माओवादियों ने दी चेतावनी

नेपाल में माओवादियों ने सरकार को चेतावनी दी है कि यदि गुरुवार की रात तक यदि सेना प्रमुख की बर्खास्तगी का मसला न सुलझा तो वे देशव्यापी प्रदर्शन शुरु कर देंगे.

Image caption माओवादियों का आरोप है कि जो कुछ हुआ वह एक षडयंत्र का हिस्सा था

माओवादियों का कहना है कि जिस तरह से सरकार ने इस मसले पर कार्रवाई की है, उससे वे संतुष्ट नहीं हैं.

गत मई में माओवादी नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड ने प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. वे इस बात से नाराज़ थे कि सेना प्रमुख को बर्खास्त किए जाने के सरकार के फ़ैसले को राष्ट्रपति ने ख़ारिज कर दिया था.

माओवादियों ने राष्ट्रपति राम बरन यादव के इस क़दम को असंवैधानिक क़रार दिया था और मांग की थी कि इस मसले पर संसद में चर्चा होनी चाहिए.

'तानाशाह'

माओवादी कमिटी के सदस्य देव गुरुंग ने इस बारे में कहा, "राष्ट्रपति ने क़ानून के ख़िलाफ़ काम किया है."

उनका कहना था, "वे एक तानाशाह की तरह काम कर रहे हैं, जो हम नहीं चाहते."

लेकिन नेपाल की गठबंधन सरकार, जिसने माओवादियों के हटने के बाद सत्ता संभाली है, का कहना है कि इस मसले पर बातचीत हो चुकी है और नेपाल के सभी राजनीतिक दलों ने इस पर विस्तार से चर्चा कर ली है.

गठबंधन सरकार में शामिल नेपाल कांग्रेस पार्टी के राम शरण महत का कहना है, "सभी राजनीतिक दलों ने एकजुट होकर यह फ़ैसला किया है कि लोकतंत्र की महत्ता को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रपति का फ़ैसला सही है."

उनका कहना है, "जहाँ तक हमारा संबंध है, हमारी राय में यह मसला अब सुलझा लिया गया है."

लेकिन माओवादियों का कहना है कि यदि इस विषय में संसद में चर्चा नहीं होती है तो वे संसद से लेकर सड़क तक इसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन करेंगे और अपने समर्थकों सहित देश भर में सड़कों पर उतर आएँगे.

माओवादियों ने देश में हुए पहले लोकतांत्रिक चुनाव में जीत हासिल की थी और सत्ता में आए थे.

बहुत से नेपालवासी माओवादियों की इस चेतावनी को सत्ता में लौटने की कोशिश की तरह देखते हैं.

द काठमांडू पोस्ट के संपादक आदित्य अधिकारी का कहना है, "असली मुद्दा सेना प्रमुख की बर्खास्तगी नहीं है. असली मुद्दा यह है कि नई सरकार सत्ता में आई और उसने सरकारी ढाँचे का उपयोग करते हुए जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता और अपना प्रभाव बढ़ाना शुरु कर दिया."

उनका कहना है, "अब माओवादियों को डर लग रहा है कि वे राजनीतिक परिदृश्य के हाशिए पर चले जाएँगे और पिछले दो सालों में उन्होंने जो कुछ हासिल किया है वह खो जाएगा."

लेकिन कुछ विश्लेषकों का कहना है कि यदि माओवादी फिर से सड़कों पर उतरे तो उस शातिप्रक्रिया को ख़तरा हो सकता है, जो लोकतंत्र के स्थापना के साथ शुरु हुई थी.

लेकिन इस समय न तो सरकार की ओर से और न माओवादियों की ओर से सुलह-समझौते की कोई सूरत नज़र आ रही है.

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