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सोमवार, 06 जनवरी, 2003 को 06:12 GMT तक के समाचार
चंदे के नाम पर
चंता इकट्ठा करने के नाम पर शानदार महफ़िलों का नज़ारा
चंता इकट्ठा करने के नाम पर शानदार महफ़िलों का नज़ारा

मोहसिन सईद

कल्पना कीजिए किसी महफ़िल में बेहतरीन सुर्ख़ क़ालीन बिछा हो और उस पर रंग बिरंगी पोशाकों में सजे धजे लोग ख़रामा ख़रामा चहलक़दमी कर रहे हों.

महिलाओं को देखकर लगता हो जैसे जन्नत से परियाँ और हूरें सीधे उस महफ़िल में उतर आई हों.

महफ़िल की फ़िज़ा तरह तरह की ख़ुशबुओं से महकी हो, महँगी सिगारों का धुआँ भी माहौल में फैला हो, और सफ़ेद दस्ताने पहले बैरे मेहमानों को मदिरा पिला रहे हों.

माहौल देखकर तो यही कहा जा सकता है कि ऐसा नज़ारा लंदन, पेरिस या फिर न्यूयार्क का हो सकता है लेकिन दरअसल ऐसा है नहीं. यह नज़ारा ग़रीबी से त्रस्त पाकिस्तान के किसी शहर का भी हो सकता है.

और विडंबना यह कि ऐसी महँगी महफ़िलें मानवीय कार्यों के लिए दान के ज़रिए चंदा इकट्ठा करने के लिए आयोजित की जाती हैं.


मेहमानों की ख़ातिरदारी के लिए हर संभव कोशिश
पाकिस्तान की व्यावसायिक राजधानी कराची में आजकल दो तरह के लोग नज़र आते हैं.

एक तो वे जो नए साल के आगमन के अवसर पर मैरी एडिलेड कुष्ठ निवारण केंद्र और किडनी सेंडर के लिए चंदा एकत्र करने के लिए आयोजित ऐसी महफ़िलों में जाना पसंद करते हैं.

और दूसरी तरह के वे लोग हैं जो ऐसी महफ़िलों में नहीं जा सकते या जाना पसंद नहीं करते.

पैसे का जादू

बहुत से ऐसे भी लोग होते हैं जो अपनी शानो शौकत का दिखावा करने के लिए ऐसी महफ़िलों के लिए साढ़े सात हज़ार रूपए के टिकट के लिए दस हज़ार रूपए भी देने के लिए तैयार रहते हैं.

इसके बावजूद ऐसी महफ़िलों में शिरकत कर पाना कोई आसान नहीं है और प्रतीक्षा सूची 500 तक रहती है.

कल्याणकारी कार्यों के लिए चंदा इकट्ठा करने के लिए ऐसी शानदार महफ़िलें आयोजित करने वालों में अनेक कंपनियाँ आगे रहती हैं जिनमें लेयटन रहीमतुल्ला बेनेवोलेंट ट्रस्ट, लेडी डफरिन मेटरनिटी हॉस्पिटल और मैरी एडिलेड कुष्ठ निवारण केंद्र जैसे कुछ नाम प्रमुख हैं.

इन महफ़िलों के आयोजक आमतौर पर शानोशौकत का दिखावा करने वाले, प्रभावशाली और धन का प्रभाव दिखाने और जमाने वाले लोग होते हैं.


क्या सचमुच सहायता पहुँचती है
उनका कहना है कि पैसे का जादू सर चढ़कर बोलता है इसलिए ऐसी महफ़िलों में जब धन खुलकर ख़र्च किया जाता है तभी चंदा भी खुलकर मिलता है.

औपनिवेशिक परंपरा

लेकिन मशहुर क्रिकेट खिलाड़ी वसीम अकरम की पत्नी हुमा अकरम ऐसे दिखावे से ख़ासी नाराज़ नज़र आती हैं.

पेशे से एक मनोवैज्ञानिक हुमा अकरम कहती हैं कि ऐसी महफ़िलें दरअसल पश्चिमी जीवन शैली के साथ ख़ुद को जोड़कर देखने की मनोवृत्ति को दर्शाती हैं.

"यह औपनिवेशिक शासन की ही प्रभाव है. दरअसल ब्रिटेनवासियों की तरह हम भी नई चीज़ों के लिए कोशिश करने से डरते हैं."

लेकिन ऐसी चिंताओं और आलोचनाओं से बेफ़िक्र चंदा इकट्ठा करने वाले फैशन शो, संगीत महफ़िलें वग़ैरा आयोजित करने से नहीं बाज़ आते.

ये लोग ऐसे बाज़ार भी सजाते हैं जहाँ विदेशों की चीज़ें महँगे दामों में बेची जाती हैं जैसे कि स्विट्ज़रलैंड की चाकलेट या चीज़ हो, क्यूबा का सिगार या सिंगापुर और हॉलैंड के रंग बिरंगे पौधे.

लोग इनकी तरफ़ आकर्षित होते हैं और इन विदेशी चीजों को भारी दामों में ख़रीदते हैं.

इतना ही नहीं ऐसी महफ़िलों के लिए ख़ानसामा और बैरे भी सिंगापूर, दुबई और यूरोप के अन्य देशों से बुलाए जाते हैं.

एक मॉडल वनीज़ा अहमद कहती हैं, "अगर मैं ऐसा कहूँ कि मैं ऐसी महफ़िलों में किसी अच्छी वजह से जाती हूँ तो सच मानिए कि मैं झूठ बोलूँगी."

वह कहती हैं कि ऐसी महफ़िलों में हम जैसे लोग अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लालच में जाते हैं. वरना कल्याणकारी कार्यों के लिए चंदा देने के तो और बहुत से तरीक़े हैं.


इमरान ज़रूरतमंदों तक ख़ुद पहुँचे हैं
कराची का एक नवविवाहित जोड़ा कहता है, "हम ऐसी महफ़िलों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने और लोगों में की नज़र में बने रहने के लिए जाना पसंद करते हैं."

ऐसे लोगों का मानना है कि ऐसी महफ़िलों में जो ताल्लुकात बनते हैं उन्हीं पर सामाजिक जीवन निर्भर करता है और सच कहें तो ऐसे ताल्लुकात के बल पर ही व्यावसायिक कामयाबी मिलती है.

लेकिन इसके उलट अनेक लोग ऐसे लोगों के लिए भी चिंतित नज़र आते हैं जिनके पास खाने के लिए भोजनऔर पहनने के लिए कपड़े तक नहीं हैं.

लिबास इंटरनेशनल की संपादक सबीन साईगोल कल्याणकारी कार्यों ख़ासतौर से शिक्षा के प्रसार के लिए चंदा देने में विश्वास करती हैं.

वह कहती हैं, "मेरे ख़याल में शिक्षा ही एकमात्र ऐसा रास्ता है जिसके ज़रिए तमाम सामाजिक बुराइयों से छुटकारा पाया जा सकता है और इसी के ज़रिए पाकिस्तान की क़िस्मत को भी बदला जा सकता है.

क्या वाक़ई चिंता?

अनेक लोगों का ऐसा भी सोचना है कि देश में नेत्रहीनों, बहरों, कैंसर के मरीज़ों और महिलाओं और बच्चों का भला करने के नाम पर धन इकट्ठा करके मौजमस्ती करना दरअसल ख़ुदग़र्ज़ी ही कहा जाएगा.

हुमा अकरम कहती हैं कि शानदार महफ़िलें आयोजित करके चंदा इकट्ठा करने वालों ने उन लोगों को शायद ही कभी देखा भी हो जिनके नाम पर वे भारी धन एकत्र करते हैं.

इसके उलट अगर प्रभावितों और ज़रूरतमंदों के साथ वक्त गुज़ारा जाए तो वह ज़्यादा लाभदायक और परिणामदायक होता है.

पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी इमरान ख़ान और ब्रिटेन की पूर्व राजकुमारी डायना इसके जीते जागते उदाहरण हैं जिन्होंने अपनी लोकप्रियता के ज़रिए सचमुच जरूरतमंदों की मदद का बीड़ा उठाया.

हुमा के अनुसार इमरान और डायना ने ऐसी महफ़िलों के आकर्षण से बचकर और ज़रूरतमंदों के पास जाकर उनके दुखदर्द को दूर करने की कोशिश की.
 
 
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