मीरा कुमार के साथ एक मुलाक़ात

मीरा कुमार
Image caption मीरा कुमार भारत की पहली महिला स्पीकर हैं

बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते है. इस हफ़्ते हमारी मेहमान हैं भारत की लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार.

सबसे पहले, ये जानना चाहेंगे कि आप इतना नपा-तुला कैसे बोल पाती हैं. हर बात बहुत सोच समझकर कैसे बोल पाती हैं?

शुरू से ही ऐसा है. मैं शुरू से ही कम बोलती रही हूँ और थोड़ा सोचकर ही बोलती हूँ. मेरा मानना है कि बोलने की अपनी-अपनी शैली होती है. बचपन से ही मुझे ज़्यादा बोलने की आदत नहीं रही है.

क्या आप अंतर्मुखी हैं?

शुरू में मुझे ऐसा ही कहा जाता था. ज़्यादातर लोगों को लगता था कि मैं रिज़र्व्ड हूँ. पर ऐसा ही होता है हम परस्पर विरोधी भावना के साथ जीवन जीते हैं.

पहले वकील, राजनयिक और फिर भारत की पहली महिला स्पीकर. कैसा रहा ये सफर?

काफी लंबा सफर रहा. इस दौरान मैं बहुत सारे प्रयोगात्मक रास्तों पर चली और सफर बहुत ठीक रहा. मैंने लॉ का इम्तहान ज़रूर पास किया, लेकिन प्रेक्टिस के लिए कोर्ट कभी नहीं गई.मैंने अंग्रेज़ी साहित्य में एमए किया, लेकिन सिविल सर्विसेज़ के लिए मैंने इतिहास और राजनीतिक विज्ञान लिए थे. उस समय ये विषय बहुत लोकप्रिय थे. अब तो डॉक्टर, इंजीनियर भी सिविल सर्विसेज़ में जा रहे हैं.

इतिहास पढ़ने का शौक है आपको?

इतिहास मुझे आज भी पसंद है. फिर चाहे वो मध्ययुगीन भारत का इतिहास रहा हो या फिर आधुनिक भारत का इतिहास. मैं झांसी की रानी, क्वीन एलिज़ाबेथ प्रथम से भी बहुत प्रभावित रही. एलिज़ाबेथ प्रथम ने जहाँ साहित्य, कला, वास्तुशास्त्र को बढ़ावा दिया, वहीं झांसी की रानी अदभुत व्यक्तित्व वाली थी.

एलिज़ाबेथ प्रथम और झांसी की रानी दोनों बहुत ताक़तवर, मुखर और वक़्त के बहुत आगे देखने वाली महिलाएँ थी. क्या आप इन्हें आदर्श मानती हैं?

हाँ बिल्कुल. जो वक़्त से आगे सोचेगा, उसको ही हम अपना आदर्श बनाएँगे ताकि उसके पीछे-पीछे चल सकें.

महारानी एलिज़ाबेथ और झांसी की रानी में से आप खुद को किसके नज़दीक पाती हैं?

हम तो उन्हें छू भी नहीं सकते. दोनों की अपनी-अपनी ख़ासियतें हैं. झांसी की रानी वीरता का पर्याय रही हैं. वहीं एलिज़ाबेथ ने अपना राज बखू़बी चलाया.

राजनीति में आने के लिए आपने चाणक्य को पढ़ा है क्या?

मुझे लगता है कि जो लोग राजनीति में नहीं हैं वो भी चाणक्य को मानते होंगे. ऐसा भी है कि कुछ लोग जो राजनीति में हैं वो चाणक्य को नहीं मानते हैं. मुझे लगता है कि गांधीजी ने कभी चाणक्य को नहीं माना.

भारत और दक्षिण एशिया में लोकतंत्र नया और जीवंत है. संसद का माहौल कभी- कभी बहुत उत्तेजनापूर्ण होता है. बतौर महिला स्पीकर आपको क्या चुनौतियाँ नज़र आती हैं?

स्पीकर चाहे महिला हो या पुरुष, उसे बीच का रास्ता निकालकर काम निकालना होता है. स्पीकर से अपेक्षा की जाती है कि पूरी तरह से निरपेक्ष होकर संसद को चलाएँ. कुछेक और बातें ध्यान में रखनी होती हैं. संसद के स्पीकर का पद एक संस्था है, उसके अपने अधिकार हैं. इसकी अपनी एक गरिमा है और इसे आघात नहीं पहुँचना चाहिए.

स्पीकर होते हुए हमें ये देखना होता है कि यहाँ बैठा हुआ हर सदस्य 10-12 लाख लोगों का प्रतिनिधि है. उन पर लोगों का दबाव रहता है. तो ये सामंजस्य बिठाना ज़रूरी होता है कि स्पीकर के पद की गरिमा को आघात न पहुँचे और संसद सदस्यों का भी निरादर न हो.

अब तक के जो पुरुष स्पीकर रहे हैं वो जब संसद में शोर मचता था तो वे भी ज़ोर से बोलकर सदस्यों को चुप कराने की कोशिश करते थे. लेकिन आप तो बहुत विनम्र हैं. फिर आप इस चुनौती से कैसे निपटती हैं?

अभी तक तो मेरे सामने ऐसे हालात नहीं आए. मैं सांसदों से अनुरोध करती हूँ कि वे शांत हो जाएँ और संसद में शांति स्थापित करें तो आमतौर पर वे लोग मान लेते हैं.

संसद में कई सदस्यों से तो आपके बहुत घनिष्ठ और पारिवारिक संबंध होंगे. तो बतौर निरपेक्ष स्पीकर आप इस चुनौती को कैसे लेती हैं?

स्पीकर के पद पर निरपेक्ष रहना बहुत ज़रूरी होता है. मैं समझती हूँ कि सभी लोग इस बात को अच्छी तरह से समझते हैं और मेरी बातों का बुरा नहीं मानते.

मेरा अनुभव है कि स्पीकर का पद आपको ये शक्ति देता है कि आप किसी से पक्षपात न करें. यही वजह है कि संसद के कई सदस्यों से बहुत घनिष्ठता और आत्मीयता होने के बावजूद मेरी कोशिश रहती है कि पक्षपात न होने पाए. अगर स्पीकर पक्षपात करे तो सदन तो चल ही नहीं पाएगा.

आपके पिता जगजीवनराम आज़ाद भारत के दिग्गज नेताओं में से थे. उन्होंने आपको कैसे प्रभावित किया?

मैं जब छोटी थी तो मेरे पिता ने मुझे बहुत प्यार दिया. भारी व्यस्तता के बावजूद वे मेरी हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का ख़्याल रखते थे. वे मुझे छुट्टियों में अपने साथ घुमाने ले जाते थे. ट्रेन से हम लोग घूमते थे. मेरे ख़्याल से वे चाहते थे कि मैं पूरे भारत को देखूँ और तरह-तरह के लोगों से मिलूँ. लेकिन हम लोग राजनीति के बारे में कभी बात नहीं करते थे.

क्या आपको इस बात का अफसोस है कि आपने उनसे राजनीति नहीं सीखी?

मुझे जीवन में किसी बात का अफसोस नहीं है. मुझे इस बात की बहुत खुशी है कि वो मेरे पिता थे. मैं समझती हूँ कोई कारण रहा होगा जिसके चलते उन्होंने मुझे राजनीति नहीं सिखाई. हो सकता है कि अगर वो मुझे सिर्फ़ राजनीति सिखाते तो दूसरी चीज़ों के लिए मुझे वक्त ही नहीं मिलता.

वो बाहर से बहुत सख्त थे, लेकिन अंदर से बहुत संवेदनशील थे. मैंने उनसे सीखा कि जीवन में कितना भी संघर्ष हो, लेकिन संवेदनशीलता नहीं खोनी चाहिए. मैं इसे अपनाने की कोशिश करती हूँ. अगर ऐसा नहीं होगा तो मीरा कुमार, मीरा कुमार नहीं रहेगी.

आपका नाम बहुत अच्छा है. इसका मीरा से कुछ संबंध है क्या?

मैं मीरा से बहुत प्रभावित हूँ और वो भी लोगों के सामने मिसाल पेश करने वाली महिला थी.

आपकी माँ भी स्वतंत्रता सेनानी थीं?

हाँ. क्योंकि पिता ज़्यादातर व्यस्त रहते थे इसलिए मैं अपनी माँ के बहुत नज़दीक थी. उनका व्यक्तित्व बहुत शानदार था. आसान और कठोर में से वे कठोर निर्णय लेती थी.

आपने उनसे पूछा कि वे ऐसा क्यों करती थीं?

मैं समझती हूँ कि बहुत आसान या सहूलियत वाला रास्ता हमेशा नीचे की ओर लेकर जाता है. अगर ऊपर जाना है तो कठोर निर्णय लेने ही पड़ेंगे.

मैंने सुना है कि बाबू जगजीवनराम को हीरों का बहुत शौक था. इसमें कितनी सच्चाई है?

ऐसा कुछ प्रचार हो गया है. ऐसा प्रचार क्यों हुआ मैं नहीं जानती. वो बहुत ही साधारण इंसान थे और खादी पहनते थे.

आपको किसी चीज़ का विशेष शौक है?

मुझे फूलों का बहुत शौक है. अगर आप इसे राजनीति से न जोड़ें तो मैं कहूँगी कि मुझे कमल बहुत पसंद है.

अपने बचपन और शुरुआती वर्षों के बारे में कुछ बताएँ. आप शैतान लड़की थी या तब भी ऐसी ही थीं?

बचपन में तो शैतानी होती ही थी. बगैर शैतानी के तो बचपन पूरा ही नहीं होता. मैं बहुत शर्मीली थी और ज़्य़ादातर समय अपनी माँ के पल्लू से ही चिपकी रहती थी. मेरे पिता मंत्री थे. मैं सीमित दायरे में न रह जाऊँ, इसलिए उन्होंने मुझे हॉस्टल भेजा. वनस्थली भेजा गया. वहीँ मैंने घुड़सवारी सीखी.

फिर मैं जयपुर में पढ़ी. वहाँ मैंने निशानेबाज़ी सीखी. क्योंकि हम हॉस्टल में रहे इसलिए बहुत व्यस्त कार्यक्रम होता था. बहुत कुछ सीखने को मिला.

आपकी वहाँ गायत्री देवी से मुलाक़ात हुई?

वो मुझे बहुत मानती थी. मुझे बेटी की तरह प्यार करती थी. उनके देहांत से कुछ दिन पहले मैं उनसे बात करना चाह रही थी, लेकिन बात नहीं हो सकी. मेरे स्पीकर बनने पर उनका बधाई पत्र मुझे मिला था.

वो बाहर से ही नहीं अंदर से भी बहुत खूबसूरत थी. लड़कियों को पढ़ाने के लिए उन्होंने बहुत प्रोत्साहित किया. लड़कियों के लिए उन्होंने स्कूल खोले. मुझे उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला.

अच्छा ये बताएँ, विदेश सेवा छोड़कर आप राजीव गांधी के साथ राजनीति में आई. ये फैसला कैसे लिया?

राजीव गांधी उस वक़्त प्रधानमंत्री थे. तब बिजनौर की सीट खाली हुई थी. राजीव गांधी मेरे पिता के पास आए और कहा कि मैं विदेश सेवा छोड़कर राजनीति में आऊँ. बाबूजी उन्हें बहुत मानते थे. उन्होंने राजीवजी की बात मान ली. बाबूजी ने मुझे बताया और मैंने उनकी बात मान ली.

आपके मन में एक बार भी ये ख़्याल नहीं आया कि इतना अच्छा करियर छोड़कर राजनीति में जाऊँ या नहीं?

तब इतना कुछ नहीं सोचा था. बाबूजी ने मुझसे कहा कि मैंने राजीव गांधी को हाँ कर दी है. तो मैंने कहा कि ठीक है जब आपने हाँ कर दी है तो मैं राजनीति में चली जाती हूँ.

राजीव जी से पहले भी आपकी मुलाक़ात थी क्या?

1946 में जब बाबूजी अंतरिम सरकार में शामिल थे तो तब बचपन में अक्सर राजीव गांधी और संजय गांधी से मुलाक़ात होती थी. संजय गांधी कुछ चंचल थे, जबकि राजीव जी शांत स्वभाव के थे.

राजनीति में परिवारवाद की बात होती है. गांधी, सिंधिया, पायलट. आप संसद की स्पीकर हैं. क्या आपको लगता है कि भारतीय राजनीति परिवारवाद की जकड़ में आ रहा है?

मेरा मानना है कि हमारा संसदीय लोकतंत्र बहुत मज़बूत है. चुनाव में एक बार तो ऐसा हो सकता है कि आप परिवार के नाम पर जीत जाएँ, लेकिन फिर मतदाता ये नहीं देखता आप किस परिवार से हैं, आप किस दल से हैं. चुनाव में आपका आकलन इस बात से होता है कि आप कितने योग्य हैं और आपने क्या काम किया है. तो हमें इस डर को अपने दिमाग से निकाल देना चाहिए कि देश पर किसी परिवार का राज हो जाएगा. जनता जो चाहेगी वही होगा.

सक्रिय राजनीति में आपको लगभग 25 साल हो गए. इसकी सबसे अच्छी और सबसे ख़राब बात क्या लगती है आपको?

सबसे अच्छी बात ये लगती है कि सबसे ग़रीब का भी आप हित कर सकते हैं. इतना ग़ैरज़िम्मेदार तो कोई संसद सदस्य नहीं होगा जो पांच साल में एक बार भी अपने क्षेत्र में न जाए.

ख़राब बात ये है कि राजनीति से जात-पात अभी तक दूर नहीं हो पा रहा है. संसदीय राजनीति में जात-पात और जनतंत्र साथ-साथ नहीं चल सकते. मुझे इस बात की चिंता रहती है कि जात-पात, जनतंत्र को खत्म कर देगा.

खाली वक़्त में क्या करती हैं?

मुझे गार्डनिंग का शौक है. किताबें पढ़ना भी अच्छा लगता है. इसके अलावा मुझे मांसाहारी भोजन पकाना अच्छा लगता है. हालाँकि मैं खुद शाकाहारी हूँ. कविता लिखना अच्छा लगता है. हालाँकि काफी समय से मैने कुछ नहीं लिखा है.

निशानेबाज़ी में आपने मैडल जीते हैं. ये सिलसिला कब शुरू हुआ?

जयपुर के एमजीडी स्कूल में मैंने निशानेबाज़ी सीखी. जब मसूरी में सिविल सर्विसेज़ अकादमी में थे तो वहाँ भी निशानेबाज़ी करते थे.

फ़िल्में देखना पसंद है आपको?

फ़िल्में देखना किसे पसंद नहीं होता. अभी हाल ही में मैंने दो पुरानी फ़िल्में देखीं. हालाँकि अभी हमें ये बहुत खलता है कि थिएटर में जाकर फ़िल्म नहीं देख पाते.

नई फ़िल्मों की बात करूँ तो मैंने दिल्ली-6 देखी है.

पसंदीदा अभिनेता, अभिनेत्री?

बहुत सारे अभिनेता, अभिनेत्री मुझे पसंद हैं. नई अभिनेत्रियों में ऐश्वर्य राय अच्छी लगती है. अभिनेताओं में शाहरुख़ ख़ान, ऋतिक रोशन मुझे पसंद हैं.

आप इतने सालों से पूरी तरह चुस्त दुरुस्त हैं. इन 25 सालों में आपका वजन जस का तस है. क्या करती हैं आप. योग या कुछ और?

बस चिंता करती हूँ. चिंता करने से वजन नहीं बढ़ता. मैं बहुत सादा खाना खाती हूँ.

आपकी नज़र में मीरा कुमार क्या हैं, कैसी शख्सियत हैं?

मीरा कुमार बहुत साधारण महिला है. कुछ शर्मिली और अंतर्मुखी हैं. मैं बहुत मेहनती हूँ.

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