23 साल से उन आंखों को है लापता पति की तलाश

कश्मीर, लापता हुए लोग, एपीडीपी इमेज कॉपीरइट facebook

हर साल 30 अगस्त को 'International Day of the Disappeared' मनाया जाता है और भारत प्रशासित कश्मीर में 27 बरस से इस दिन वो लोग जुटते हैं जिनके अपने कई साल से लापता हैं.

एपीडीपी ऐसे ही लोगों का एक संगठन है जिनका कोई न कोई गुमशुदा है. परवीना अंगर इसकी अध्यक्ष हैं. परवीना का खुद का बेटा पिछले 26 साल से लापता है. अपने बेटे को ढूंढते-ढूंढते उन्होंने ऐसे बाकी लोगों को इस संगठन से जोड़ा.

परवीना पिछले 26 साल से आज के दिन अपनी बात रखने के लिए लोगों के साथ आती हैं. हर साल एक नई उम्मीद के साथ. परवीना कहती हैं कि उन्हें किसी और चीज़ की ज़रूरत नहीं वो सिर्फ यहां अपनों के इन्तेज़ार में बैठी हैं.

'तुम पर फ़ायरिंग होती तो तुम पत्थर नहीं मारती?'

उम्मीद

इस बार बड़ी संख्या में स्टूडेंट्स ने इसमें हिस्सा लिया. कई कलाकारों ने भी हिस्सा लिया. सबका यही मानना है कि जो कश्मीर लोगों को दूर से बेहद खूबसूरत नज़र आता है उसके दिल में सिर्फ दर्द है.

सबिया डार भी इस मुहिम का हिस्सा हैं. उन्हें पूरी उम्मीद है कि लोगों के जुड़ने से एक दिन बदलाव आएगा, लोग जुड़ेंगे तो ज्यादा से ज्यादा लोगों तक कश्मीर की सच्चाई पहुंचे.

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कश्मीरी किससे 'आज़ादी' चाहते हैं?

सफ़िया भी एक पीड़िता हैं. उनके पति पिछले 23 सालों से लापता हैं. वो कहती हैं, ''जब तक मैं ज़िदा हूं मेरी उम्मीद भी ज़िंदा है. उस दिन आख़िरी बार उन्हें देखा था और एक आज का दिन है, जब मेरी आंखें उन्हें हर पल खोजती हैं.''

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परवीना ने गांव-गांव जाकर लोगों को इस काम के लिए जमा किया. उनका कहना है कि न कोई सरकार उनकी मदद करती है और न कहीं और से कोई मदद मिलती है. उन्हें सिर्फ लोगों का सहारा है. परवीना का कहना है कि यह न्याय की लड़ाई है.

(परवीना और उनके साथियों के साथ बीबीसी संवाददाता रियाज़ मसरूर की बातचीत पर आधारित.)

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