सोशल मीडिया हथियार भी, सिरदर्द भी

  • 20 फरवरी 2017
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भारत की सवा अरब जनसंख्या में लगभग 70 करोड़ लोगों के पास फ़ोन हैं. इनमें से 25 करोड़ लोगों की जेब में स्मार्टफ़ोन हैं. 15.5 करोड़ लोग हर महीने फ़ेसबुक आते हैं और 16 करोड़ लोग हर महीने व्हाट्सऐप पर रहते हैं.

इन आंकड़ों को देखें तो ये समझना मुश्किल नहीं कि राजनातिक पार्टियां ऑनलाइन कैंपेन या कहें सोशल मीडिया के इस्तेमाल को तवज्जो क्यों दे रहीं हैं.

बीते कुछ सालों में चुनावों में सोशल मीडिया की भूमिका कितनी ज़रूरी हो गई है, ये लैंस प्रिंस अपनी किताब 'द मोदी इफेक्ट' में बताते हैं.

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वो कहते हैं कि "मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही समझ चुके थे कि लोगों तक सीधे पहुंचने के लिए सोशल मीडिया बेहद ज़रूरी है. उनके लिए ये केवल जुनून नहीं बल्कि उनकी ज़रूरत बन गया था. और साल 2014 में उनकी जीत के पीछे इसकी अहम भूमिका रही थी."

2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने जिस तरह सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया उसे देख कर फाइनेंशियल टाइम्स ने तो मोदी भारत का पहला सोशल मीडिया प्रधानमंत्री तक कह डाला था.

Image caption मोदी ने भी चुनाव जीतने के बाद सोशल मीडिया की भूमिका को स्वीकार करते हुए ट्वीट किया था, "इसके कारण अन्य नेताओं के झूठ और झूठे वायदे रैली के मंच से ज़्यादा दूर नहीं जा पाए."

कैसा-कैसा इस्तेमाल?

सोशल मीडिया - फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप के ज़रिए राजनीतिक दल लोगों तक पहुंचने के लिए हर तरह की कोशिश कर रहे हैं, ख़ास कर मतदान से ऐन पहले. लोगों तक मन की बात पहुंचाने के लिए ये एक बड़े और प्रभावी माध्यम के तौर पर उभरा है.

इतना ही नहीं कभी-कभी इसका इस्तेमाल अपने ख़िलाफ़ बोलने वालों को शांत करने के लिए भी किया जाता है.

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अपनी किताब 'आई एम ए ट्रोल' में स्वाति चतुर्वेदी भाजपा के सोशल मीडिया कंट्रोल रूम के बारे में बताती हैं कि बॉलीवुड अभिनेता आमिर ख़ान को ट्रोल करने, फ़िल्म दिलवाले के बहिष्कार की अपील करने, कांग्रेस नेताओं के ख़िलाफ़ ट्वीट करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया गया था. वो बताती हैं कि पार्टियों के पास हज़ारों ऐसे ट्विटर अकाउंट है जिनका इस्तेमाल वो ज़रूरत पड़ने पर करते हैं.

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ये आसान भी है! क्योंकि ग़लत नाम और परिचय के साथ ट्विटर अकाउंट बनाया जा सकता है और आपके ख़िलाफ़ कौन बोल रहा है आपको पता तक नहीं चल पाता.

लैंस प्रिंस के अनुसार कभी-कभी किसी बड़े मुद्दे को छोटा बनाने के लिए भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया जाता है. कभी-कभी तो मीडिया में लग रहे आरोपों के उत्तर भी ट्रोलिंग के ज़रिए दिए जाते हैं.

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दोधारी तलवार

ऐसा नहीं है कि हमेशा इसका असर जैसा सोचा गया, वैसा ही रहा. एक नेता के समर्थकों ने दूसरे को पप्पू और जोकर का नाम दिया तो जवाब में दूसरे के समर्थकों ने पहले नेता को फेंकू और जुमलेबाज़ कहा. एक ने कहा नेता छुट्टी मना रहे हैं तो दूसरे ने पलट कर कहा नेता विदेश यात्राओं में ही व्यस्त रहते हैं.

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कई बार तो इसके ज़रिए अफ़वाहों को भी हवा दे दी गई. बीते साल मिंत्रा के 'द्रोपदी के चीरहरण' से संबंधित एक ग्राफ़िक्स को लेकर काफी चर्चा हुई. इसके लिए मिंत्रा को ट्रोल किया गया लेकिन ये ग्राफ़िक्स असल में स्क्रोलड्रोल नाम की एक वेबसाइट ने कुछ महीने पहले बनाया था.

मिंत्रा और स्क्रोलट्रोल के सफाई देने के बाद सोशल मीडिया पर ही सच सामने आ गया.

राजनेता भी अफ़वाहों के प्रचार में सोशल मीडिया की भूमिका से इनकार नहीं करते. हालांकि वो मानते हैं कि ये अपने आप में दोधारी तलवार है.

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के महामंत्री विजय बहादुर पाठक कहते हैं, "घटनाओं से आप मुंह नहीं मोड़ सकते. आपको अपनी बात रखनी पड़ेगी. आम आदमी सवाल करता है तो दलों को उसका जवाब देना पड़ेगा, राजनीतिक दलों की ये जवाबदेही बनती है और सावधानी से चलना तो पड़ेगा. "

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इस मामले में उनके राजनीतिक विरोधी कांग्रेस के लोग भी उनके साथ खड़े हैं.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के प्रवक्ता वीरेंद्र मदान के अनुसार बीते सालों के मुक़ाबले चुनावों में प्रचार के माध्यम बदले हैं. वो कहते हैं, "प्रचार के नए माध्यम कारगर भी हैं लेकिन कभी-कभी इनमें धोखा भी मिलता है. कुछ लोग बिना सोचे समझे चीज़ें डाल देते हैं, ग़लत चीज़ें लिख देते हैं लेकिन इनकी संख्या कम होती है. "

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इसका एक रूप 2016 में देखने को मिला. 2015 में जब मोदी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ से मिलने अचानक पाकिस्तान पहुंचे थे तो इसके लिए लोगों ने सराहना की.

लेकिन साल 2016 में उड़ी हमला और सर्जिकल स्ट्राइक्स के दावे के बाद जब मोदी ने ट्विटर पर नवाज़ शरीफ़ के जन्मदिन की बधाई दी तो लोगों का ग़ुस्सा फूट पड़ा.

कई बार कुछ मुद्दों पर मोदी की चुप्पी भी लोगों को खलने लगी और लोगों ने सवाल किया कि आख़िर मोदी कुछ बोल क्यों नहीं रहे.

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चुनावों पर नज़र रखने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिर रिफॉर्म के संस्थापक जगदीप छोकर कहते हैं कि राजनीतिक पार्टियों को लगता है कि वो सोशल मीडिया के ज़रिए वो अधिक लोगों तक कम खर्चे में पहुंच सकती हैं.

पार्टियां समझती हैं कि प्रिंट या टीवी मीडिया के मुक़ाबले सोशल मीडिया पर निगरानी रख पाना थोड़ा मुश्किल है और इससे वो चुनाव आयोग की स्क्रूटिनी से भी थोड़ा बच सकते हैं.

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उनका मानना है कि ये भ्रम है कि इससे बड़ी जनसंख्या तक पहुंच सकता है क्योंकि ये सिर्फ़ उन तक पहुंचता है जो इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं. कहीं इसके बारे में जानकारी नहीं है, तो कहीं फ़ोन ही नहीं है, कहीं कहीं तो इंटरनेट ही नहीं है. भारत के 50-60 फीसद इलाकों में इंटरनेट पहुंचने में अभी देरी है.

हालांकि वो मानते हैं कि एक ऐसा वर्ग ज़रूर है जहां तक इंटरनेट और पार्टियों - दोनों की ही पहुंच है.

क्या वाकई कोई प्रभाव पड़ता है?

उत्तर प्रदेश में पढ़ाई कर रहे राजीव कुमार सिंहले कहते हैं, "युवा इससे जुड़ चुका है और इसलिए परंपरागत तरीके से प्रचार के सोशल मीडिया पर होने वाला प्रचार का असर तो है, लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि परंपरागत तरीके ही अधिक कारगर हैं. "

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वो कहते हैं इसके ज़रिए "प्रचार कम और दुष्प्रचार अधिक दिखता है. पार्टियां संप्रदाय, जाति की बातकर वोट लेने की कोशिश अधिक करती हैं, लेकिन अपनी उपलब्धियों पर उनका कम ध्यान होता है."

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लेकिन बी-टेक कर रहे छात्र प्रज्ञान की सोच इससे अलग है. वो मानते हैं, "हम लोग युवा हैं. अगर कोई नेता व्हाट्सऐप और फ़ेसबुक के ज़रिए प्रचार करते हैं तो हम उनसे सीधा जुड़ जाते हैं और हमें लगता है कि हम उनसे सीधी सीधा जुड़ जाते हैं. और हमसे वो सीधे वोट मांग सकते हैं."

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आम जनता तक पहुंचने के लिए सोशल मीडिया एक असरदार ज़रिए के रुप में उभरा है और राजनीतिक पर्टियां भी इसका भरपूर लाभ उठा रही हैं.

लेकिन ऐसा नहीं है कि इससे केवल फायदा ही पहुंचेगा, कई बार इससे पार्टी की छवि को भी नुक़सान पहुंचता है.

(लखनऊ में समीरात्मज मिश्र के साथ)

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