि ऐसे सारे रिसर्च में सबूतों की कमी साफ़ तौर पर देखी जाती है. फिर भी लोगों को यही लगता है कि दिमाग़ी बीमारी और रचनाशीलता में कोई न कोई कनेक्शन ज़रूर है.

अक्सर लोग सोचते हैं कि दिमाग़ी ख़लल के शिकार लोग, बेहतर सोचते हैं. लेकिन अगर उनकी दिमाग़ी बीमारी ज़्यादा गंभीर हो जाती है तो इसका असर उनकी क्रिएटिविटी पर भी पड़ता है.

असल में कुछ ग़ैरमामूली तौर पर क़ाबिल लोगों के क़िस्सों ने इस सोच को हवा दी है. मसलन, चित्रकार वान गॉग का पागल होकर ख़ुद के कान काट लेने का क़िस्सा. या, अभी हाल में अभिनेता रॉबिन विलियम्स की ख़ुदकुशी.

अक्सर हमारे इर्द-गिर्द कलाकारों के निजी ज़िंदगी में परेशान रहने की बातें सुनने को मिल जाती हैं. इससे प्रतिभाशाली कलाकारों के दिमाग़ी रूप से बीमार होने की बात को बल मिलता है.

इमेज कॉपीरइट iStock

इसका नुक़सान ये है कि कई बार दिमाग़ी परेशानी के शिकार लोग, अपने अंदर असाधारण प्रतिभा तलाशने लगते हैं. कुछ को लगने लगता है कि दिमाग़ी ख़लल असल में इशारा है इस बात का कि वो बहुत क़ाबिल हैं.

इससे उनके ऊपर कुछ नया और बेहतर करने का ख़ब्त भी पैदा हो जाता है. कुछ लोग तो इसीलिए अपनी दिमाग़ी बीमारी का इलाज नहीं कराते कि कहीं इससे उनकी क्रिएटिविटी पर बुरा असर न पड़े.

इसका एक नुक़सान और भी होता है कि लोग अपनी क़ाबिलियत के लिए अपनी बीमारी को अच्छा मानने लगते हैं.

कोई सबूत नहीं. नुक़सान ज़्यादा है. फिर भी क्रिएटिविटी और दिमाग़ी बीमारी के बीच ताल्लुक़ बताने का चलन आख़िर क्यों है?

शायद इस ख़याल से हमें ढाढस मिलता है. अगर कोई और कुछ कर पाए तो इसके लिए उसके दिमाग़ी ख़लल को क्रेडिट. और आप ख़ुद कुछ नहीं कर पाए तो भी दिमाग़ी बीमारी पर ज़िम्मेदारी डाल दी. या फिर हम आप जीनियस बन जाएंगे तो इसकी क़ीमत दिमाग़ी बीमारी के तौर पर चुकानी पड़ेगी.

इसीलिए, साल दर साल इस विचार को बढ़ावा दिया जा रहा है.

असल में क्रिएटिविटी और दिमाग़ी बीमारी में कोई ताल्लुक़ नहीं.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार