आतंक से जुड़े क़ानून में संशोधन

पाकिस्तान सरकार ने आतंकवाद निरोधक क़ानून में संशोधन किया है जिसके तहत ऐसे प्रतिबंधित संगठनों के सदस्यों और कार्यकरताओं के ख़िलाफ़ कार्रवाई होगी जो अलग नाम से नया गुट बना लेते हैं.

राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी ने आतंकवाद निरोधक क़ानून 1997 में संशोधन कर अध्यादेश जारी किया है. इस अध्यादेश में संदिग्ध चरमपंथियों को हिरासत में रखने की समय सीमा को भी 30 दिनों से बढ़ाकर 90 दिन कर दिया गया है.

अध्यादेश के मुताबिक़ किसी प्रतिबंधित संगठन के पदाधिकारी, कार्यकर्ता या सहयोगी अलग नाम से कोई नया संगठन बना लेंगे तो नए सगंठन को भी प्रतिबंधित माना जाएगा.

सरकार नए संगठन को गै़रकानूनी घोषित करने के संबंध में औपचारिक रूप से अधिसूचना जारी कर सकती है.

राष्ट्रपति आसिफ़ ज़रदारी की ओर से जारी अध्यादेश में यह भी कहा गया है कि अगर प्रतिबंधित संगठन के सदस्य या कार्यकर्ता गै़रकानूनी गतिविधियों को जारी रखते हैं तो उन्हें पासपोर्ट जारी नहीं किया जाएगा और उन्हें विदेश यात्रा पर जाने की भी अनुमति नहीं होगी.

संशोधन

अध्यादेश के मुताब़िक़ बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थाओं को कहा गया है कि वह प्रतिबंधित संगठनों के सदस्यों को ऋण न दें और हथियारों के लाइसेंस जारी न करने के लिए गृह मंत्रालय को भी कहा गया है.

सूचना एवं प्रसारण मंत्री क़मर ज़मान क़ायरा ने पत्रकारों को बताया, “आतंकवाद और चरमपंथ सामान्य अपराध नहीं है और इससे निपटने के लिए विशेष क़ानून की ज़रूरत है. इसलिए सरकार ने आतंकवाद निरोधक क़ानून में संशोधन किया है.”

उन्होंने कहा कि अमरीका, ब्रिटेन और भारत में भी आंतकवाद से निपटने के लिए विशेष क़ानून हैं.

क़मर ज़मान क़ायरा ने बताया कि पाकिस्तान का आम क़ानून चरमपंथ और आतंकवाद से निपटने के लिए नाकाफ़ी है इसलिए राष्ट्रीय हित में आतंकवाद निरोधक क़ानून को कड़ा बनाया गया है.

जाने माने विश्लेषक डॉक्टर हसन असकरी ने इस क़ानून के बारे में बीबीसी को बताया, “संशोधन का अर्थ तो केवल इतना है कि सरकार संदिग्ध चरमपंथियों या तत्वों से निपटने के लिए अपनी हैसियत को मज़बूत करना चाहती है.”

उन्होंने आगे कहा, “संशोधन से सरकार की क़ानूनी हैसियत तो सुक्षित हो गई है लेकिन सबसे बड़ी समस्या इस क़ानून को लागू करना है.”

डॉक्टर हसन के अनुसार सरकार आतंकवाद और चरमपंथ के ख़िलाफ अब काफी गंभीर हो गई है और अपने अधिकारों को इस संदर्भ में काफी बढ़ाया है.

ग़ौरतलब है कि आतंकवाद के ख़िलाफ पहला क़ानून अगस्त 1997 में पूर्व राष्ट्रपति फारूक़ लग़ारी ने लागू किया और 1999 में इसमें संशोधन किया गया.

क़ानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि 1999 में संशोधित क़ानून में अब भी ऐसी बातें थी जिसका लाभ अभियुक्त उठा रहे थे और सरकार इन्हीं ख़ामियों को दूर करने की कोशिश कर रही है.

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