क़बायली इलाक़ों में सुधारों की घोषणा

आसिफ़ अली ज़रदारी
Image caption युद्ध-ग्रस्त क़बायली इलक़ों को पाकिस्तान की मुख्य धारा में शामिल करने की घोषणा की गई है

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी ने देश के युद्धग्रस्त क़बायली इलाक़ों को पाकिस्तान की मुख्य धारा में शामिल करने के लिए कई तरह के सुधारों की घोषणा की है.

केंद्र प्रशासित क़बायली इलाक़े (फ़ाटा) पर ब्रितानी राज से विरासत में मिली शासन प्रणाली के तहत केंद्र का शासन रहा है.

नए क़ानून के आने से वहाँ राजनीतिक पार्टियाँ काम कर सकेंगी.

पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान दोनों देशों में बढ़ती हिंसा के दौर में ये इलाक़ा 2001 से चरमपंथियों का सुरक्षित ठिकाना रहा है.

इस्लामाबाद में बीबीसी संवाददाता सैयद शोएब हसन का कहना है कि नया क़ानून पाकिस्तानी राजनीति में मील का पत्थर हैं जिससे फ़ाटा में रहने वाले लोगों को राजनीतिक पार्टियों में शामिल होने और वोट देने का मौक़ा मिलेगा.

'चरमपंथी कमज़ोर पड़े'

पाकिस्तानी राष्ट्रपति के एक प्रवक्ता ने कहा कि इससे स्थानीय लोग मज़बूत होंगे और चरमपंथ कमज़ोर होगा.

फ़रहतुल्लाह बाबर ने कहा, "इससे मौलवियों का एकाधिकार ख़त्म होगा, जो मस्जिद से बड़ी सेकुलर पार्टियों को दूर रखने की राजनीति खेला करते हैं."

उन्होंने ये बातें पाकिस्तान के 63वें यौमे-आज़ादी के मौक़े पर होने वाले जश्न को संबोधित करते हुए कहीं.

पाकिस्तान के सात अर्ध-स्वायत्त इलाक़े राजनीतिक और प्रशासनिक तौर पर 1947 में ब्रितानी सरकार के चले जाने के बाद से कभी भी देश के बाक़ी हिस्सों के साथ पूरी तरह शामिल नहीं हो सके.

आलोचकों का मानना है कि इसके कारण एक तरह का शून्य पैदा हो गया और वहाँ अराजकता और चरमपंथ को बढ़ावा मिला.

फ़ाटा में 40 लाख की आबादी है और वहाँ सरकार के नियुक्त किए गए एजेंट क़बायली नेताओं के साथ मिलकर शासन करते हैं.

वहाँ कबायली क़ानून के तहत बिना मुक़दमे के हिरासत और सज़ा देने का प्रावधान है.

बाबर ने कहा कि नए क़ानून से न तो एजेंटों के अधिकारों में कोई कमी होगी और न ही क़ानून में बदलाव होगा. लेकिन इससे राजनीतिक पार्टियाँ वहाँ 2013 के राष्ट्रीय चुनाव में चुनाव प्रचार अभियान चला सकेंगी.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि आशा की जा रही है कि क़बायलियों को बिना मुक़दमे तीन साल तक क़ैद में रखने की इजाज़त देने वाले क़ानून और संपत्ति की क़ुर्क़ी ज़ब्ती के अधिकार को समाप्त करने में मदद मिलेगी.

राष्ट्रपति ज़रदारी ने आशा जताई कि इस महीने के अंत में ये सुधार क़ानून बन जाएंगे.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि आज़ादी के बाद से यहां के लोगों में अलग-थलग पड़ जाने का अहसास है और पाकिस्तान के इन इलाक़ो में चरमपंथ का मसला इस अहसास की सीधी पैदावार है.

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