सुरक्षा पर सवाल

Image caption ये हमला पाकिस्तानी सुरक्षा तंत्र के लिए कई सवाल खड़ा करता है.

पाकिस्तानी फ़ौज ने चौबीस घंटों तक चली कार्रवाई के बाद चालीस से ज़्यादा बंधकों को छुड़ाकर अपने मिशन को कामयाब घोषित कर दिया है.

लेकिन सेना के मुख्यालय पर हुए इस चरमपंथी हमले ने पाकिस्तान के सुरक्षा तंत्र के बारे में कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

पाकिस्तानी फ़ौज आज भी पाकिस्तान की सबसे ताक़तवर संस्था है और उसके मुख्यालय पर हुआ हमला कई मायनों में चरमपंथियों की बढ़ती ताक़त का प्रतीक है.

वो भी तब जबकि पाकिस्तानी फ़ौज और अमरीकी मिसाईल लगातार चरमपंथियों की कमर तोड़ने में जुटे रहे हैं.

ये हमला दुस्साहसपूर्ण था और योजनाबद्ध था.

और भले ही पाकिस्तानी फ़ौज अपने अभियान को कामयाब बता रहा हो, ये उसके लिए एक बहुत बड़ी शर्मिंदगी की बात है.

ये हमला देश के सबसे सुरक्षित माने जानेवाले ऐसे इलाके में हुआ है जहां देश के उच्च सैन्य अधिकारियों का निवास है.

इस पर पूरी तरह से पाकिस्तानी तालिबान की छाप है और देश के गृहमंत्री रहमान मलिक ने भी इसे स्वीकार किया है.

उनका कहना है, ``ये लगभग साबित हो चुका है कि सारी कार्रवाई के लिए मदद दक्षिणी वज़ीरिस्तान से आ रही थी और इसलिए सरकार के पास वहां हमला करने के अलावा कोई चारा नहीं है.’’

लेकिन ये भी सच है कि तीन बार वहां पाकिस्तान फ़ौज का हमला हो चुका है और तीनों बार वो नाकामयाब रहे हैं.

और इस बार भी कोई ये उम्मीद नहीं कर रहा कि सर से पांव तक हथियारों से लैस दस हज़ार चरमपंथियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई आसान होगी.

शनिवार को पाकिस्तान फ़ौज के मुख्यालय पर हुआ हमला ये तो दिखा ही रहा है कि पाकिस्तान फ़ौज को रक्षात्मक रूख़ अपनाने पर मजबूर होना पड़ा है.

ये तो नहीं लगता कि चरमपंथी पाकिस्तानी सेना के मुख्यालय को क़ब्ज़े में लेने की उम्मीद रखते थे और इसलिए अंदाज़ा यही है कि ये प्रयास था उन्हें शर्मिंदा करने का और पाकिस्तानी जनता में मायूसी फैलाने का.

लेकिन ये कहना मुश्किल है कि चरमपंथी एक मज़बूत स्थिति में पहुंचकर ये हमला कर रहे हैं या फिर हताशा की स्थिति में.

सच्चाई जो भी हो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि पाकिस्तान की सुरक्षा और उसके ख़ुफ़िया तंत्र को कहीं ज़्यादा बेहतर करने की ज़रूरत है.

संबंधित समाचार