दुर्गम इलाक़ों में चुनावी सरगर्मी

अफ़ग़ान महिला और बच्चा
Image caption अफ़ग़ानिस्तान के सुदूर इलाक़ो में ख़च्चर और गधे की सवारी आम है

अफ़ग़ानिस्तान के सुदूर उत्तर पूर्व में बसा बदख़शाँ सूबा अपने आप में मानो अलग ही एक दुनिया है-बर्फ़ीली चोटियों और बिखरी घाटियों का समूह है जहाँ पहुंचने के लिए बस एक कच्ची सड़क है जो इसे देश के बाक़ी भाग से जोड़ती है.

राष्ट्रपति चुनाव के माहौल में ऐसे ही दूर-दराज़ और दुर्गम इलाक़ों में ये सवाल उठ रहा है राजधानी काबुल में कौन राष्ट्रपति बनेगा और किसकी सत्ता आएगी.

बदख़शाँ सूबे की राजधानी फ़ैज़ाबाद से कोई 50 किलोमीटर दक्षिण में स्थित दारैम घाटी के किसान मोहम्मदुल्लाह भी वोट देंगे.

चुनाव के दिन उनके परिवार वाले दो गधों के ज़रिए खींची जाने वाली पोस्त-गाड़ी पर सवार होकर मतदान केंद्र पर जाएंगे. यहां तक आने में उन्हें आधे घंटे का सफ़र करना पड़ेगा.

फ़ैज़ाबाद से 120 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित इशाकाशेम के यार मोहम्मद का कहना है कि मतदान के लिए उन्हें भी ऐसा ही करना होगा.

उन्होंने कहा, “हम सब को वोट देना चाहिए, अगर हम नही देंगे तो इससे व्यवस्था कमज़ोर हो जाएगी.”

यार मोहम्मद और मोहम्मदुल्लाह उस क्षेत्र के रहने वाले जो बेहद ख़ूबसूरत हैं लेकिन यहां के लोग बेहद ग़रीबी में पुराने ढर्रे की ज़िंदगी गुज़ारते हैं.

धूल भरी ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर काफ़ी सुस्त रफ़्तारी से चलने वाली वैन से घंटों के सफ़र के बाद ये दोनों अपने बेटों के हरनिए का इलाज कराने फ़ैज़ाबाद के अस्पताल पहुंचे.

Image caption क़ासिम जान का कहना है कि अगर युद्ध नेता वापस आए तो जनता के लिए बुरा होगा

डॉक्टरों का कहना है कि यहां बच्चों में हरनिया की शिकायत आम है. कुपोषण, ज़ोरदार खाँसी और कभी कभी आयोडीन की कमी इसका कारण होती है.

दोनों परिवारों की समस्याएं लग-भग एक समान हैं और बदखशाँ सूबे के ज़्यादातर लोगों की हालत भी कुछ उसी तरह की है.

कठपुतली सरकार?

यहाँ सवाल ये उठता है कि काबुल में सरकार ने वारलॉर्ड्स या कबायली सरदारों के मुकाबले बदख़शाँ जैसे दूर-दराज के इलाक़ों के लिए क्या किया.

राज्य के बहुत से लोगों का कहना है, “कुछ नहीं किया है.” कुछ लोग इसे अमरीकी कठपुतली सरकार के तौर पर देखते हुए इसकी निंदा करते हैं

उनका कहना है कि पिछले सात वर्षों में राज्य में सड़कें बनाने की कोई कोशिश नहीं हुई और यहां संचार माध्यम का बुनियादी ढांचा नहीं है.

सोवियत क़ब्ज़े के ख़ातमे के बाद दूसरे राज्यों की तरह बदख़शाँ में भी सरदारों का उदय हुआ जिनमें से कई लोग करज़ई सरकार में शामिल हैं.

बदखशाँ में होने वाली अफ़ीम की फसल से बहुत से लोगों ने काफ़ी लाभ उठाया और कहा जाता है कि हीरा उगलने वाली खानों और तजाकिस्तान से सीमांति व्यापार पर इनमें से कई लोगों का अभी तक क़ब्ज़ा है.

Image caption पुलिस का मानना है कि यहां तालेबान का ख़तरा नहीं है

हाल के दिनों में तालेबान ने यहाँ पहुँच बनाने के कोशिश की है और लोगों से चुनाव में वोट न डालने के लिए कह रहे हैं. यहां पहले कभी तालेबान अपना क़दम नहीं जमा सके हैं.

युद्ध नेता से जुडा

बहरहाल, ज़्यादातर लोगों का मानना है कि इन सबके बावजूद क्षितिज पर बदलाव के संकेत देखे जा सकते हैं.

बदख़शाँ के इतिहास में पहली बार कोई सरकार फ़ैज़ाबाद से केशम तक 105 किलोमीटर लंबी सड़क बना रही है, यह सड़क पड़ोसी राज्य ताखर की सीमा के साथ बन रही है.

पूर्व में लड़ाकों के सरदार रह चुके बाज़ मोहम्मद अहमदी अब अफ़ग़ानिस्तान की जमाते-इस्लामी पार्टी में शामिल हैं और बदख़शाँ के गवर्नर भी हैं. उनका कहना है कि यह सड़क 2010 तक मुकम्मल हो जाएगी.

इसके अलावा गत सात वर्षों में सरकार को विदेश से काफ़ी सहायता राशि मिली है ताकि अफ़ग़ानिस्तान के इस क्षेत्र में स्वास्थ्य की सुविधा पहुंचाई जाए.

स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि विभिन्न घाटियों में लग-भग 70 के क़रीब नए केंद्र स्थापित किए गए हैं.

Image caption मोहम्मदुल्लाह का कहना है की उनका परिवार वोट देने जाएगा

डॉक्टर मोमिन जलाली ने कहा, “अभी बहुत कुछ करना बाक़ी है, लेकिन हम लोगों ने शुरुआत तो कर दी है.”

सरकार बदख़शाँ में पोस्त की खेती को रोकने में भी सफल रही है. पिछले साल तक यहाँ देश में हेलमंद राज्य के बाद सबसे अधिक अफ़ीम तैयार होती थी.

अधिकारियों का मानना है कि लड़ाकों के सरदारों को सरकार के बुनियादी ढांचे में शामिल करने की सरकार की नीतियों के कारण ऐसा संभव हो सका है.

फ़ैज़ाबाद के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “बहुत से ऐसे सरदारों को ज़िले के स्तर पर नागरिक सेवा की ज़िम्मेदारी दी गई है और उन्हें कहा गया है कि अगर वे अपनी नौकरी बचाना चाहते हैं तो अपने इलाक़े में पोस्त की खेती को रोकें.”

सूबे के पुलिस महाधिकारी आक़ा नूर केंतूस का कहना है कि यहाँ तालेबान का ख़तरा नहीं है.

लोगों में ये एहसास है कि अफ़ग़ानिस्तान में बदलाव आया है और वह अपने अतीत से बाहर निकलते नज़र आ रहे हैं.

एक स्थानीय किसान क़ासिम जान ने कहा, “अगर वर्तमान व्यवस्था नाकाम हो जाती है तो यहाँ फिर से युद्ध नेता आ जाएंगे और यह लोगों के लिए बुरा होगा.”

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