ग्राउंड रिपोर्ट: बांग्लादेशी शिविरों में कैसे रह रहे हैं रोहिंग्या शरणार्थी?

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'उन्होंने हमारे बच्चों को मार दिया. हमारे घर जला दिए. औरतों के साथ बुरा सुलूक किया. बड़ी मुश्किल से हम यहां तक पहुंचे हैं.'

ऐसी ढेरों कहानियां इन राहत शिविरों में बिखरी पड़ी हैं. म्यांमार से भागकर बांग्लादेश पहुंचे रोहिंग्या शरणार्थी अब भी उस ख़ौफ़ को भुला नहीं पाए हैं.

म्यांमार सीमा से महज़ 6 किलोमीटर की दूरी पर बांग्लादेश के कॉक्स बाज़ार के कुटुप्लोंग में बने राहत शिविरों में रह रहे शरणार्थियों से बीबीसी हिंदी ने बात की और वहां के हालात जानने की कोशिश की.

कुटुप्लोंग में हज़ारों की संख्या में रोहिंग्या मुसलमान भागकर आए हैं. वे यहां बने राहत शिविरों में रह रहे हैं लेकिन उनकी परेशानियां कम होने का नाम नहीं ले रहीं. हालांकि बांग्लादेश सरकार और कुछ अंतरराष्ट्रीय राहत संस्थाओं द्वारा मदद मुहैया कराई जा रही है लेकिन स्थिति अब भी बेहतर नहीं है.

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करीब दस दिन पहले म्यांमार सीमा पार करके बांग्लादेश पहुंचे शालौन बताते हैं कि उन्हें यहां तक पहुंचने में बहुत तक़लीफ़ उठानी पड़ी. नदी पार करनी पड़ी. म्यांमार में उनका घर जला दिया गया, जिसके बाद वो यहां भागकर आने को मजबूर हो गए. वो कहते हैं कि बांग्लादेश सरकार ने उनका साथ दिया.

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एक अन्य शख़्स जो पांच दिन पहले ही इस कैंप में पहुंचा है, उसने बताया कि म्यांमार की सेना ने उसकी बस्ती को जला दिया. बच्चों को मारा और औरतों के साथ बुरा व्यवहार किया. उनके साथ उनका पूरा परिवार यहां आया है.

बांग्लादेश की सरकार ने राहत शिविरों के लिए कई एकड़ ज़मीन मुहैया करायी है लेकिन यहां रह रहे लोगों की स्थिति बहुत दयनीय है. लोगों के पैरों में पहनने के लिए चप्पल नहीं है. कपड़े भी अंतरराष्ट्रीय राहत एजेंसियों ने दिए हैं.

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यहां बने कैंप में पहुंचने के लिए संकरे रास्तों से होकर गुज़रना पड़ता है. अनुमान लगाया जा रहा है कि करीब 4 लाख रोहिंग्या मुसलमान सीमा पार करके यहां तक पहुंचे हैं.

शिविरों में सिर ढकने की जगह तो है लेकिन भारी संख्या में आए इन लोगों को अभी भी खाने और पीने के पानी की तक़लीफ से जूझना पड़ रहा है. हालात तब और बद्तर हो जाते हैं जब बारिश होती है. मिट्टी खिसक जाती है जिससे शिविरों को दोबारा से खड़ा करना पड़ता है.

दरअसल, यहां पहाड़ों को काटकर लोगों के रहने की व्यवस्था की गई है. हज़ारों लोगों के बीच पीने के पानी के लिए एक हैंडपंप की व्यवस्था है.

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कॉक्स बाज़ार से इस जगह तक पहुंचने में करीब दो घंटे का समय लगता है लेकिन हालात का अंदाज़ा रास्ते के किनारे खड़े लोगों को देखकर हो जाता है. ज्यादातर लोग पैसे मांग रहे होते हैं या फिर खाना. कई बार राहत सामग्रियों के लिए दंगे जैसी स्थिति भी हो जाती है.

इमान हुसैन नाम के एक शख़्स ने बताया कि वो लंबे समय से भूखे हैं. वो 14 लोगों के साथ सीमा पार करके आए हैं.

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मीनारा अपने परिवार के 10 लोगों के साथ यहां आई हैं. उनकी गोद में एक छोटा सा बच्चा है लेकिन वो सड़क पर खड़ी हैं. ताकि खाने को मिल जाए.

मीनारा और इमान हुसैन जैसे हज़ारों लोग हैं लेकिन ज़्यादातर का कहना है कि अब वो म्यांमार तभी लौटेंगे जब उन्हें नागरिकता मिलेगी वरना वे वापस नहीं जाएंगे.

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