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रविवार, 16 नवंबर, 2003 को 03:15 GMT तक के समाचार
 
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एड्स अब भी चिंता का मुख्य विषय नहीं
एड्स पीड़ित
अब भी लोगों को नहीं लगता कि एड्स जानलेवा और लाइलाज बीमारी है
 

पंद्रह से अधिक देशों में बीबीसी के सर्वेक्षण के दौरान जिन लोगों से सवाल पूछे गए उसके आधार पर लगता है कि कुछ देशों में तो एड्स चिंता का बड़ा कारण है लेकिन बहुत से देशों में अब भी इसे लेकर जानकारी का अभाव है.

लोगों को पाँच विकल्प देकर पूछा गया था कि उनकी सबसे बड़ी चिंता क्या है, इसमें एड्स के अलावा दूसरी स्वास्थ्य समस्याएँ, अपराध, आतंकवाद और आर्थिक सुरक्षा को रखा गया था.

तंज़ानिया में एड्स तेज़ी से फैला है और आँकड़े बताते हैं कि वहाँ आठ प्रतिशत वयस्क एड्स से पीड़ित हैं.

वहाँ एड्स चिंता का विषय होना चाहिए और सर्वेक्षण में भाग लेने वाले दो तिहाई से अधिक लोगों की पहली चिंता एड्स ही है.

लेकिन दक्षिण अफ़्रीका में जहाँ एड्स की मार बेहद गंभीर है और पाँच में से एक वयस्क एड्स से पीड़ित है, वहाँ लोगों की चिंता का मुख्य विषय एड्स नहीं है.

वहाँ लोगों ने कहा कि उनकी मुख्य चिंता क़ानून व्यवस्था और अपराध है.

दो और देशों में एड्स को चिंता का मुख्य कारण बताया गया. इनमें से एक है नाइजीरिया और दूसरा भारत.

नाइजीरिया में तो एड्स का फैलाव तेज़ है लेकिन भारत में अभी एक प्रतिशत से भी कम वयस्कों को एड्स है.

बांग्लादेश और त्रिनिडाड में एक तिहाई से ज़्यादा लोगों ने कहा कि एड्स उनकी मुख्य चिंता है.

पहले पैसा और अपराध

लेकिन जब बात यूरोपीय देशों की हो, चीन की या उत्तरी अमरीका की तो एड्स चिंता की सूची में सबसे नीचे चला जाता है.

एड्स पीड़ित बच्चा
दक्षिण अफ़्रीका में जागरुकता की कमी भी चिंता का विषय बन रही है
 

यहाँ लोगों को पैसों की, अपराध की या स्वास्थ्य की दूसरी चिंताएँ हैं.

बीबीसी संवाददाता एलिज़ाबेथ ब्लंट का कहना है कि इन ख़बरों से एड्स से लड़ रही संयुक्त राष्ट्र की संस्था को चिंता हो सकती है क्योंकि उनका सर्वेक्षण कहता है कि चीन, रुस और उक्रेन में एड्स तेज़ी से फैल सकता है.

दुनिया भर में बड़ी संख्या में लोगों को लगता है कि उनकी सरकारें एड्स या एचआईवी से निपटने के लिए पर्याप्त क़दम नहीं उठा रही है.

इसी सर्वेक्षण से पता चलता है कि सरकारें अपने लोगों को इस बात का विश्वास नहीं दिलवा पा रही हैं कि वे एड्स से लड़ने के लिए पर्याप्त इंतज़ाम कर रही हैं.

दक्षिण अफ़्रीका में सिर्फ़ 28 प्रतिशत लोगों को लगता है कि सरकार पर्याप्त कोशिश कर रही है.

 
 
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