दुखी ग्रामीण और अफ़ग़ान चुनाव

अफ़ग़ान नागरिक
Image caption शहरज़ाद में चुनाव में लोगों की दिलचस्पी कम पहले कि मुक़ाबले कम दिख रही है

जैसे जैसे अफ़ग़ानिस्तान में चुनाव क़रीब आ रहे हैं उत्तरी राज्य नानगरहर के शहरज़ाद ज़िले में हिंसा की घटनाओं में वृद्धि देखने में आ रही है.

दो करो़ड़ 80 लाख जनसंख्या वाले अफ़ग़ानिस्तान में ज़्यादातर लोग शहरज़ाद जैसे ज़िलों के गाँवों, टोलों और घाटियों में रहते हैं. ये उन इलाक़ों में से एक है जो 20 अगस्त को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव का फ़ैसला करेंगे. इसी साल गर्मियों की एक रात तालेबान चरमपंथियों ने कोड़ी खेल गाँव के एक स्कूल पर हमला कर दिया था. इस स्कूल में लड़के और लड़कियाँ दोनों को शिक्षा दी जाती थी. चरमपंथियों ने गार्ड को स्कूल ख़ाली करने के लिए कहा और फिर इसे धमाके से उड़ा दिया. हालांकि इसमें कोई भी हताहत नहीं हुआ लेकिन तालेबान इस इलाक़े में आतंक फैलाने में सफल रहे. गाँव के एक बुज़ुर्ग ने कहा, “हमने सरकार को इस प्रकार के हमले के लिए सचेत किया था.” उन्होंने तालेबान के ख़ौफ़ से अपना नाम बताने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा, “अगर स्कूल में बच्चे और बच्चियाँ नहीं होंगी, अगर गलियों में पुलिस की गश्त नहीं है तो समझो कि सरकार और अफ़ग़ान की पराजय है और तालेबान की जीत है.”

नफ़रत

एक स्थानीय अधिकारी को यह कहने में कोई संकोच नहीं था कि इस इलाक़े के लोग तालेबान और पश्चिमी फ़ौजियों की लड़ाई में फंसे हुए हैं.

उन्होंने कहा, “हाल के कुछ वर्षों में बहुत से अफ़ग़ान मारे गए हैं.” उन्होंने भी अपना नाम न ज़ाहिर करने के लिए कहा.

उन्होंने कहा, “हिंसा ने अफ़ग़ानिस्तान के लोगों में एक प्रकार की नफ़रत पैदा कर दी है और कुछ स्थानीय लोग तो तालेबान के साथ चले गए हैं.”

सात साल पहले जब अफ़ग़ानिस्तान में पहला लोकतांत्रिक चुनाव हुआ था तो शहरज़ाद के लोगों ने वोट देने मतदान केंद्रों तक जाने के लिए घंटों का सफ़र तय किया था. बारूदी सुरंगों के फटने, तालेबान के आत्मघाती हमलों को ख़ौफ़ भी उन्हें वोट देने जाने से नहीं रोक सका था. कोड़ी खेल के निवासी वली शाह ने कहा, “हम लोगों का विचार था कि चुनाव से हमें सुरक्षा मिलेगी और हमारे गांव का विकास होगा. और इसके लिए हम ख़तरा मोल लेने को तैयार थे.” उस बार लाखों अफ़ग़ान वोट देने वालों में वह भी शामिल थे. उन्होंने कहा कि चुनाव के सात साल बाद भी हमारा जीवन उन्हीं मुश्किलों से घिरा हुआ है. पड़ोसी गाँव पितला में अफ़ग़ान नागरिकों की सुरक्षा बड़ा चुनावी मुद्दा है. बहुत से अफ़ग़ान बुद्धिजीवी पितला में मारे जा चुके हैं, स्कूल तबाह कर दिए गए हैं और सिंचाई की नहरों और पुलों को उड़ा दिया गया है. पितला के एक निवासी ख़ान शाह ने कहा, “पिछले सात वर्षों में कुछ बदलाव ज़रूर आया है. लेकिन सुरक्षा, सड़कें और स्वास्थ्य सुविधा सिर्फ़ क़ाग़ज़ों पर नज़र आते हैं.”

भ्रष्टाचार

Image caption यहां सुरक्षा के अलावा भ्रष्टाचार भी बड़ा चुनावी मुद्दा है

गाँव वालों के लिए भ्रष्टाचार भी बड़ा मुद्दा है.

पिछले साल जाड़े में आए भूकंप ने शहरज़ाद के बड़े भाग को बुरी तरह प्रभावित किया था. इसमें 32 लोग मारे गए थे और लग-भग 200 लोग घायल हुए थे और बहुत से घर और मकान तबाह हो गए थे.

तीस वर्षीय सैयद मरजान तो इस भूकंप में बच गए लेकिन इसमें उन्होंने अपने परिवार के छह लोगों को खो दिया. उन्होंने कहा, “मैं अपना परिवार, अपना घर गंवा चुका हूँ. लेकिन राहत के तौर पर काबुल से हमारे लिए जो खाना, दवा और कंबल भेजा गया था वह कभी हम तक नहीं पहुंच सका, यह बहुत शर्म की बात है.” उन्होंने कहा, “मैं किसी का नाम नहीं लेना चाहता लेकिन जो कोई भी चुनाव में जीत हासिल करता है, उसे हमें सुरक्षा देनी होगी और भ्रष्टाचार से निजात दिलानी होगी.” गाँव के एक बुज़ुर्ग अहमद ख़ान का कहना है कि पिछले चुनाव में हमसे बहुत से वायदे किए गए “लेकिन हमें कुछ नहीं मिला.” काबुल सरकार के ख़िलाफ़ इसी प्रकार की भावना लगभग पूरे कोड़ी खेल में पाई जाती है. सैयद मरजान ने कहा, “हमारे लिए आने वाले खाना और कंबल स्थानीय क़बायली नेताओं के ज़रिए चुरा लिए गए. यही कारण है कि चुनाव में हमारी दिलचस्पी नहीं है.” उन्होंने कहा, “जब हमें उन चीज़ों की ज़रूरत थी उस वक़्त सरकार कहाँ थी. मैंने अपने गाँव के बुज़र्गों को पहले ही बता दिया है कि इस बार हम मतदान नहीं करेंगे.”

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