नज़रिया: 'अयोध्या विवाद में न्याय बिना समझौता कैसे होगा?'

  • 22 मार्च 2017
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क्या ये महज संयोग है कि उत्तर प्रदेश में नए मुख्यमंत्री के गृह प्रवेश के फ़ौरन बाद सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद मामले में दोनों पक्षों को समझौते का रास्ता निकालने को कहा है?

सुप्रीम कोर्ट ने तमाम व्यस्तताओं के बीच वक्त निकाल कर न सिर्फ़ सुब्रह्मण्यम स्वामी की याचिका को सुना बल्कि घर के एक बुजुर्ग की तरह झगड़ते बच्चों को समझौता करने का सुझाव दिया.

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सलाह देते हुए देश के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ये मामले अदालतों से बाहर निपटाए जाने चाहिए, "थोड़ा दीजिए, थोड़ा लीजिए. इसे सुलझाने की कोशिश कीजिए. ऐसे मामले साथ मिलकर सुलझाने वाले हैं. ये भावनाओं और धर्म के मसले हैं. अदालत को बीच में तभी पड़ना चाहिए जब आप इसे सुलझा न सकें."

कौन करेगा स्वागत

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अगर दोनों पक्ष चाहें तो खुद मुख्य न्यायाधीश उनके चुने पंचों के साथ बैठने को तैयार हैं. अगर पक्ष उनके नाम पर तैयार न हों तो किसी और बिरादर न्यायमूर्ति का नाम खोजा जा सकता है.

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इस नेकनीयत मश्विरे को न मानने वाला या इसमें ना-नुकुर करने वाला झगड़ालू कहलाएगा. तो पहले देखें इसका स्वागत कौन कर रहा है? भारतीय जनता पार्टी के नेता, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, बाबरी मस्जिद ध्वंस अभियान के नेता लाल कृष्ण आडवानी इनमें अगुआ हैं.

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इन सबका नज़रिया बहुत साफ़ है, मुसलमान कहीं और मस्जिद बना लें, उस जगह पर दावा छोड़ दें जहाँ मस्जिद थी, जिसे 1992 को खुलेआम ढाह दिया गया था.

जब समझौते की पहली शर्त यही है कि मस्जिद की जगह पर दावेदारी पर बात नहीं होगी तो फिर बात किस मुद्दे पर करनी है?

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विवादित स्थल

जिस ज़मीन को लेकर विवाद खड़ा किया गया है अब वहाँ मलबा है और उसकी निगरानी करते हुए रामलला का एक कामचलाऊ मंदिर है. इसकी जगह राम के नाम के अनुरूप एक भव्य मंदिर बनाने का संकल्प वर्षों पुराना है.

इस बीच दो अपराधों की चर्चा करना ज़रूरी है जो राम के नाम पर किए गए. दिसंबर 1949 में स्थानीय प्रशासन के सहयोग से मस्जिद के भीतर हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियाँ चोरी से रख दी गईं.

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ऐसा करके मस्जिद को विवादित बना दिया गया. इसके चालीस साल बाद भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की अगुवाई में बाबरी मस्जिद की जगह पर ही भव्य राम मंदिर बनाने का अभियान 'मंदिर वहीं बनाएँगे' के नारे के साथ शुरू हुआ. इसकी परिणति 6 दिसंबर 1992 को हुई जब इन सारे नेताओं के कहने पर लाखों हिंदू बाबरी मस्जिद के इर्द गिर्द इकट्ठा हुए और देखते-देखते मस्जिद गिरा दी गई.

'सरकार की मिलीभगत'

भले ही राम लला की मूर्ति रात के अँधेरे में रखी गई हो लेकिन मस्जिद गिराने का काम सबकी आँखों के सामने हुआ. दोनों ही मामलों में प्रशासन और सरकार की मिलीभगत साफ़ थी.

यह भी दिलचस्प विडंबना है कि जिस अदालत ने सुलह-समझौते का सुझाव दिया है, वही अभी तय करने वाली है कि छह दिसंबर, 1992 को मस्जिद ध्वंस के अपराधी कौन थे और उनके साथ क्या किया जाए!

बिना इन अपराधों का फैसला हुए किसी समझौते की कल्पना कैसे की जा सकती है? दूसरे, आज के माहौल में किसी समझौते के बारे में कैसे सोचा जा सकता है जब उत्तर प्रदेश और केंद्र, दोनों जगह सरकार में वे लोग सत्तासीन हैं जिन्होंने बाबरी मस्जिद ध्वंस का अभियान चलाया था और जो अपने चुनावी वायदों में अलग-अलग तरीके से बाबरी मस्जिद वाली जगह पर ही राम मंदिर निर्माण का संकल्प व्यक्त करते रहे हैं.

जाहिर है, यहाँ राज्य की मशीनरी के निष्पक्ष होने का कोई सवाल ही नहीं है.

'धर्म का मसला कतई नहीं'

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सुप्रीम कोर्ट क्या इस पूरे सन्दर्भ से नावाकिफ है? या क्या यहाँ यह समझ काम कर रही है कि समझौता अलग मसला है और बाबरी मस्जिद ध्वंस के अपराध की जिम्मेदारी तय करना उससे कतई अलग है?

यह मानने को जी नहीं करता कि हमारी सबसे बड़ी अदालत को इसका अहसास नहीं है कि बाबरी मस्जिद को लेकर खड़े किए गए विवाद का निपटारा कैसे किया जाता है, इससे इस राष्ट्र की बुनियादी मान्यता, यानी धर्मनिरपेक्षता की साख जुड़ी हुई है.

हमारे राजनीतिक दलों ने उसे लेकर गंभीरता का परिचय नहीं दिया है. यह भावनाओं का और धर्म का मसला कतई नहीं, किसी एक के धार्मिक स्थल से उसे बेदखल करके उस पर कब्जा करने का निहायत दुनियावी षड्यंत्र है.

खुद लालकृष्ण आडवाणी कबूल कर चुके हैं कि जो आंदोलन उन्होंने चलाया था वह धार्मिक नहीं, राजनीतिक था.

भारत की साख की रक्षा का कठिन दायित्व अब उसके न्यायतंत्र के हाथ है. अमरीका की अदालतों ने यह दिखा दिया है कि संवैधानिक मूल्यों की रक्षा कैसे की जा सकती है.

वे बहुसंख्यकों का वर्चस्व स्थापित करने के दबाव में नहीं आई है. क्या ऐसे नाज़ुक मोड़ पर भारत को उसका न्यायतंत्र निराश करेगा?

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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