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मंगलवार, 30 नवंबर, 2004 को 21:46 GMT तक के समाचार

विनीता द्विवेदी

महिलाओं पर एड्स की मार ज़्यादा

विश्व एड्स दिवस पर इस साल महिलाओं की स्थिति पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है क्योंकि अब इस बीमारी की शिकार लोगों में 50 प्रतिशत महिलाएँ हैं.

विश्व एड्स दिवस के दिन दुनिया में कई जगह समारोह, भाषणों और परिचर्चाओं का आयोजन हो रहा है लेकिन इस बीमारी को रोकने के लिए 10 सालों से जारी प्रयासों के बावजूद आज भी उसका फैलना बदस्तूर जारी है.

अक्सर दुनिया की कोई बड़ी विपदा समाज में महिलाओं को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँचा जाती है, और एड्स भी अपवाद नहीं हैं.

संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूएनएड्स ने हाल ही में जारी अपनी रिपोर्ट में कहा कि अब कुल एचआईवी मामलों में पचास प्रतिशत संख्या महिलाओं को हो गई हैं.

और यह माना जा रहा है कि महिलाओं को ही नए संक्रमण का ख़तरा भी सबसे ज़्यादा है.

पुरुषों की भूमिका

दुनिया में इस समय चार करोड़ लोग एचआईवी वायरस की चपेट में हैं.

बंगलौर में रहने वाली आशा को दस साल पहले पता चला था कि उन्हें एचआईवी हो गया है लेकिन आज वे हिम्मत से काम लेते हुए दूसरी महिलाओं के लिए आदर्श हैं.

आशा कहती हैं, “महिलाओं को अधिकार नहीं दिए जाते, सेक्स के मामले में उन्हें कुछ कहने का अधिकार नहीं होता और अक्सर उन्हें वायरस अपने पतियों से ही मिलता है.”

यूएनएड्स सामाजिक जागरूकता विभाग की निदेशक डॉ पूर्णिमा माने कहती हैं कि अब तो एचआईवी प्रभावित लड़कियों की संख्या भी बढ़ रही है और यह गंभीर चिंता का विषय है.

वह कहती हैं, “महिलाओं को न सिर्फ़ ख़ुद को बल्कि अपने बच्चों को शिक्षित करना पड़ेगा. यही एकमात्र तरीक़ा है इससे बचने का.”

दवाइयों से आशा

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2005 तक 30 लाख लोगों तक एचआईवी रोधी एंटी रेट्रो वायरल दवाएँ पहुँचाने का लक्ष्य रखा है.

और इसका कुछ असर भारत में भी होने लगा है. भारत सरकार ने ग़रीब जनता के लिए मुफ़्त में यह दवाएँ उपलब्ध करवाना शुरू किया है.

मुंबई के जेजे अस्पताल में वरिष्ठ एचआईवी एड्स चिकित्सक डॉक्टर अल्का देशपांडे कहती हैं कि उनके अस्पताल में अप्रैल से 600 लोगों को यह दवाएँ मिलना शुरू हो गई हैं.

उन्होंने कहा, “मैं बहुत ख़ुश हूँ कि मरीज़ों के लिए कुछ कर पा रही हूँ और मरीज़ भी अब कम चिंता करते हैं, उनकी तबीयत भी बेहतर रहती है.”

लेकिन सरकार की यह योजना सभी जगह पहुँची हो ऐसा नहीं हैं

मुबंई से दूर सांगली ज़िले में एचआईवी संक्रमण की दर किसी भी अन्य ज़िले से ज़्यादा है.

वहाँ एचआईवी एड्स कार्यक्रमों में लगी सामाजिक कार्यकर्ता मीना शेशू का कहना है कि सिविल अस्पताल ने केवल 20 मरीज़ों को मुफ़्त दवा देने की बात कही है.

“बाक़ी लोगों का क्या होगा. और ख़ासकर महिलाएं और बच्चे, वो तो किसी भी योजना में पीछे रह ही जाते हैं.”

विश्व एड्स दिवस पर ऐसी कई बहसें तो चलती रहेंगी लेकिन यह भी तथ्य हैं कि केवल इस साल में दुनिया के 30 लाख लोगों की एड्स जान लेगा.

और आज भी एड्स का कोई इलाज नहीं है.