दो शब्दों का वो खेल जिसमें सब उलझते हैं

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हम सबने बचपन में कई तरह के खेल खेले होंगे. एक खेल तो पक्का खेला होगा, जिसमें सामने वाले से बड़ी तेज़ी से सवाल पूछकर उनके जवाब फ़ौरन देने को कहा जाता है.

जैसे, चार और एक मिलकर कितना होगा?

पांच और दो मिलाकर कितने होंगे?

सात में से तीन घटाने पर क्या बचेगा?

एक सब्ज़ी का नाम बताओ!

दस में से नौ लोग आख़िरी सवाल के जवाब में गाजर कहते हैं. इन खेल में गणित के सवाल तो इतने आसान हैं कि जैसे आपको मुश्किल सवाल के लिए तैयार किया जा रहा हो.

मगर जाने क्या वजह है कि गणित के सवालों के सही जवाब देने वाले कमोबेश सभी लोग, सब्ज़ी वाले सवाल के जवाब में गाजर ही कहते हैं. सबके ज़ेहन में पहली सब्ज़ी का यही नाम क्यों आता है भला?

ये घिसे-पिटे आसान सवालों के आख़िर में एक और सरल मगर अलग सा सवाल, हमारे दिमाग़ को पटरी से उतार देता है.

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दर्जनों सब्ज़िया हैं जिनके नाम हमें मालूम हैं. इनमें से कई तो हमारी पसंदीदा भी हैं. वैसे सबके नाम गिनाने पड़ें तो शायद एक-दो को आप भूल जाएं.

लेकिन जैसे ही किसी एक का नाम आपको अचानक बताने को कहा जाता है, आप सब्ज़ियों के नाम और भी भूल जाते हैं. और जो एक नाम अक्सर याद रह जाता है वो होता है गाजर.

संज्ञानात्मक विज्ञान में गाजर को सब्ज़ी की प्रोटोटाइप मिसाल कहा जाता है. सब्ज़ी की जो धारणा हमारे ज़ेहन में है, गाजर उसके केंद्र में है.

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अगर हमसे ये पूछा जाता है कि पेंगुइन परिंदा है या नहीं. तो इसका जवाब देने में हमें ज़्यादा वक़्त लगता है. इसके मुक़ाबले, अगर हमसे ये पूछा जाए कि रॉबिन एक पक्षी है? तो इस सवाल का हम फ़ौरन जवाब दे देंगे. जबकि हमें अच्छे से मालूम है कि पेंगुइन एक पक्षी है.

हमें डिनर में सलाद के तौर पर अक्सर गाजर खाने को मिलता है. तमाम कार्टून कैरेक्टर जैसे बग्स बनी से स्नोमैन तक सबके सबकी पसंदीदा है गाजर.

दुनिया भर में हर साल तीन करोड़ सत्तर लाख टन गाजर खाई जाती है. शायद यही वजह है कि गाजर एक सब्ज़ी के तौर पर हमारे ज़ेहन पर हावी है.

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हमारे दिमाग़ के काम करने का तरीक़ा ऐसा है कि जिस जानकारी से हम ख़ुद को जोड़ पाते हैं वो, अक्सर हर सवाल के जवाब के तौर पर हमारे सामने आ जाती है.

सब्ज़ी की ही तरह सुपरहीरो से लेकर खेल-कूद की दुनिया तक, हमारे ज़ेहन में हर तरह के प्रोटोटाइप की एक इमेज बनी होती है.

जैसे ही सवाल पूछा जाता है हमारा दिमाग़ झट से वो प्रोटोटाइप ही जवाब के तौर पर आगे बढ़ा देता है.

दिक़्क़त ये है कि अक्सर ये प्रोटोटाइप, हमसे पूछे गए सवाल के ग़लत जवाब होते हैं.

एक और सवाल जो हम अक्सर लोगों से पूछते हैं वो ये कि किसी भी शब्द को तेज़ रफ़्तार से कई बार बोलें. जैसे की दूध.

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फिर अचानक से आप सवाल पूछते हैं कि गाय क्या पीती है? अक्सर लोग इस सवाल के जवाब में दूध कहते हैं. फिर आप चिल्लाकर कहते हैं कि गाय दूध नहीं, पानी पीती है बेवक़ूफ़.

असल में हम दूध पीते हैं. और जब यही सवाल गाय के बारे में पूछा जाता है तो दिमाग़ वही प्रोटोटाइप जवाब आगे बढ़ा देता है. सवाल पीने से जुड़ा है तो जवाब दूध आता है हमारे ज़ेहन में.

वैसे फ़ौरन जवाब देने वाला दिमाग़ फिर भी बेहतर है ऐसे ज़ेहन से जो फ़ौरन जवाब ही न दे सके. वैसे हाज़िर जवाब दिमाग़ कई बार भयानक ग़लतियां कर बैठता है.

जब भी हम डॉक्टर का तसव्वुर करते हैं, मर्द का ख़्याल आता है. नर्स के बारे में सोचते हैं तो किसी महिला का ख़्याल आता है. ये हमारे दिमाग़ के प्रोटोटाइप जवाब की देन है.

इसीलिए हम अक्सर सोचते हैं कि कोई मर्द, ज़्यादा अच्छा सीईओ होगा. इसी तरह ये मान लेते हैं कि कोई महिला अच्छी प्रोफ़ेसर साबित होगी. मगर ये अंदाज़ा अक्सर ग़लत साबित हुआ है.

विज्ञापन की दुनिया में इंसान के दिमाग़ के इन प्रोटोटाइप जवाबों की बड़ी अहमियत है.

प्रोडक्ट की ख़ूबी से ज़्यादा उसके दिखावटीपन पर ज़ोर होता है. स्टाइल के बारे में ज़्यादा बखान किया जाता है.

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इस बात पर ज़ोर कम होता है कि उसकी ख़ूबियां क्या हैं. ये ज़्यादा बताया जाता है कि कोई चीज़ दिखती कैसी है. बस उसे आपकी सोच से जोड़कर पेश किया जाता है.

यही वजह है कि बचपन के बेहद आसान खेल की सोच की बुनियाद पर अरबों डॉलर का विज्ञापन का धंधा चल रहा है.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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