बहसः क्या संघ की दी परिभाषा ही हिंदुत्व की परिभाषा है?

  • 1 जून 2017

केंद्र सरकार द्वारा 'पशुओं के प्रति क्रूरता की रोकथाम (पशुधन बाजार का विनियमन) नियम -1960' में बदलाव और इसके विरोध में आयोजित किए जा रहे प्रदर्शनों और 'बीफ फेस्टिवल' को लेकर बहस छिड़ी हुई है.

चेन्नई के आईआईटी में इसी तरह के एक 'बीफ फेस्टिवल' के बाद एक आयोजनकर्ता पर हमला हुआ. दक्षिण भारत के विभिन्न हिस्सों में हो रही बहस अब दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय तक पहुँच गई है.

नज़रिया: जेएनयू जैसा है, वैसा यूं ही नहीं है

क्या बीफ़ फ़ेस्टिवल जैसे आयोजनों से लोगों की भावनाएं आहत होती हैं. ऐसे आयोजनों की राजनीति क्या है. इसी सवाल को लेकर बीबीसी हिंदी ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्याल में छात्रों और छात्र प्रतिनिधियों से बात की.

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बीफ़ केरल में खा सकते हैं यूपी में नहीं

बीबीसी संवाददाता सलमान रावी के साथ चर्चा करते हुए छात्रों ने इस मुद्दे पर खुलकर अपने विचार रखे. बीबीसी हिंदी के 'फेसबुक लाइव' के दौरान विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच से मिलीजुली प्रतिक्रया सामने आयी है.

चर्चा में विभिन्न राजनीतिक रुझानों के छात्र शामिल थे जिनमे से कुछ का कहना था कि कौन क्या खाए इसपर पहरा नहीं लगना चाहिए. वहीं कुछ का कहना था कि खाने की आज़ादी के साथ-साथ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इससे किसी की भावना को ठेस न पहुंचे.

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क्या शाकाहार थोप रही है सरकार?

"अगर सरकार लोगों पर शाकाहार थोपना चाहती तो 'पशुओं के प्रति क्रूरता की रोकथाम (पशुधन बाज़ार का विनियमन) नियम -1960' में बदलाव के दौरान वो पशुओं की श्रेणी में भेड़ और बकरी को भी परिभाषित कर देती. मगर ऐसा नहीं किया गया. केरल और पूर्वोत्तर राज्यों में लोगों की भावना को देखते हुए वहां 'बीफ़' पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया गया है." - अभिजीत, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के सदस्य.

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धर्म से नहीं जुड़ा है बीफ़ का सेवन

"केरल में 'बीफ़' कोई धर्म से नहीं जुड़ा है क्योंकि इसे सभी समुदाय के लोग खाते हैं. चाहे वो ईसाई हों, मुसलमान या फिर हिन्दू. केरल में अस्सी प्रतिशत लोग मांसाहारी हैं और इनमें से बहुत सारे 'बीफ़' खाते हैं. बीफ़ खाने वाले हिन्दुओं का प्रतिशत भी काफी ज़्यादा है. इसके खाने का धर्म से कोई लेना देना नहीं है. अब नए संशोधन के बाद एक तरह का प्रतिबन्ध लोगों पर थोपा जा रहा है." - जेएनयू में पढ़ रहे केरल से आये छात्र हसीब और अब्दुल्लाह.

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इंसान का महत्व पशुओं से ज़्यादा

"मुंशी प्रेमचंद ने कहा था कि गाय के मामले में हमारा अन्यायपूर्ण रवैया रहा है. उन्होंने कहा था कि चाहे वो गोपाल की गाय हो या फिर ईसा का गधा, अगर हम यह समझने में असफल रहे कि इंसान की महत्ता पशुओं से ज़्यादा है, तो हम सभ्यता की वर्णमाला को समझने में विफल रहे हैं." - जयंत जिज्ञासु एआईएसएफ़

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क्या सिर्फ़ संघ की परिभाषा ही हिंदुत्व की परिभाषा है?

"मंदिरों में बली दी जाती है जानवरों की. मैं पहाड़ों का रहने वाला हूँ. हमारी तरफ हिंदू भी गौकशी करते हैं. हिन्दू धर्म में भी वैणव और दूसरे पंथ हैं जिनकी अलग- अलग प्रथाएं हैं. इन्हें कोई चुनौती नहीं देता. जो हिन्दुइज़्म की परिभाषा संघ देता है क्या सिर्फ वही सही है?" - सन्नी धीमान, एनएसयूआई

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