सस्ते में होगी अंतरिक्ष की सैर

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अंतरिक्ष में इंसान ने बहुत लंबी और कामयाब छलांगें लगाई हैं. लेकिन एक उपलब्धि अब तक ऐसी है, जो तमाम तरक़्क़ी के बावजूद इंसान हासिल नहीं कर सका है.

ये है अंतरिक्ष में जाने वाले रॉकेट का सुरक्षित वापस धरती पर आना और इसका फिर से इस्तेमाल हो पाना.

वैसे फ़िल्मों में तो कई बार ऐसा होता दिखाया जा चुका है. मगर हक़ीक़त में ये ख़्वाब अधूरा ही है.

आज इस ख़्वाब को सच करने के लिए कई कंपनियाँ और देश कोशिशें कर रहे हैं. अमरीका की कंपनी 'स्पेस एक्स' ने कई बार नाकामी के बाद आख़िरकार, रॉकेट को अंतरिक्ष में भेजकर वापस सीधे धरती पर उतारने में कामयाबी हासिल की है.

कंपनी ये कारनामा चार बार दोहरा चुकी है. इनमें से एक बार तो रॉकेट को समंदर के बीच में उतारा गया था. सबसे ख़ास बात ये कि इनमें से कोई भी डमी रॉकेट नहीं था. सब के सब 40 मीटर लंबे असली रॉकेट थे.

स्पेस एक्स कंपनी के अरबपति मालिक एलॉन मस्क को उम्मीद है कि रॉकेट को अंतरिक्ष से वापस धरती पर सुरक्षित उतारकर, वो आने वाले वक़्त में अंतरिक्ष की सैर को सस्ता बना देंगे. वो सवाल करते हैं कि जब हवाई कंपनियाँ हर उड़ान के बाद जहाज़ को फेंकती नहीं, तो फिर रॉकेट के साथ ऐसा क्यों हो?

फिर से इस्तेमाल हो सकने वाले अंतरिक्ष यान का सपना आज से सौ बरस पहले ही देख लिया गया था. स्पेस शटल इस ख़्वाब के सबसे क़रीब पहुँच सके थे. जिनके एक हिस्से को अंतरिक्ष से वापस लाकर इस्तेमाल किया जा सकता था.

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सवाल ये है कि अंतरिक्ष की सैर करके लौटने वाले यान बनाए जाएं, ये बात पहले क्यों नहीं सोची गई?

पहली बात तो ये है कि फिर से इस्तेमाल हो सकने वाले रॉकेट बनाने में सिर्फ़ स्पेस एक्स कंपनी ही नहीं लगी है. ब्लू ओरिजिन नाम की कंपनी ने भी न्यू शेफर्ड नाम के रॉकेट को अंतरिक्ष में भेजकर वापस धरती पर सुरक्षित उतारा है. ये अंतरिक्ष में क़रीब 100 किलोमीटर की उंचाई तक गया. इस कंपनी में अमेज़न के जेफ बेज़ोस का पैसा लगा है.

वर्जिन गैलेक्टिक का स्पेसशिप टू भी इसी तरह के कॉन्सेप्ट पर काम कर रहा है. ये अंतरिक्ष में जाकर, विमान की तरह तैरेगा. फिर ये मुसाफ़िरों को सुरक्षित धरती पर वापस लाएगा. ऐसे छोटे छोटे स्पेसक्राफ्ट तो अंतरिक्ष में भेजकर वापस धरती पर सुरक्षित उतारे जा सकते हैं, लेकिन स्पेस एक्स की कामयाबी बहुत अहम है.

किसी सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजने का मतलब होता है रॉकेट को 6,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से अंतरिक्ष में भेजना. अंतरिक्ष मामलों के जानकार लैतिता गैरियट कहते हैं कि धरती की कक्षा के आस-पास जाने वाले रॉकेट सीधे ऊपर जाते हैं और उसी तरह धरती पर वापस आते हैं. ऐसे में चुनौती ये होती है कि इन्हें सीधे धरती पर कैसे उतारा जाए. क्योंकि उतरते वक़्त धरती का गुरुत्वाकर्षण इन्हें अपनी तरफ़ खींचता है.

वजह साफ़ है, दोबारा इस्तेमाल हो सकने वाले स्पेस क्राफ्ट इसलिए नहीं बन सके, क्योंकि इसमें कई तकनीकी दिक़्क़तें थीं. जबकि ये ख़्वाब तो इंसान एक सदी से देख रहा है.

अमरीका के नेशनल एयर एंड स्पेस म्यूज़ियम के रोजर लॉनियस कहते हैं कि पहले इंसान ने विमानों की तरह ही स्पेस प्लेन बनाने की सोची थी. अमरीका के अपोलो मिशन से पहले ही इस तरह के स्पेस प्लेन पर काम शुरू किया गया था.

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उससे भी पहले बक रोजर्स और फ्लैश गॉर्डन ने अपनी कॉमिक सीरीज़ में ऐसे स्पेसक्राफ्ट का तसव्वुर किया था, जो अंतरिक्ष में जाकर वापस आ जाते थे. ये कॉमिक सीरीज़ पिछली सदी में बीस और तीस के दशक में छपी थी.

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पकड़े गए जर्मन वैज्ञानिकों ने बताया था कि हिटलर का इरादा 'सिल्वरबर्ड' नाम का स्पेस प्लेन बनाने का था. इसकी मदद से नाज़ी सेना, अमरीका पर बम बरसाना चाहती थी.

इसका आकार पंख जैसा होता ताकि इसके ऊपर उठने में ज़्यादा परेशानी नहीं आती. मगर ये मॉडल कभी हक़ीक़त में तब्दील नहीं हुआ. हां इस आइडिया की मदद से अमरीका ने फिर से इस्तेमाल होने वाले स्पेस प्लेन बनाने की सोची.

नासा में वैज्ञानिकों की टीम एक्स-20 डायना-सोर नाम का स्पेस प्लेन बनाने के लिए काम कर रही थी. मगर चांद पर पहुंचने के मिशन के चलते ये कार्यक्रम बंद कर दिया गया.

रोजर लॉनियस कहते हैं कि स्पेस प्लेन का मिशन कचरे के डब्बे में डाल दिया गया. इसकी वजह थी अंतरिक्ष में आगे निकलने अमरीका और सोवियत संघ के बीच की होड़. अमरीका का एकमात्र इरादा, रूस को पछाड़ने का था.

हालांकि स्पेस प्लेन की तकनीक को मिसाइलों के प्रयोग से आज़माया जा रहा था. वो कहते हैं कि जैसे किसी एटमी हथियार में रिएंट्री या धरती के वातावरण में वापसी का कैप्सूल रहता है, वैसे ही आज किसी अंतरिक्ष यात्री को धरती पर वापस लाते वक़्त इस्तेमाल होता है.

अपोलो मिशन की कामयाबी के बाद नासा ने फिर से स्पेस शटल प्रोग्राम पर अपना ध्यान लगाया था. नासा ने पांच स्पेस शटल बनाए. इनमें से हरेक ने औसतन 27 बार अंतरिक्ष की सैर की. फिर ये सुरक्षित धरती पर वापस भी आए.

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स्पेस शटल की कामयाबी का अगुवा डिस्कवरी स्पेस शटल था, जिसने अंतरिक्ष में 39 कामयाब उड़ानें भरीं.

मगर स्पेस शटल की दिक़्क़त थी कि हर मिशन के बाद नए सिरे से उनकी मरम्मत करनी पड़ती थी. यही हाल आज स्पेस एक्स के रॉकेट का है. हालांकि स्पेस एक्स ने अंतरिक्ष से लौटे रॉकेट को धरती पर सुरक्षित तो उतारा है. मगर इस उतारे गए रॉकेट को फिर से अंतरिक्ष भेजने का टेस्ट होना अभी बाक़ी है. बल्कि यही असली इम्तिहान होगा.

अगर हर बार रॉकेट को नए सिरे से तैयार ही करना होगा, तो इससे अच्छा तो हर मिशन के लिए नया रॉकेट बनाना होगा.

वैसे नासा ने कुछ छोटे छोटे स्पेस प्लेन बनाए थे, जिनका अमरीकी सेना आज इस्तेमाल करती है. जैसे कि एक्स37बी, जिसका अमरीका बेहद ख़ुफ़िया मिशन में इस्तेमाल करता है.

इसी तरह नासा का एचएल-20 स्पेस प्लेन है. जिसे स्पेस स्टेशन की लाइफ़ बोट के तौर पर विकसित किया गया था.

मगर, अब इसे सियरा नेवादा कॉर्पोरेशन ने ख़रीद लिया है. इसका नया नाम 'ड्रीम चेज़र' रखा गया है. अब इसे नए सिरे से तैयार किया जा रहा है ताकि फिर से इस्तेमाल हो सकने वाला मज़बूत स्पेस प्लेन बनाया जा सके.

इसकी मदद से अंतरिक्ष तक सामान पहुंचाने का इरादा है. साथ ही अंतरिक्ष में फैले कचरे को साफ़ करने में भी इसका इस्तेमाल करने का प्लान है.

वैसे स्पेस प्लेन के अलावा भी अजब-ग़ज़ब स्पेस क्राफ्ट के डिज़ाइन तैयार किए गए हैं. जैसे कि रोटरी रॉकेट कंपनी का रोटॉन. इसका परीक्षण 1999 में किया गया था. दिक़्क़त ये है कि पैराशूट से उतरने वाले ये कैप्सूल, जहां मर्ज़ी हो वहां नहीं उतर सकते. पैराशूट ही उतरते वक़्त इनके माई-बाप हो जाते हैं.

इस कमी को दूर करने से पहले ही रोटॉन राकेट बनाने वाली कंपनी के पैसे ख़त्म हो गए. वैसे इस तकनीक की मदद से स्पेस एक्स कंपनी ड्रैगन वी2 नाम का कैप्सूल बना रही है.

नासा का इरादा इसकी मदद से इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन तक अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने का है. फिर इन्हीं की मदद से अंतरिक्ष यात्रियों को वापस धरती पर सुरक्षित उतारने का इरादा भी है.

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अमरीकी विमान कंपनियां लॉकहीड मार्टिन और बोइंग मिलकर अपने वल्कन रॉकेट के लिए भी तकनीक विकसित कर रहे हैं. इसकी मदद से हवा में उछाली गई चीज़ों को रॉकेट की मदद से पकड़कर इकट्ठा करने का इरादा है.

असल मक़सद है अंतरिक्ष में तैर रहे सैटेलाइट को पकड़कर उनकी मरम्मत करना.

फ्रांस में एयरबस कंपनी एरियन रॉकेट को फिर से इस्तेमाल हो सकने वाले स्पेस क्राफ्ट में तब्दील करने की कोशिश कर रही है.

इसी तरह चीन भी अपने 'लॉन्ग मार्च' रॉकेट को फिर से इस्तेमाल होने लायक़ बनाने में जुटा है. इसके लिए चीन, कई पैराशूट्स का इस्तेमाल करने का इरादा रखता है.

कहने का मतलब ऐसे कई अंतरिक्ष यान तैयार किए जा रहे हैं, जिन्हें अंतरिक्ष में भेजकर फिर से इस्तेमाल किए जाने का इरादा है. इनमें स्पेसशिप वन, फ़ॉल्कन 9, न्यू शेफ़र्ड और अमरीकी एयरफ़ोर्स का एक्स37बी की तकनीक का बेहतर इस्तेमाल करने की कोशिश होगी.

इन सबका एक ही मक़सद है, अंतरिक्ष की सैर को सस्ता बनाना. हम ऐसी हर कोशिश के लिए कहेंगे, आमीन!

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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