ब्लॉग: रात-दिन मर्दों का भेदभाव झेलती हैं महिलाएँ

  • 10 मई 2017
इमेज कॉपीरइट White house

बात कुछ महीने पुरानी है. पिछले साल सितंबर में वाशिंगटन पोस्ट में छपी एक ख़बर में लिखा था, "ओबामा के अहम स्टाफ़ में दो-तिहाई मर्द हैं. महिला कर्मचारियों की समस्या ये थी कि उन्हें अहम मीटिंग्स में अपनी बात रखने के लिए संघर्ष करना पड़ता था और उनकी बातें नज़रअंदाज़ की जाती थीं."

तब ओबामा के ऑफ़िस में काम करने वाली महिलाओं ने एक प्रयोग करना शुरू किया था जिसे उन्होंने ऐम्लिफ़िकेशन का नाम दिया.

यानी जब ओबामा के दफ़्तर में मीटिंग होती थी और कोई महिला सदस्य अपनी बात रखती थी तो बाकी की महिला सहकर्मी उसकी बात को दोहराते हुए बात आगे बढ़ाती थीं.

सुनी-अनसुनी बातें

इमेज कॉपीरइट AFP

पिछले हफ़्ते जब निर्भया मामले में फ़ैसले के दिन मैं सुप्रीम कोर्ट के बाहर इंतज़ार कर रही थी तब कुछ ऐसी ही बातें मेरे कानों में पड़ी थीं- वहाँ इकट्ठा कुछ युवक और युवतियां इस मुद्दे पर दिलचस्प बहस कर रहे थे.

बरसों पहले जब मैं नई-नई नौकरी में आई थी तो अपनी बात, सुझाव मीटिंग में रखने की कोशिश करती.

अक्सर एहसास होता कि मेरी बात सुनी-अनसुनी कर दी गई और ऐसा बार-बार होता. लेकिन फिर वही सुझाव या आइडिया दूसरे दिन ऑफ़िस में कोई पुरुष सहयोगी देता तो लोग उसे बड़ी गंभीरता से लेते.

धीरे-धीरे ये बात मेरे मन में घर करने लगी कि कुछ कमी मुझ में ज़रूर है.

फिर नौकरियाँ बदली, जगह बदली, लोग बदले.... बहुत से चीज़ें बेहतर हुई लेकिन सुना-अनसुना किए जाने वाली दिक्कत बनी रही. मुझे इससे इतनी परेशानी होने लगी कि मैं हर घटना का ब्यौरा रखने लगी.

एवरीडे सेक्सिज़म

इमेज कॉपीरइट AFP

धीरे-धीरे मुझे एक पैटर्न-सा दिखने लगा. और मैंने पाया कि हमेशा तो नहीं लेकिन अक्सर कामकाजी माहौल में, जब महिलाएं अपनी बात रखती हैं तो पुरुषों के मुकाबले उनकी बात को उतनी तवज्जो नहीं मिलती.

मैंने कई बार दूसरी महिला सहकर्मियों के साथ भी ऐसा होते देखा.

ख़ैर कई साल अपने आप में ही उधेड़बुन में रहने के बाद मुझे समझ में आया कि समस्या शायद मेरे साथ नहीं, समस्या इस माहौल में है.

मुझे ये भी पता चला कि ऐसी ही छोटी-छोटी चीज़ों के लिए एक नाम है- एवरीडे सेक्सिज़म.

इतनी लंबी चौड़ी राम कहानी का मतलब ये है कि कई छोटी-छोटी बातों में महिलाओं को एवरीडे सेक्सिज़म का शिकार होना पड़ता है. ये किस्सा सिर्फ़ ऑफ़िसों तक ही सीमित नहीं है.

'बिल मैं देती हूँ'

इमेज कॉपीरइट Reuters

फ़ेसबुक पर मैं महिलाओं के अलग-अलग ग्रुपों का हिस्सा हूं और वहां अक्सर इस बात पर चर्चा होती रहती है.

जैसे एक महिला ने लिखा कि जब कभी भी वो घर पर एसी या कोई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण ठीक कराने के लिए किसी को बुलाती हैं तो मकैनिक आकर यही पूछता है कि क्या सर घर पर हैं?

कुछ साल पहले जब मुझे कार ख़रीदने की ज़रूरत महसूस हुई थी, तो मैं दो अलग-अलग शहरों के कई कार शोरूम में गई.

यही बताया कि मुझे कार खरीदनी है जो मेरी ज़रूरतों को पूरा कर सके. लेकिन हर बार सेल्समैन मेरे पुरुष साथियों को ही संबोधित कर उन्हें ही नफ़ा-नुकसान समझाते थे जैसे मैं वहाँ मौजूद ही नहीं हूं.

ये यूनिवर्सल समस्या है.

जेन प्राइस इंग्लैंड के वेल्स में रहती हैं. अपना अनुभव साझा करते हुए उन्होंने लिखा, "डियर मकैनिक, कार मैं चलाती हूँ, बिल मैं देती हूँ तो आप कार में क्या समस्या है ये मुझे ही बता सकते हैं न कि मेरे ब्वॉयफ़्रेंड को."

किचन के खिलौनों पर लड़कियों की फ़ोटो

मुझे याद है कि एक इंटरव्यू में विद्या बालन ने इसी बात पर मुझसे कहा था, "मुझे बड़ी हैरानी होती है कि मेरे ही दोस्त मेरी शादी के बाद पार्टी या फंक्शन का कार्ड मेरे नाम पर नहीं पति के नाम पर भेजने लगे हैं."

दुकानों में बिकने वाले रसोईघर के खिलौनों को ही लीजिए तो उन पर लड़कियों की ही तस्वीर होती है जिसमें वो खाना बना या परोस रही होती हैं.

मीडिया की सुर्खियों से लेकर फ़िल्मों और क्रिकेट तक में ये दिखाई देता है. मिसाल के तौर पर इस साल ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरेज़ा मे की मुलाक़ात स्कॉटलैंड की नेता निकोला स्टर्जन से हुई थी.

ब्रेक्सिट के माहौल में हेडलाइन और फ़ोटो के लिए कई विकल्प हो सकते थे. लेकिन डेली मेल अख़बार ने फोटो में दोनों की टाँगों पर फ़ोकस रखा और हेडलाइन थी- 'नेवर माइंड ब्रेक्सिट, हू वन लेग्स इट?'

यानी उनका फ़ोक्स इस पर था कि स्कर्ट में किसकी टाँगे बेहतर नज़र आ रही थीं. क्या पुरुषों के बारे में ऐसी हेडलाइन लिखेंगे?

'ये तो पुरुषों से भी बेहतर है'

खेल की ख़बर लिखनी हो तो क्रिकेटर या फ़ुटबॉलर का मतलब ही होता है पुरुष खिलाड़ी. पर मंगलवार को झूलन गोस्वामी सबसे ज़्यादा विकेट लेने वाली क्रिकेटर बनीं तो उनके नाम के आगे लिखना पड़ा महिला क्रिकेटर.

लेकिन अगर अश्विन यही रिकॉर्ड बनाते हैं तो क्रिकेटर लिखना ही काफ़ी होता है.

इमेज कॉपीरइट Twitter

मुझे याद है कि जब जिमनास्ट सिमोन बाइल्स रियो ओलंपिक में बेहतरीन परफॉर्म कर रही थी, तो एक कमन्टेटर ने कहा था, "मुझे लगता है कि वो शायद पुरुषों से भी बेहतर परफॉर्म कर सकती हैं."

या फिर जब 'शिकागो ट्रिब्यून' अख़बार ने ओलंपिक में ट्रैप शूटिंग विजेता कोरी को अपनी हेडलाइन में कुछ यूं इंट्रोड्यूस कराया- 'वाइफ़ ऑफ बियर्स लाइंसमैन'.

यहां इशारा उनके पति की ओर था जो 'शिकागो बियर्स' फ़ुटबॉल टीम के लिए खेलते हैं.

पढ़ने में ये बातें 'ट्रिवियल' या ग़ैर ज़रूरी लग सकती हैं लेकिन समान दर्जा हासिल करने की औरतों की जद्दोजहद में ये बातें चुभने वाली लगती हैं- ख़ासतौर पर जब ये किस्सा रोज़ का हो.

अगर इसे 'दिलासा' देने वाली बात समझें तो हाँ दिल को बहला सकते हैं कि अगर अमरीकी राष्ट्रपति के दफ्तर तक में ये समस्या है तो मैं और आप इस जद्दोजहद में अकेले नहीं है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)