अफ़ग़ान नागरिकों ने बमों को चुनौती दी: करज़ई

अफ़ग़ानिस्तान में मतदान
Image caption तीन लाख अफ़ग़ान और विदेशी सुरक्षाकर्मी सुरक्षा के लिए तैनात किए गए थे

अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई और उनके सहयोगी पश्चिमी देशों ने गुरुवार को देश के राष्ट्रपति चुनावों के लिए हुए मतदान को 'सफल' बताया है. मतों की गणना शुरु हो गई है लेकिन इसे पूरा होने में लगभग एक महीना लग सकता है.

तालेबान चरमपंथियों की धमिकियों और कड़ी सुरक्षा के बीच हुए मतदान के दौरान कई जगह हमले हुए लेकिन अधिकतर जगह मतदान शांतिपूर्ण ढंग से ही हुआ.

काबुल में मौजूद बीबीसी संवाददाता रेणु अगाल ने सुरक्षा अधिकारियों के हवाले से बताया है कि चुनावी हिंसा में 27 लोगों की मौत हो गई है. मारे गए लोगों में नौ सैनिक, नौ अफ़ग़ान पुलिसकर्मी और नौ आम नागरिक हैं.

इस चुनाव में मौजूदा राष्ट्रपति हामिद करज़ई को 30 से ज़्यादा उम्मीदवार चुनौती दे रहे हैं. अफ़ग़ानिस्तान में कुल एक करोड़ 70 लाख मतदाता हैं और उनकी हिफ़ाज़त के लिए तीन लाख विदेशी और अफ़ग़ान सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया था.

यदि विजयी उम्मीदवार को 50 प्रतिशत से कम मत मिलते हैं तो फिर मतदान का दूसरा चरण भी हो सकता है.

करज़ई, अमरीका ने ख़ुशी जताई

मतदान के बाद राष्ट्रपति हामिद करज़ई का कहना था, "अफ़ग़ान लोगों ने रॉकेटों और बमों की चुनौती को स्वीकार किया है. हमें अभी देखना है कि मतदान कितना हुआ है लेकिन लोग मतदान में भाग लेने के लिए बाहर आए, ये बड़ी बात है."

उनका कहना था कि गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार मतदान के दौरान 15 प्रांतों में 73 हमले हुए.

वॉशिंगटन में राष्ट्रपति कार्यालय के प्रवक्ता रॉबर्ट गिब्बस ने कहा, "अनेक लोगों ने हिंसा और आतंक की धमकियों का सामना किया है और अफ़ग़ान जनता के लिए अगली सरकार के बारे में अपने विचार व्यक्त किए हैं."

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने एक बयान में अफ़ग़ान लोगों को बधाई दी है. उनका कहना था, "हम अफ़ग़ानिस्तान के पुरुषों और महिलाओं को आज के राष्ट्रपति चुनावों और प्रांतीय परिषदों के चुनावों के सिलसिले में बधाई देते हैं."

नैटो के महासचिव आंडर्स फ़ोग रासमुसेन ने मतदान को 'अफ़ग़ान लोगों की लोकतंत्र स्थापित करने के बारे में प्रतिबद्धता का सबूत' बताया है.

करज़ई का जोड़-तोड़

काबुल में मौजूद बीबीसी संवाददाता रेणु अगाल के अनुसार अफ़ग़ानिस्तान में मतदान तो संपन्न हो गया लेकिन कुछ इलाकों में जहाँ तालेबान या फिर स्थानीय बाहुबली मज़बूत थे, वहाँ लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित करने का काम भी किया गया.

मोर्टार, रॉकेट और आत्मघाती हमलावर - चरमपंथियो ने अपने सभी औज़ारों का इस्तेमाल किया.. लेकिन जैसा कि कई पर्यवेक्षक मानते हैं - 'ये तो आगाज़ है आगे-आगे देखिए होता है क्या...'

इस हिंसा ने राष्ट्रपति हामिद करजई की चिंता बड़ा दी है क्योंकि इसका सीधा असर मतदान पर भी पडा़ है. वर्ष 2009 में वर्ष 2004 के मुक़ाबले में कहीं धीमा मतदान हुआ.

करज़ई का पैतृक इलाक़ा दक्षिण अफ़गा़निस्तान जहां उनके समर्थकों, यानी पश्तून लोगो की जनसँख्या अधिक है, वही क्षेत्र है जहाँ तालेबान की तूती बोलती है.

बीबीसी संवाददाता रेणु अगाल के अनुसार, "दक्षिण अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान के प्रभाव और हिंसा का नतीजा ये हुआ कि वहाँ वोट डालने के लिए कम लोग निकले....यानी इसका सीधा नुकसान करज़ई को झेलना पड़ेगा. लेकिन उन्होने इस की थोडी-बहुत भरपाई अपने गठबंधनों के ज़रिए कर ली है."

उनका कहना है कि अब्दुल रशीद दोस्तम से समझौता कर करज़ई ने उज़बेक मतदाताओं को अपनी और खींचा है और इस्माइल खा़न के ज़रिए ताजिक वोटरों को लुभाने की कोशिश की है. इसी के साथ करज़ई ने एक अच्छे कूटनीतिज्ञ की तरह चुनावी मैदान में खडे़ कई उम्मीदवारों को अपने साथ कर अपने वोटो के कटने से रोका है.

लेकिन उनकी यह कोशिशें सभी लोगों को पसंद नहीं आ रही हैं और अनेक लोगों का तो ये कहना है कि वो सभी लोग अब करज़ई के साथ आ गए हैं जिनकी वजह से अफ़गा़निस्तान की ये हालत हुई है.

चुनाव से पहले हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार करज़ई को 44 प्रतिशत और उनके निकटतम प्रतिद्वंदी अबदुल्ला अबदुल्ला को 26 प्रतिशत मत मिलने की बात कही गई थी.

लेकिन ऐसा नहीं है की करज़ई के प्रतिद्वंद्वियों ने पूरी ताक़त नहीं लगाई. डाक्टर अबदुल्ला अब्दुल्ला ताजिक हैं और वो कहते हैं कि उनकी रगों में पश्तून ख़ून भी है. उन्होनें यूनुस क़ानुनी जैसे बड़े नेता और मज़ार-ए-शरीफ़ के गवर्नर को भी अपनी साथ लिया है. वे करज़ई के विदेश मंत्री रह चुके हैं और विदेशी फौज़ की मदद से चरमपंथियो से लड़ने की बात भी कह चुके हैं.

एक अन्य उम्मीदवार अशरफ़ घनी अहमदज़ई सही मायनों में पश्चिमी देशो के पसंदीदा उम्मीदवार माने जा सकते है. वे विश्व बैंक से जुड़े थे और संयुक्त राष्ट्र महासचिव के अफ़गा़निस्तान में विशेष दूत लखदर ब्रहिमी के विशेष सलाहकार रह चुके हैं. वे पश्तून हैं, काबुल से हैं और अफ़गा़निस्तान के पुनर्निर्माण का अजेंडा लेकर चुनाव में उतरे हैं.

एक और उम्मीदवार रमज़ान बशरदोस्त एक हज़ारा नेता हैं, मन की बोलते हैं, खुल के बोलते हैं.. और वे ग़रीबों की पसंद हैं और आम आदमी की बात करते हैं.

चुनाव से पहले हुए सर्वेक्षण ने कहा गया था की 50 प्रतिशत मत किसी भी उम्मीदवार को मिलने की संभावना नहीं है. चुनाव समाप्ति पर अबदुल्ला और घनी दोनों ने धांधली के आरोप लगाए हैं. तो अब, जब नतीजे आएँगे तो उनका विरोध भी हो सकता है.

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