कहीं आपको बीमारी का वहम तो नहीं?

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बीमारियां हमें बहुत तकलीफ़ देती हैं. फिर वो चाहे बुखार हो या दौरा पड़ने की बीमारी. मगर क्या आपको पता है कि बहुत से लोग, बीमारी के वहम से तकलीफ़ सहते रहते हैं.

डॉक्टर उन्हें समझाते हैं कि कोई दिक़्क़त नहीं, पर बीमारी का वहम है कि जाता ही नहीं.

तो चलिए आपको बताते हैं बीमारी के वहम के बारे में और बताते हैं ऐसे वहम से परेशान लोगों के क़िस्से.

आयरलैंड की डॉक्टर सुज़ैन ओ सुलिवन ने जैसे ही मेडिकल की पढ़ाई ख़त्म की, उनका सामना एक अजीबोग़रीब मरीज़ से पड़ा. इवोन नाम की युवती की शिकायत थी कि उसे कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था.

इवोन एक रिटेल स्टोर में काम करती थीं. एक दिन जब वे फ्रिज में सामान रख रही थीं तो, उनके साथ काम करने वाली दूसरी लड़की ने ग़लती से उसकी आंखों में विंडो क्लीनर स्प्रे कर दिया. इसके बाद इवोन की आंखों में जलन होने लगी.

इवोन ने आंखें धोईं और घर जाकर सो गईं. उन्होंने सोचा कि इससे उनकी आंखें बेहतर हो जाएंगी. मगर अगली सुबह उन्होंने पाया कि उन्हें तो दीवार पर टंगी घड़ी भी नहीं दिख रही थी. अगले दिन तो उन्हें दिन और रात का फ़र्क़ भी नहीं पता चल रहा था.

डॉक्टरों ने क़रीब छह महीने तक पड़ताल की तो पता चला कि इवोन की आंख में कोई दिक़्क़त नहीं. टेस्ट के दौरान लगता था कि वो डॉक्टरों और अपने पति की तरफ़ देख रही थीं. मगर जब पूछा जाता था तो इवोन कहती थी कि उन्हें कुछ नहीं दिख रहा.

डॉक्टर सुज़ैन ओ सुलिवन और उनके साथियों को लगा कि इवोन अपनी बीमारी का नाटक कर रही हैं. शायद वो ऐसा हर्जाने के मुक़दमे के लिए कर रही थीं. बाक़ी साथियों से अलग सुलिवन को इवोन से हमदर्दी थी. वो बहुत प्यारी महिला थीं. मगर सुलिवन को इसका भी यक़ीन था कि वो अंधी नहीं थीं.

उस वक़्त तो सुलिवन को नहीं पता था. मगर आज उन्हें इवोन के इस बर्ताव की वजह मालूम हो चुकी है. आज सुज़ैन रॉयल लंदन हॉस्पिटल में काम करती हैं. वो उनका इलाज करती हैं जिन्हें एक से एक गंभीर बीमारी का फ़ितूर है.

जैसे किसी को लगता है कि वह कमर से नीचे लकवे का शिकार है. किसी को लगता है कि उनके हाथ किसी जानवर के पंजे में तब्दील हो गए हैं. सुज़ैन की एक मरीज़ तो बिना मशीन के पेशाब तक नहीं कर पाती थी.

इनमें से किसी को भी असल में ऐसी कोई बीमारी नहीं थी. इसी से लगता है कि बीमारी किसी अंग में नहीं, लोगों के दिमाग़ में होती है.

ज़ाहिर है, इवोन का दिमाग़ भी वो चीज़ महसूस नहीं कर पा रहा था, जो उनकी आंखें देख सकती थीं. इसीलिए उन्हें अंधे होने का अहसास हो रहा था.

वहमों की बीमारियों पर सुज़ैन ओ सुलिवन ने एक क़िताब लिखी है. इसका नाम है, ''इट्स ऑल इन योर हेड.''

यूं तो डॉक्टर सुलिवन ने अपने करियर की शुरुआत में ही ऐसे मरीज़ देखे थे. मगर इसके बारे में उनकी समझ तब बढ़ी, जब उन्होंने मिर्गी की बीमारी पर स्पेशलाइज़ेशन शुरू किया.

सुज़ैन के पास ऐसे मरीज़ आते थे जिन्हें मिर्गी के बेहिसाब दौरे पड़ते थे. वो ज़मीन पर गिरकर ऐंठने लगते थे. वो ज़मीन पर पैर पटकते, मजबूर से दिखते. मगर जब उनके दिमाग़ की पड़ताल होती तो उनके अंदर मिर्गी के दौरे का एक भी लक्षण नहीं दिखता था.

सुज़ैन ने कहा कि असल में जो बीमारी मरीज़ बता रहे थे, वो थी ही नहीं. वह तो वहम था उनका. मगर मेडिकल साइंस में इसकी लगातार अनदेखी होती रही है. इसीलिए सुज़ैन ने इसकी गहराई में जाकर पड़ताल करने का फ़ैसला किया.

जैसे ही किसी इंसान को कहा जाएगा कि उसे दरअसल वह बीमारी है ही नहीं, जिसका वह दावा कर रहा है तो वह फ़ौरन भड़क जाएगा. कहेगा कि आपको ये नाटक लगता है? क्या मैं जानकर ख़ुद को तकलीफ़ दे रहा हूँ?

सुज़ैन बताती हैं कि अक्सर लोगों में हँसने, रोने, या ग़ुस्से से कांपते वक़्त कुछ बीमारियों के लक्षण दिखाई देते हैं. मसलन, कई बार ज़्यादा इमोशनल होने पर हमारे अंदर ताक़त न होने का अहसास होता है. कोई बुरी ख़बर सुनकर सिर चकराने लगता है. बिस्तर से उठना मुहाल हो जाता है.

एक रिसर्च के मुताबिक़ 30 फ़ीसद लोग ऐसे तजुर्बों को बीमारी समझकर डॉक्टर के पास जाते हैं. महिलाओं में यह तादाद 50 फ़ीसद होती है.

ज़्यादातर लोग ऐसे हालात से निकलकर सामान्य ज़िंदगी जीने लगते हैं. मगर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो डॉक्टर सुज़ैन के मरीज़ के तौर पर सामने आते हैं. सुज़ैन एक बात और कहती हैं कि जिनके दिमाग़ में बीमारी का फ़ितूर होता है, वो अंधेपन या थकान या दौरे के शिकार मरीज़ों से ज़्यादा मुसीबत झेलते हैं.

सुज़ैन एक ऐसी मरीज़ का हवाला देती हैं. यह लंदन की रहने वाली कैमिला नाम की वकील थीं. कैमिला को मिर्गी के दौरे पड़ते थे. कैमिला को ये दौरे शर्मिंदगी का अहसास कराते थे. उन्हें यह जानकर तकलीफ़ होती थी कि दौरे पड़ने के दौरान लोग उनके पैर पर बैठकर ऐंठन रोकने की कोशिश करते थे. उनके गले में उंगली डालकर उनकी सांस सामान्य करने की कोशिश करते थे.

एक आदमी तो मदद करने के नाम पर उनकी बगल में लेट गया और फिर मोबाइल चुराकर भाग निकला. कई लोगों ने कैमिला के दौरे पड़ने के वीडियो तक बनाए और फिर उनका मज़ाक़ उड़ाने लगे. ऐसे लोगों से मिलकर यह कतई नहीं लगता कि यह बनावटी बीमार हैं.

हालांकि डॉक्टर सुज़ैन ऐसे कई लोगों से भी मिल चुकी हैं, जो बीमारी का नाटक करते थे. ऐसी ही एक महिला थी जूडिथ. वह दावा करती थीं कि कैंसर के इलाज के लिए हुई कीमोथेरेपी से उसे दौरे पड़ने लगे हैं.

सच का पता लगाने के लिए सुज़ैन ने जूडिथ को अस्पताल बुलाया. वहां उन्हें एक कमरे में रखा गया, जहां कैमरे लगे थे. जब भी जूडिथ को दौरा पड़ता, उसका वीडियो कैमरे में क़ैद हो जाता.

कुछ ही घंटों बाद एक नर्स ने जूडिथ को फर्श पर पड़े देखा, दौरे से कांपते हुए. वह इतनी तेज़ी से फ़र्श पर गिरी थीं कि उनका हाथ तक टूट गया था. सच का पता लगाने के लिए कमरे में लगे कैमरे का वीडियो देखा गया.

पता चला कि जूडिथ को कोई दौरा नहीं पड़ा था. उन्होंने अपना हाथ कई बार दीवार पर मारकर तोड़ा था और फिर आराम से फ़र्श पर लेटकर दौरा पड़ने का नाटक कर रही थीं.

एक प्लेट फ़र्श पर गिराकर उन्होंने नर्स का ध्यान अपनी तरफ़ खींचने की कोशिश की. बाद में पता चला कि जूडिथ को तो कभी ब्लड कैंसर भी नहीं था. जिसके इलाज की वजह से वह दौरे पड़ने का दावा करती थीं.

बीमारी का नाटक करने वाले जूडिथ जैसे लोग कैमिला और इवोन जैसे लोगों की मुसीबत और बढ़ा देते हैं. जिन्हें वाकई इलाज की ज़रूरत है. डॉक्टर सुज़ैन को लगता है कि वहम की बीमारी के शिकार लोगों को सबसे ज़्यादा हमदर्दी की ज़रूरत होती है.

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वैसे इलाज की ज़रूरत जूडिथ जैसे बीमारी का नाटक करने वालों को भी होती है. यह भी एक क़िस्म की बीमारी ही है. अब तक तो इसे गंभीरता से लिया ही नहीं गया. न इस पर ढंग की कोई रिसर्च हुई है. जिससे किसी बीमारी का वहम दूर किया जा सके.

हालांकि डॉक्टर सुज़ैन ऐसे मरीज़ों को मनोवैज्ञानिकों के पास जाने की सलाह देती हैं. जो समझा-बुझाकर उन्हें इस तकलीफ़ से निजात दिलाते हैं.

कई लोगों को वाक़ई इससे फ़ायदा हुआ है. जैसे कैमिला यह समझ पाईं कि उनके दौरे के पीछे वजह उनके बेटे की कम उम्र में मौत है. यह जानने के बाद उन्हें अपनी तकलीफ से उबरने में मदद मिली.

वहीं इवोन अपनी परेशानी से उबरने और काम के बीच संतुलन बनाने की कोशिश में हैं. ज़िंदगी की तमाम दुश्वारियों के बीच पति का साथ मिलने से इवोन भी धीरे-धीरे बेहतर हो रही हैं.

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लकवे या ऐंठन की बीमारी से परेशान लोगों को भी राहत मिल सकती है. अगर उनकी परेशानी को सही तरीक़े से समझा जा सके. उन्हें सिखाना होगा कि वो कैसे अपने पैरों का सही से इस्तेमाल कर सकें. हालांकि इसमें काफ़ी वक़्त लगता है. ऐसे लोगों को लगातार हमदर्दी और सहयोग की ज़रूरत होती है.

डॉक्टर सुज़ैन को लगता है कि सबसे ज़्यादा परेशानी यह है कि अक्सर डॉक्टर सही मर्ज़ पकड़ने में नाकाम रहते हैं. किसी बीमारी के दिमाग़ से कनेक्शन को समझना ज़रूरी है. तभी उसका सही इलाज हो सकता है.

जैसे कई बार मिर्गी के मरीज़ों को इलाज की बेहद मुश्किल प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है. वो अपने परिवार, रिश्तेदार और दफ़्तर के साथियों को बीमारी के बारे में बता देते हैं. बरसों बाद जब वो बीमारी के साथ जीना सीख लेते हैं, तो उन्हें समझाया जाता है कि असल में तो उन्हें मिर्गी की शिकायत है नहीं. दौरे पड़ने की वजह कुछ और है.

डॉक्टर सुज़ैन मानती हैं कि ऐसे लोगों की मदद के लिए मेडिकल की पढ़ाई में ही कोर्स जोड़ा जाना चाहिए. ताकि डॉक्टर बनने वाले, बीमारी के वहम के शिकार लोगों की सही मदद कर सकें.

अब डॉक्टर सुज़ैन को उम्मीद है कि उनकी क़िताब ''इट्स ऑल इन योर हेड'' की वजह से मेडिकल साइंस के एक्सपर्ट इसे गंभीरता से लेंगे.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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