हामिद करज़ई: जीवन परिचय

अफ़ग़ानिस्तान में 20 अगस्त को हो रहे राष्ट्रपति चुनाव के लिए 41 उम्मीदवारों ने अपने नाम दर्ज करवाए हैं. मुख्य उम्मीदवारों में वर्तमान राष्ट्रपति हामिद करज़ई का नाम शामिल है. 2004 का राष्ट्रपति चुनाव भी उन्होंने ही जीता था.

हामिद करज़ई 2004 में अफ़ग़ानिस्तान के पहले चुने गए राष्ट्रपति बने. इससे पहले वे तीन साल तक देश के आंतरिक नेता के तौर पर काम कर रहे थे.

उनका जन्म 24 दिसंबर 1957 में कंधार में हुआ. काबुल में कुछ देर पढ़ाई करने के बाद वे भारत के शिमला में पढ़ाई के लिए चले गए.

1982 में वे सोवियत संघ के ख़िलाफ़ अभियान में शामिल हो गए और अफ़ग़ान नेशनल लिबरेशन फ़्रंट के अभियान निदेशक बन गए. 90 के दशक के शुरुआती सालों में जब तालेबान का उदय हुआ था तो करज़ई ने पहले उसका समर्थन किया था.

लेकिन 1994 तक आते-आते वे तालेबान को शक़ की निगाह से देखने लगे. इसके बाद उन्होंने अपनी राह अलग कर ली.

दिसंबर 2001 में तालेबान के जाने के बाद उन्होंने अंतरिम तौर पर सत्ता संभाली और उन पर हमला भी हुआ था जिसमें वे बच गए. अंतरिम राष्ट्रपति बनने के बाद इस पशतून नेता ने जल्द ही देश-विदेश में अपना नाम बनाया.

वे शाही पशतून खानदान से संबंध रखते हैं, इसलिए उन्हें समाज के बड़े तबके ने स्वीकार किया. सोवियत संघ विरोधी छवि के कारण उन्हें पूर्व मुजाहिद्दीनों का भी समर्थन मिला.

चुनौती

हामिद करज़ई लंबे से अफ़ग़ानिस्तान में आम सहमति वाली सरकार बनाना चाहते थे. अक्तूबर 2001 में वे पाकिस्तान से अफ़ग़ानिस्तान आए. उस समय अमरीकी सेना तालेबान के ख़िलाफ़ अभियान चला रही थी. जब तालेबान को पता चला कि वे अफ़ग़ानिस्तान लौट आए हैं तो उनके ठिकाने पर हमले किए गए.

कहा जाता है कि दिसंबर 2001 में तालेबान को उनके अंतिम गढ़ कंधार से निकालने में करज़ई ने अहम भूमिका निभाई थी.

अफ़ग़ानिस्तान में 2001 में संयुक्त राष्ट्र के समर्थन में सम्मेलन हुआ ताकि वहाँ अंतरिम सरकार का गठन हो सके. करज़ई को तब तक अमरीका का समर्थन हासिल हो चुका था.

वर्ष 2004 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में वे विजयी रहे थे.

करज़ई के विरोधियों का आरोप रहा है कि वे अमरीका की कठपुतली की तरह हैं. ख़ासकर 2002 के लोया जिरगा में जिस तरह अमरीका ने हस्तक्षेप कर कहा कि पूर्व राजा ज़हीर शाह करज़ई का विरोध नहीं करेंगे (अगर करज़ई राष्ट्रपति बनते हैं तो.)

पढ़े लिखे, अंग्रेज़ी बोलने में माहिर और पश्चिमी संस्कृति से रुबरु करज़ई को पश्चिमी देशों का समर्थन मिलता रहा है. हालांकि पिछले कुछ सालों में आपसी तनाव बढ़ा है.

करज़ई के आलोचकों का कहना है कि राजधानी काबुल के बाहर होने वाली घटनाओं पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है और इन इलाकों में तालेबान का प्रभाव बढ़ रहा है.

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