'चरमपंथियों को समझने में ग़लती'

सुरक्षाकर्मी
Image caption पाकिस्तान में आए दिन चरमपंथी हमले हो रहे हैं और सरकार इन पर नियंत्रण करने में सक्षम नज़र नहीं आ रही है.

लाहौर में केंद्रीय ख़ुफ़िया एजेंसी और पुलिस प्रशिक्षण केंद्र पर हुए हमलों के बाद सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि अब समय आ गया है कि पाकिस्तान सरकार और सुरक्षा एजेंसियां चरमपंथियों से निपटने की अपनी नीति पर दोबारा गंभीरता से सोचें.

दो दिन पहले रावलपिंडी में पाकिस्तानी सेना मुख्यालय पर हुए हमलों के बाद लाहौर में सुरक्षा एजेंसियों पर हुए हमलों से पाकिस्तानी सरकार ही नहीं बल्कि सैनिक नेतृत्व पर भी दबाव बढ रहा है.

पाकिस्तानी सेना की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के पूर्व प्रमुख रिटायर्ड जनरल असद दुर्रानी ने बीबीसी संवाददाता अनीश अहलूवालिया से बातचीत करते हुए स्वीकार किया कि चरमपंथ से निपटने में पाकिस्तानी सरकार की सबसे बड़ी ग़लती यह हुई है कि उसने सभी गुटों को एक बस्ते में डाल कर देखा है.

दुर्रानी ने कहा कि सरकार ने सभी को पाकिस्तानी तालेबान का नाम दे दिया है.

उनका कहना है कि सच्चाई यह है कि इनमें से कुछ गुट पाकिस्तानी प्रशासन के ख़िलाफ़ हैं तो कुछ अफ़ग़ानिस्तान में विदेशी सेना की मौजूदगी का विरोध कर रहे हैं, तो कुछ पाकिस्तान के पड़ोसी देशों के ख़िलाफ़ अभियान चला रहे हैं.

दुर्रानी के अनुसार इन सभी गुटों के ख़िलाफ़ इकठ्ठा कार्रवाई शुरू कर के पाकिस्तान ने इन गुटों में आपसी समन्वय को बढावा ही दिया है. उन्होंने इस बात की ओर भी इशारा किया कि उज़बेकिस्तान मूल के चरमपंथी भी पाकिस्तान के ख़िलाफ़ सक्रिय हैं.

दुर्रानी का कहना है कि महत्वपूर्ण ठिकानों की सुरक्षा की भी समीक्षा होनी चाहिए. मगर उनका कहना था कि जब आत्मघाती हमलावर पूरी तैयारी कर के हर समय हमले की फ़िराक़ में रहे तो उसे रोकना आसान नहीं होता.

उन्होंने स्वीकार किया कि इन हमलों के बाद पहले कि तरह फिर सवाल उठ सकते हैं कि क्या पाकिस्तान के परमाणु संयंत्र सुरक्षित हैं. मगर उनका मानना है कि चरमपंथियों के पास परमाणु संयंत्र या दूसरे बड़े ठिकानों पर हमला करने की क्षमता अभी तो नहीं है.

मगर एक बात साफ़ है कि सेना मुख्यालय और केंद्रीय ख़ुफ़िया एजेंसी का कार्यालय ऐसे ठिकाने हैं जो पाकिस्तानी सेना और सुरक्षा एजेंसियों की साख़ का प्रतीक हैं.

तो क्या इन हमलों के बाद पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल कियानी पर दबाव नहीं बढ़ेगा. जनरल दुर्रानी ने स्वीकार किया कि इस माहौल में सेना और सेना प्रमुख पर दबाव तो बढेगा लेकिन यह सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वो इस दबाव के भार को झेले और सेना को अपना काम करने दे.

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