कितनी आबादी का बोझ उठा सकती है धरती ?

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दुनिया में आज बढ़ती आबादी का शोर है. जनसंख्या विस्फ़ोट के ख़तरों की चर्चा हो रही है. तमाम देश, बढ़ती आबादी पर लगाम लगाने की बातें कर रहे हैं. क़ुदरत के सीमित संसाधनों का हवाला दिया जा रहा है.

ये तो तय है कि हमारी धरती का आकार नहीं बढ़ने जा रहा. यहां मौजूद संसाधन भी अब बढ़ने वाले नहीं, जैसे पानी, खेती के लायक़ ज़मीन. जानकार अक्सर चेतावनी देते हैं कि बढ़ती आबादी, इंसानों के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है.

ऐसे में सवाल ये उठता है कि धरती, कितने इंसानों का बोझ उठा सकती है? क्या वाक़ई, बढ़ती आबादी, हमारी धरती को तबाह कर देगी?

लंदन के इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एनवायरमेंट एंड डेवलपमेंट के सीनियर फेलो डेविड सैटर्थवेट कहते हैं कि ऐसा नहीं है. डेविड के मुताबिक़, आबादी से ज़्यादा अहमियत इस बात की है कि आप संसाधनों का इस्तेमाल करते हैं. वो महात्मा गांधी का हवाला देते हैं.

गांधी जी ने कहा था: धरती पर सबकी ज़रूरत भर का सामान है, मगर सबके लालच को पूरा करने लायक़ नहीं.

पहले, धरती पर इंसानों की आबादी बहुत ज़्यादा नहीं थी. वैज्ञानिक बताते हैं कि, दस हज़ार साल पहले तक धरती पर महज़ कुछ लाख इंसान थे. अठारहवीं सदी के आख़िर में आकर धरती की आबादी ने सौ करोड़ का आंकड़ा छुआ था. 1920 में जाकर, धरती पर दो सौ करोड़ लोग हुए थे.

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मगर, आज की तारीख़ में दुनिया की आबादी सात अरब से ज़्यादा है. साल 2050 तक ये आंकड़ा क़रीब दस अरब और बाईसवीं सदी के आते आते, धरती पर ग्यारह अरब इंसान होने का अनुमान जताया जा रहा है.

पिछली एक सदी में दुनिया की आबादी इतनी तेज़ी से बढ़ी है कि हमारे पास, इन हालात की तुलना के लिए कोई पीछे की मिसाल भी नहीं. आज हमारे पास जो जानकारी है उसके आधार पर हमें ये तो पता है कि सन 2100 तक धरती की आबादी 11 अरब होगी. मगर ये नहीं मालूम की इसका असर क्या होगा.

डेविड कहते हैं कि हम इस बारे में कुछ सुराग़ उन देशों से पा सकते हैं जहां आबादी तेज़ी से बढ़ रही है. जैसे भारत, पाकिस्तान, चीन वग़ैरह. इन देशों में शहरी आबादी तेज़ी से बढ़ रही है. ख़ास बात ये है कि इन देशों की आबादी बढ़ने से धरती के संसाधनों पर बहुत बोझ नहीं बढ़ता.

इसकी वजह ये है कि इन देशों में ज़रूरी चीज़ों की खपत कम है. रहन-सहन बहुत खर्चीला नहीं. यहां के लोगों की जीवनशैली ऐसी है कि इससे कार्बन डाई आक्साइड और दूसरी ग्रीनहाउस गैसें बहुत ज़्यादा नहीं बनतीं. क्योंकि कम आमदनी वाले इन देशों के लोग, कम संसाधनों की मदद से ज़िंदगी जीते हैं.

डेविड कहते हैं कि भारत जैसे देशों लोगों के रहन-सहन की वजह से सालाना एक टन के क़रीब ग्रीनहाउस गैसें पैदा होती हैं. वहीं अमीर मुल्क़ों में ये तादाद, प्रति व्यक्ति तीस टन के क़रीब होती है.

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तो अगर, भारत या पाकिस्तान के शहरों में आबादी बढ़ेगी भी तो धरती पर उसका बोझ नहीं बढ़ेगा. वहीं अगर, अमेरिका या इंग्लैंड या जर्मनी में जनसंख्या बढ़ेगी तो उससे धरती को ज़्यादा नुक़सान होगा. डेनमार्क जैसे कुछ अमीर देश इसके अपवाद हैं. वहां की जीवनशैली ऐसी है कि क़ुदरती संसाधनों को ज़्यादा नुक़सान नहीं पहुंचता.

लंदन के विशेषज्ञ, डेविड कहते हैं कि अमीर और ग़रीब देशों के शहरियों के रहन-सहन में बड़ा फ़र्क़ है. अमीर देशों में रहने वाले लोग क़ुदरती संसाधनों का बेज़ा इस्तेमाल करते हैं. उनके रहन-सहन से धरती को भारी नुक़सान होता है. उनके मुक़ाबले, ग़रीब देशों के नागरिक, संसाधनों की इतनी कम खपत करते हैं कि जनसंख्या तेज़ी से बढ़ने पर भी धरती पर बोझ नहीं बढ़ता.

लेकिन, अब कम अमीर देशों में भी लोग अच्छे रहन-सहन की डिमांड करने लगे हैं. उन्हें भी चौबीसों घंटे बिजली चाहिए. बेहतर खाना-पीना चाहिए. अच्छी लाइफ़स्टाइल की उम्मीद उन्हें भी है. ये वाजिब भी है, उन्हें इसका हक़ भी है. मगर, रहन-सहन में सुधार का सीधा मतलब, धरती के संसाधनों पर बोझ डालना है.

ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के विल स्टेफ़ेन कहते हैं कि बढ़ती आबादी नहीं, बल्कि संसाधनों का बढ़ता इस्तेमाल असल चिंता की वजह है.

ऐसे में अमेरिका, इंग्लैंड, जापान, जर्मनी जैसे देशों की ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है. वहां के लोग संसाधनों का खर्च कम करें. खपत घटाएं, तभी कुछ हो सकता है. पिछली क़रीब दो सदियों से इन अमीर देशों के लोगों ने दुनिया के संसाधनों का ख़ूब उपभोग किया है. अब वक़्त है बदलने का, अपनी खपत घटाने का. इससे ग्रीनहाउस गैसें कम पैदा होंगी. क़ुदरत को नुक़सान कम होगा.

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वैसे भी, घरेलू खपत ही ग्रीनहाउस गैसों के निकलने के लिए ज़्यादा ज़िम्मेदार है. 2015 में हुआ एक रिसर्च कहता है कि दुनिया की साठ फ़ीसदी ग्रीनहाउस गैसें, फैक्ट्रियों से नहीं, घरों से निकलती हैं. धरती के अस्सी फ़ीसदी संसाधनों जैसे पानी, ज़मीन, अनाज का इस्तेमाल, घरों में होता है, उद्योगों में नहीं. इसमें सबसे बड़ा रोल अमीर देशों में होने वाल खपत का है.

ये रिसर्च नॉर्वे की यूनिवर्सिटी ऑफ़ साइंस एंड टेक्नॉलॉजी की डायना इवानोवा की अगुवाई में हुई थी. वो कहती हैं कि हर इंसान अपनी ग़लती मानने के बजाय, दूसरे को ज़िम्मेदार ठहराता है. जैसे अमीर देश कहते हैं कि तेज़ी से तरक़्क़ी कर रहे चीन की फैक्ट्रियों से ग्रीनहाउस गैसें निकल रही हैं. ऐसे में चीन को इसकी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए.

मगर, डायना कहती हैं कि चीन में बने माल की खपत तो अमीर पश्चिमी देशों में हो रही है. वहां खपत न हो तो चीन क्यों उन्हें बनाएगा? तो चीन में ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन की असल ज़िम्मेदारी तो अमीर देशों की कभी न पूरी हो पाने वाली संसाधनों की हवस है.

ज़रूरी है कि अमीर देशों में रहन-सहन बदले. संसाधनों की इस्तेमाल कम हो. वहां के लोग बाक़ी दुनिया के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी समझें. तभी कुछ हो सकता है.

फिर भी, विल स्टीफ़ेन कहते हैं कि 11 अरब लोगों का बोझ उठा पाना धरती के लिए मुश्किल होगा. इसलिए ज़रूरी है कि हम बढ़ती आबादी पर काबू पाने की कोशिश करें. साथ ही आगे चलकर इसे घटाने के तरीक़ों पर भी अमल करें.

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आबादी बढ़ने की रफ़्तार तो अब धीमी हो चली है. 1960 में जनसंख्या बढ़ने की रफ़्तार जो थी, आज उसकी आधी रह गई है. उस वक़्त एक महिला औसतन चार से पांच बच्चों को जन्म देती थी. आज ये औसत घटकर दो से तीन के आस-पास रह गया है.

मगर, इस रफ़्तार से तो आबादी पर जिस तरह के कंट्रोल की बात कर रहे हैं, उसे हासिल करने में सदियां बीत जाएंगी. इतना वक़्त इंसान के पास नहीं है.

ऑस्ट्रेलिया की एडीलेड यूनिवर्सिटी के कोरे ब्रैडशॉ कहते हैं कि क़यामत आ जाए और एक साथ दो अरब लोगों की मौत हो जाए. या दुनिया के सभी देश चीन की एक संतान की नीति पर अमल शुरू करें, तो भी 2100 आते-आते, धरती की जनसंख्या कमोबेश 11 अरब के आस-पास ही होगी.

फौरी ज़रूरत है कि हम बच्चे पैदा करने की दर पर लगाम लगाएं. इसके लिए सबसे ज़रूरी है औरतों को तालीम और रोज़गार मुहैया कराया जाए.

संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट कहती है कि दुनिया की 35 करोड़ औरतें अपना आख़िरी बच्चा नहीं चाहती थीं. मगर उनके पास इतने अधिकार नहीं थे कि वो इसका फ़ैसला ले सकें कि वो ये बच्चा पैदा नहीं करेंगी. अगर हम ऐसी औरतों को पढ़ाएंगे, उन्हें रोज़गार देकर, उनके हाथ मज़बूत करेंगे, तो ही आबादी घटाने में कामयाबी मिलेगी.

अगर, धरती 11 अरब लोगों का बोझ नहीं उठा सकती, तो आख़िर कितने लोगों का उठा सकती है?

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इस सवाल का जवाब बहुत मुश्किल है. एडीलेड यूनिवर्सिटी के कोरे ब्रैडशॉ कहते हैं कि जवाब कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे खेती के तरीक़े, बिजली उत्पादन का ज़रिया और आने-जाने के ज़रिए, जिनका सीधा असर, क़ुदरती संसाधनों पर पड़ता है. साथ ही हमें ये भी देखना होगा कि क्या हम ग़रीब देशों के लोगों को ग़रीबी में ही रहने देना चाहेंगे.

बहुत से लोग मानते हैं कि दुनिया की आबादी पहले ही धरती की कूवत से ज़्यादा है. जो लोग अच्छे रहन-सहन के आदी हो गए हैं, वो बदलना नहीं चाहते. उन्हें देखकर ग़रीब देश भी संसाधनों के ज़्यादा उपयोग की तरफ़ तेज़ी से बढ़ रहे हैं.

इसका पर्यावरण पर, पेड़-पौधों, जानवरों की नस्लों पर बुरा असर पड़ रहा है. जंगल साफ़ किए जा रहे हैं. पानी के स्रोतों को पाटा जा रहा है. समंदर में भी प्रदूषण बढ़ रहा है. तभी तो आज क़रीब सौ करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हैं. वहीं क़रीब सौ करोड़ और लोग कुपोषण के.

2012 में आई संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट कुछ दिलचस्प आंकड़े बताती है. इसके मुताबिक़ हमारी धरती आठ अरब से लेकर एक हज़ार 24 अरब लोगों तक का बोझ उठा सकती है. लेकिन, इसके लिए अलग अलग रहन-सहन के पैमाने होंगे.

बुनियादी तौर पर कोई भी संख्या सही नहीं है, जब तक हम ये न तय कर लें कि हम कैसे ज़िंदगी बिताना चाहते हैं. अमेरिका या यूरोप जैसा, संसाधनों के दुरुपयोग की हद तक खपत वाली, या एशिया अफ्रीका के कई देशों जैसा अभावों वाली ज़िंदगी.

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दूसरा पहलू तकनीक का है. जिसमें लगातार हो रहे बदलावों का भी आबादी पर गहरा असर पड़ता है. बेहतर तकनीक की मदद से हम खेती की उपज बढ़ा सकते हैं. पानी की बर्बादी रोक सकते हैं. ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन और बिजली की खपत घटा सकते हैं.

1928 में जॉर्ज क्निब्स ने लिखा था कि आठ अरब की आबादी को खिलाने के लिए ज़मीन का बेहतर उपयोग करना ज़रूरी होगा. मगज़ तीन साल बाद कार्ल बोश को रासायनिक खाद की खोज के लिए नोबेल मिला. पिछले सौ सालों में तेज़ी से बढ़ी आबादी के लिए इसी केमिकल खाद को ज़िम्मेदार माना जाता है, जिसने उपज बढ़ाई.

भविष्य में ऐसी तकनीक विकसित हो सकती है जिसकी मदद से ज़्यादा लोगों के खाने पीने और रहने की चीज़ें मुहैया हो सकें.

अब देखिए न, कुछ दशक पहले हम चांद तारों को टुकुर टुकर निहारा करते थे. आज इंसान वहां जा पहुंचा है. आज दूसरे ग्रहों पर बस्तियां बसाने के ख़्वाब देखे जा रहे हैं. शायद भविष्य में ये सपने हक़ीक़त में तब्दील हो जाएं.

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के केप्लर मिशन ने ब्रह्मांड में धरती जैसे कई ग्रहों का पता लगाया है. शायद कल को इंसान वहां जाकर रहने में कामयाब हो. हालांकि अभी इसके लिए दिल्ली बहुत दूर है.

फ़िलहाल तो धरती ही इंसान का ठिकाना है. इसीलिए हमें यहीं पर अच्छे से रहने के तरीक़े सोचने चाहिए. ताकि क़ुदरत की ख़ूबसूरती भी बसे रहे और इंसान की नस्ल भी फलती-फूलती रहे. सबसे सही तरीक़ा तो ये होगा कि हम अपने रहन-सहन में बदलाव लाएं. संसाधनों की खपत कम करें. तभी शायद पता चल सकेगा कि धरती, कितनी आबादी का बोझ उठा सकेगी.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी अर्थ पर उपलब्ध है.)

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